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नोट बंद हो गये

जिनके इशारों पर नाचता था भ्रष्टतंत्र कैश के बिना सभी रिमोट बंद हो गये वोट फोर नोट की जो करते थे राजनीति उन मायाधारियों के वोट बंद हो गये डाकुओं का कैश से हुआ है ऐसा मोहभंग सरे-आम लूट व खसोट बंद हो गये पर्दे के पीछे काफ़ी कुछ अभी भी है बंद जनता को लगता है नोट बंद हो गये...

एक गीत मस्ती का

आकलन नहीं करना आप मेरी हस्ती का कुछ अलग कलेवर है मेरे दिल की बस्ती का एक ही ज़मीं पर मैं एक संग उगाता हूँ एक गीत करुणा का, एक गीत मस्ती का अश्क़ की कहानी भी शब्द में पिरोता हूँ दर्द देखता हूँ तो ज़ार-ज़ार रोता हूँ ख़ूब खिलखिलाता हूँ ग़लतियों पे मैं अपनी व्यंग्य-बाण ख़ुद को...

काँटों पर कटती हैं रातें

झलक नहीं मिलती इनके पैरों के छालों की काँटों पर कटती हैं रातें हँसने वालों की सब जैसी ही देह, जरा का डर इनका भी है आयु बढ़े तो तन निश्चित जर्जर इनका भी है भूख-तृषा की व्याधि इन्हें भी घेरे रहती है ख़ुद से हैं बेहोश, पीर ही इनको सहती है स्वार्थ गलाकर कुंजी गढ़ लीं ग़म के...

छल का पल

आँखें पलकों की सीमा से बाहर आने को आतुर थीं कंधे ढूंढ रहे थे कोई एक हथेली धीर बँधाए रक्त शिराओं के तटबंधों की मर्यादा लांघ रहा था अपनेपन के छल से आहत दिल ख़ुद को कैसे समझाए मुट्ठी भींच नहीं सकता था, संबंधों का दम घुँट जाता और हथेली के खुलते ही भाग्य मुझे उपहास बनाता...

बचपन के किस्सों से पूछो

तुम खरगोशों के अनुयायी मैं हूँ कछुए का पथगामी बचपन के किस्सों से पूछो आख़िर में जय किसकी होगी जब सारस को आमंत्रित कर खीर परोसी थी थाली में लम्बी चोंच लिए बेचारा कैसे जल पीता प्याली में दृश्य मगर परिवर्तित होगा सारस का भी दिन आएगा शर्बत युक्त सुराही होगी धूर्त देख कर...

सृजन-पथ

मौन लम्हों को पकड़कर शब्द में साकार करना भावसागर से अमिय का घट जुटाने-सा कठिन है कल्पना में कौंधते लाखों विचारों से उलझना इक उफनती बाढ़ को काबू में लाने-सा कठिन है राम का दुःख तब कहा जब रह गए तुलसी अकेले मेघदूतम् के रचयिता ने विरह के कष्ट झेले कृष्ण की इक बावरी ने विष...
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