यौवन के हाथ करछी-कड़ाही में घिरे तो
सीमाओं पे शत्रुओं के बान कौन थामेगा
चटनी के स्वाद चखने लगी जवानी गर
बैरियों की तिरछी जुबान कौन थामेगा
जनता के दुःख देखकर जब धरती पे
फटने लगेगा आसमान; कौन थामेगा
देश के युवा यदि पकौड़े बेचने लगे तो
देश के विकास की कमान कौन थामेगा
✍️ चिराग़ जैन
