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आलोचना-आमंत्रण

सिर्फ़ प्रशंसा से निश्चित ही धार बिगड़ती है लेखन की तुम मेरे गीतों की अब से निर्मम-निठुर समीक्षा करना बगिया के जो बिरवे माली की कैंची से दूर रहे हैं वो बगिया की उर्वर भू से हटने को मजबूर रहे हैं छँटने-कटने की पीड़ा से ही मिलता है रूप सुदर्शन तुम बस घावों पर नव पल्लव उगने...

विध्वंस के बाद

पेड़ की डालियो! नवसृजन में जुटो पत्तियों को मिला टूटने का हुनर रात भर मत बिलखियो री सूरजमुखी सूर्य को भा गया रूठने का हुनर जो गुंथे एक ही तार में वो सुमन एक दिन सूखकर तो बिखर ही गए किन्तु जब तक जिए, तब तलक़ यूं जिए उत्सवों के सुअवसर संवर ही गए तुम किसी फूल से सीख लेना...

घर कैसे बचेगा?

देहरी ने झूठ बोला है कपाटों से सांकलों ने सी लिए हैं होंठ घर कैसे बचेगा? धूल आंगन की छतों के सिर चढ़ी है और चैखट मूकदर्शक बन खड़ी है नींव तक हर रोज़ पानी रिस रहा है फर्श बेचारा निरंतर घिस रहा है रोज़ टलता जा रहा विस्फोट घर कैसे बचेगा? नींव का बिसरा चुकी है प्यार देखो...

मनोरंजक चुनावी रैलियाँ

सरकार चाहती है कि दिल्ली की जनता सड़क पर पार्किंग न करे। जनता भी चाहती है कि उसे अपनी गाड़ी अनाधिकृत स्थान पर खड़ी न करनी पड़े। लेकिन सरकार गाड़ी के लिए पार्किंग का स्थान मुहैया नहीं करवा पाती। वह जनता से कहती है कि अपने घर के भीतर गाड़ी खड़ी करो। जनता हाथ जोड़ कर कहती है कि...

अलविदा शशि कपूर साहब!

एक पूरा जीवन समाप्त हो जाने की एक और ख़बर आई। वे शशि साहब जो कभी चहकते हुए एक नौजवान थे, वे जिनका अंदाज़ “स्टाइल” कहलाता था, वे जिनका उठना-बैठना, खानपान, आना-जाना सब कुछ सुर्खियों में तब्दील हो जाता था; आज “हमेशा” के लिए विदा हो गए। वो शरारती...

सरकारी दफ्तर में काम

किसी सरकारी दफ़्तर में काम अटक जाये तो हर भारतीय के पास दो विकल्प होते हैं। पहला, वह ईमानदारी की लड़ाई लड़े और अपने सब काम-धंधे छोड़कर अधिकारियों, थानों, अदालतों, मीडिया और विजिलेंस के चक्कर लगाने शुरू कर दे। इस प्रक्रिया में काफ़ी परेशानी और ज़िल्लत उठाने के बाद अंततः यह...
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