+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

उन्माद का दौर

हम अनियंत्रित उन्माद के माहौल में खड़े हैं। पिछले कुछ वर्षों में राजनीति ने हमारे भाषा संस्कार के जो परखच्चे उड़ाए/उड़वाए हैं उसका वास्तविक स्वरूप इन दिनों सबको दिखाई दे रहा है।
पुलवामा की घटना के बाद मीडिया के पास कंटेंट की कमी पूरी हो गई है। प्रियंका गांधी की एंट्री, रॉबर्ट वाड्रा का मुक़द्दमा और गठबंधन की छीछालेदर के मुद्दे घिस चुके थे। ऐसे में पुलवामा की दुर्घटना पर पाकिस्तान को गरियाने और लतियाने का क्रम प्रारम्भ हो गया। जनता में पीड़ा और आक्रोश था, मीडिया ने उसे उन्माद बना दिया। चैनल्स ने लाशों के चीथड़े, गाड़ी के परखच्चे, तिरंगे में लिपटे ताबूत, कांधा देते गृहमंत्री और परिक्रमा करते प्रधानमंत्री से यात्रा शुरू की थी; जो शहीद परिवारों की बिलखती औरतों के लांग शॉट्स, आँसू भरी आँखों के ईसीयू, शवयात्राओं के ड्रोन शॉट्स, दुखी पिता की बाइट्स, बिलखती माँओं के साक्षात्कार और टीवी पर दिखने को लालायित भीड़ के थॉट कलेक्शन से होते हुए; बारूद, जंग, आग, धुआँ, चीख़, पुकार, युद्ध, टैंक, मिसाइल, गाली-गलौज और चरित्र-हत्याओं तक पहुँच गई है।
जनता की भावनाएं भाषा की हर मर्यादा लांघ रही है। आज एक रैली की वीडियो देखी जिसमें नारे लग रहे हैं : “पाकिस्तान तेरी बहन….”; सानिया मिर्ज़ा को गद्दार कहा जा रहा है, सिद्धू को देशद्रोही बताया जा रहा है, मोदी जी को नाकारा कहा जा रहा है, राहुल गांधी को बम बांध कर पाकिस्तान में घुस जाने की सलाह दी जा रही है। पुलवामा के बाद हुई अमित शाह और नरेंद्र मोदी की रैलियों को संवेदनहीनता से जोड़ा जा रहा है। नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी की हँसी को उनकी निष्ठा से जोड़ कर देखा जा रहा है। फोटोशॉप करके राहुल गांधी की मोबाइल चलाते हुए तस्वीर के साथ अभद्र और असंगत टिप्पणी लिखी जा रही है। मनोज तिवारी किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम में नाच लिए तो हंगामा मचा दिया।
जम्मू-कश्मीरी मूल के सभी छात्रों को दुश्मन मानते समय हमें यह ध्यान ही नहीं आया कि पुलवामा में शहीद होने वाले बेटों में जम्मू की शहादत भी शामिल थी। सभी मुसलमानों को आतंकवादी मानते समय हमें ध्यान ही नहीं आता कि शहीदों की इस सूची में मुसलमान बेटे भी शामिल हैं।
इस उन्माद से कभी कोई हल नहीं निकलेगा। यह समय अपनी देशभक्ति सिद्ध करने के लिए दूसरों को राष्ट्रद्रोही साबित करने का नहीं है। इस समय एकजुट होकर अपनी सेना को आश्वस्त करने का मौका है कि तुम सीमाएँ संभालो, हम देश के भीतर एका बनाए रखेंगे।
घर में जवान बेटे की लाश आती है तो आंगन रोने लगता है। नुक्कड़ भर्त्सना करते हैं। थाने कार्रवाई करते हैं। लेकिन कमरा बिल्कुल मौन हो जाता है।
कोई भी प्रतिक्रिया करते समय इतना ध्यान रखना चाहिए कि दुःख की घड़ी में संयम खोकर हम देश की एकाग्रता को भंग ही कर रहे हैं।

✍️ चिराग़ जैन

पुलवामा

तैने सोता शेर जगाया है
अब तू ख़ैर मनाइयो
पूरा भारत देश रुलाया है
अब तू ख़ैर मनाइयो

लड़ने के हालात नहीं थे
राही थे, तैनात नहीं थे
मौत उन्हें छू पाई क्योंकि
बंदूकों पर हाथ नहीं थे
उनको धोखे से मरवाया है
अब तू ख़ैर मनाइयो

अब तू देख, उपद्रव होगा
आग उगलता भैरव होगा
अब तक विष पीते आए हैं
अब छाती पर तांडव होगा
तैने तीजा नेत्र खुलाया है
अब तू ख़ैर मनाइयो

रग-रग में ज्वाला भड़की है
जन-जन की बाजू फड़की है
आँसू ने शोले उगले हैं
आँखों मे बिजली कड़की है
तैने अपना काल बुलाया है
अब तू ख़ैर मनाइयो

✍️ चिराग़ जैन

पुलवामा

आँसू भेजे हैं घाटी ने
चिथड़े बीने हैं माटी ने
फिर धोखे से घात किया है
कायरता की परिपाटी ने
अब पापी मतलब समझेगा, धोखे के परिणाम का
अंतिम पन्ना हम लिखेंगे, इस भीषण संग्राम का

छल का शीश नहीं कट पाया, तो यह रण आश्वस्त न होगा
जब तक न्याय नहीं हो जाता, तब तक सूरज अस्त न होगा
युग-युग का इतिहास खँगालो, पाप पराजित होता आया
लंका जलनी है रावण की, राघव का घर ध्वस्त न होगा
वीरों के तूणीर खुलेंगे
सोए शर ज्वाला उगलेंगे
दुःशासन का लोहू लेकर
पांचाली के केश धुलेंगे
तुमने मार्ग स्वयं खोला है, अपने पूर्णविराम का
अंतिम पन्ना हम लिखेंगे, इस भीषण संग्राम का

अनुनय की भाषा को शठ ने, रघुवर की दुर्बलता जाना
शिशुपालों ने मधुसूदन में, अपना काल नहीं पहचाना
इतने अवसर मिलने पर भी, हिंसा का पथ छोड़ न पाए
आदत से लाचार हुए हो, ज्यों कोढ़ी का कोढ़ खुजाना
फिर मस्तक पर बल उभरे हैं
कृष्ण सुदर्शन धार खड़े हैं
फिर अर्जुन के नैन झरे हैं
फिर से सारे घाव हरे हैं
फिर से बिलख-बिलख कर रोया, मंदिर अक्षरधाम का
अंतिम पन्ना हम लिखेंगे, इस भीषण संग्राम का

✍️ चिराग़ जैन

ऋतुराज आया है

बाग की सब क्यारियों के हाथ पीले हो गए हैं
फूल की हर पाँखुरी के ओंठ गीले हो गए हैं
श्वास में सरगम सजाता साज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

साँस में बहकी हवाओं का नशा सा घुल रहा है
प्रीति की बारिश हुई है, ज्ञान सारा धुल रहा है
पर्वतों को खुशबुओं ने प्यार से छू भर लिया है
वज्र सा अड़ियल हिमालय भी अभी हिल-डुल रहा है
ज्ञानियों के ज्ञान से मन बाज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

दल भ्रमर का बूटियों के पास मंडराने लगा है
कोयलों ने गीत गाए, आम बौराने लगा है
ठूठ से लिपटी हुई है एक दीवानी लता तो
बाग का वीरान कोना, बाग कहलाने लगा है
दम्भ होकर प्रेम का मोहताज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

गुनगुनी सी धूप के संग बेल-बूटों का प्रणय है
प्रेमियों को हर नियम के टूट जाने पर अभय है
ठंड से ठिठुरी धरा अंगड़ाइयां लेने लगी है
श्वेत छितरी बदलियों के बीच सूरज का उदय है
मोतियों के थाल में पुखराज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!