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उन्माद का दौर

हम अनियंत्रित उन्माद के माहौल में खड़े हैं। पिछले कुछ वर्षों में राजनीति ने हमारे भाषा संस्कार के जो परखच्चे उड़ाए/उड़वाए हैं उसका वास्तविक स्वरूप इन दिनों सबको दिखाई दे रहा है। पुलवामा की घटना के बाद मीडिया के पास कंटेंट की कमी पूरी हो गई है। प्रियंका गांधी की एंट्री,...

पुलवामा

तैने सोता शेर जगाया है अब तू ख़ैर मनाइयो पूरा भारत देश रुलाया है अब तू ख़ैर मनाइयो लड़ने के हालात नहीं थे राही थे, तैनात नहीं थे मौत उन्हें छू पाई क्योंकि बंदूकों पर हाथ नहीं थे उनको धोखे से मरवाया है अब तू ख़ैर मनाइयो अब तू देख, उपद्रव होगा आग उगलता भैरव होगा अब तक विष...

पुलवामा

आँसू भेजे हैं घाटी ने चिथड़े बीने हैं माटी ने फिर धोखे से घात किया है कायरता की परिपाटी ने अब पापी मतलब समझेगा, धोखे के परिणाम का अंतिम पन्ना हम लिखेंगे, इस भीषण संग्राम का छल का शीश नहीं कट पाया, तो यह रण आश्वस्त न होगा जब तक न्याय नहीं हो जाता, तब तक सूरज अस्त न होगा...

ऋतुराज आया है

बाग की सब क्यारियों के हाथ पीले हो गए हैं फूल की हर पाँखुरी के ओंठ गीले हो गए हैं श्वास में सरगम सजाता साज आया है लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है साँस में बहकी हवाओं का नशा सा घुल रहा है प्रीति की बारिश हुई है, ज्ञान सारा धुल रहा है पर्वतों को खुशबुओं ने प्यार से छू...
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