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कोई ईसी के झाड़ा लगाओ

कोई ईसी के झाड़ा लगाओ
ये काहे मनमोहन हुआ जाए
ओ ज़रा शेषन सा ओझा बुलाओ
ये काहे मनमोहन हुआ जाए

इसको नोटिस, उसको नोटिस, असर नहीं है कोई
जाति-धर्म के जुमले उछले, भारत माता रोई
संविधान के कहे मुताबिक द्वंद नहीं हो पाया
आज तलक भी नमो प्रसारण बन्द नहीं हो पाया
इसके हाथों में संटी थमाओ
ये काहे मनमोहन हुआ जाए

सारे ही दल करते फिरते हैं अपनी मनमानी
वोटर को धमकी देने की सबने मन में ठानी
कहीं कोई प्रत्याशी ही अनुशासन तोड़ रहा है
सब सहकर भी चुप है ये ईसी है या अडवाणी
इसके कमरे की घण्टी बजाओ
ये काहे मनमोहन हुआ जाए

हर प्रत्याशी की हसरत को अच्छी तरह टटोले
कोई भले किसी दल का हो सबका चिट्ठा खोले
ईसी जी के अनुशासन का डंडा हर दल पर हो
ईवीएम से अपना पत्ता कट जाने का डर हो
ज़रा सख्ती से वोटिंग कराओ
ये काहे मनमोहन हुआ जाए

✍️ चिराग़ जैन

राजनीति और निष्ठा

जो केजरीवाल कांग्रेस को पानी पी पी कर कोसते थे वे ही दिल्ली में कांग्रेस से गठबंधन के लिए रिरियाते रहे। ताकि किसी भी तरह से सत्ता पाई जा सके। जो भाजपा महबूबा मुफ्ती को गद्दार कहती रही उसी ने सत्ता के लिए महबूबा मुफ्ती से गठबंधन करके सरकार बनाई। जिन नीतीश कुमार ने मोदी के प्रति घृणा के कारण बाढ़ सहायतार्थ भेजा गया गुजरात सरकार का चैक लौटा दिया वही आज भाजपा के साथ हैं। जिस लालू यादव को बिहार का दुर्भाग्य कहते फिरते थे उसी के साथ मिलकर नीतीश बाबू ने बिहार में सरकार चलाई। जो मायावती “तिलक, तराजू और तलवार” का नारा देकर राष्ट्रवादियों को कोसती रही, वे ही राष्ट्रवादियों से गठबंधन कर के मुख्यमंत्री बनीं। जो समाजवादी मायावती के लिए अपशब्दों की वर्षा करते थे वे ही आज मायावती के साथ मिलकर मोदी को हराने निकले हैं। जो शिवसेना मोदी सरकार के चरित्र को छद्म हिंदुत्व की पाठशाला कहते थे, वे ही मोदी सरकार से मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। जो प्रियंका चतुर्वेदी कांग्रेस के गुण गाती रही वे ही कांग्रेस को गुंडों की पार्टी घोषित करके शिवसेना जैसी शांत प्रवृत्ति की पार्टी में चली गईं। जो सिद्धू मोदी जी नू देवता बताते रहे वे ही आज सोनिया जी की शान में कसीदे पढ़ रहे हैं। इसी वर्चस्व की लड़ाई में शिवपाल-अखिकेश, तेजस्वी-तेजप्रताप जानी दुश्मन हो गए हैं। अमरसिंह, जयप्रदा, सुखराम, शत्रुघ्न सिन्हा, रामविलास पासवान, किरण बेदी और शाजिया इल्मी जैसे लीडरों को देख कर समझ आता है कि विचारधारा, नैतिकता, देशहित, देश सेवा और निष्ठा जैसे शब्द केवल वह आटे की गोली है जिसके दम पर कार्यकर्ता नामक मछली फँसाई जाती है। राजनीति शुद्ध धंधा बन चुकी है। इसमें कोई स्थायी मित्र नहीं है, कोई स्थायी शत्रु नहीं है। 23 मई को परिणाम घोषित होने के बाद ये सब देशभक्त रेटलिस्ट लगा लगाकर अपनी निष्ठा का सौदा करेंगे और मंत्रीपद, मुख्यमंत्री पद, घोटाले दबाने की मंज़ूरी, कुछ करोड़ रुपये तथा अन्य राजनैतिक लाभों की कीमत फेंककर लोकतंत्र की इज़्ज़त उतार दी जाएगी। इन बेशर्म धंधेबाज़ों के लिए सामाजिक सद्भाव को होम न कीजिये। देश में राजनीति ही सब कुछ नहीं है। जब ये हमें धर्म, जाति के जुमलों से उकसाएं और हम लड़ने को तैयार न हों तो इनके वैभत्स्य का मनोबल टूटेगा। जो ऊर्जा हम कांग्रेस-भाजपा की बहस में नष्ट कर रहे हैं उसको यदि अपने काम को ईमानदारी से करने में निवेश करें तो सचमुच देश का विकास हो जाएगा। मतदान के समय अपने विवेक से इन सब दुकानदारों में से किसी एक को वोट दे आएं या नोटा दबाकर राजनैतिक हताशा प्रकट करें… इससे अधिक इस लोकतंत्र में वोटर की कोई भूमिका नहीं है। जिसे जो काम मिला है उसे वह काम बेहतर ढंग से करने का प्रयास करना चाहिए। रिक्शा वाला यदि ट्रैफिक के रूल्स मानते हुए सवारी को ठगे या लूटे बिना मंज़िल तक पहुंचता है तो वह भी अपनी क्षमताओं के अनुरूप देश की सेवा ही कर रहा है। हर आम नागरिक की यह चेतना जागृत रही तो यहीं से देश के विकास का मार्ग खुल जाएगा।

✍️ चिराग़ जैन

कमी

मरने की चाह, ज़िन्दगी जीने से कम रही
लहरों की चाल मेरे सफ़ीने से कम रही

दौलत की चमक सबसे ज़ियादा रही मग़र
मजदूर के माथे के पसीने से कम रही

सेहरा की तेज़ धूप में भी तिश्नगी तो थी
पर हिज्र में सावन के महीने से कम रही

ताउम्र मैं ख़ुशी की शक्ल भूल न पाया
आफ़त भी मेरे पास क़रीने से कम रही

✍️ चिराग़ जैन

सम्मानित भारत का ड्राफ्ट

किसी भी देश की समृद्धि संसाधनों के समुचित वितरण पर निर्भर करती है। भारत में संसाधनों की बहुतायत के बाद भी ग़रीबी, अव्यवस्था, अपराध, भुखमरी, बेघरी, बेरोज़गारी, अराजकता और रिश्वतखोरी जैसी समस्याएं कम नहीं हो पा रही हैं। सरकारी योजनाएं केवल कोरा प्रचार बनकर रह जाती हैं और जनता की स्थिति जस की तस रहती है। सड़कें चौड़ी की जाती हैं लेकिन जाम कम नहीं होता, रोज़ नए अस्पताल खोले जा रहे हैं लेकिन मरीजों को अस्पतालों के बरामदों में मरना पड़ता है, खूब रेलगाड़ियां चलती हैं लेकिन आरक्षण नहीं मिलता, स्कूल खुलते जा रहे हैं लेकिन एडमिशन की मारामारी है, खेती ख़ूब होती है लेकिन थालियां रीती हैं। हम इन सब समस्याओं का निदान ढूंढने निकलते हैं और राजनैतिक इच्छाशक्ति, भ्रष्टाचार, जमाखोरी और लालफीताशाही की निंदा में उलझ कर रह जाते हैं। सरकारें आत्मप्रचार के लिए अरबों रुपये के विज्ञापन कर देती है और समस्या वहीं की वहीं रहती है। विपक्ष सरकार के कार्यों की आलोचना करता है पर समस्या वहीं की वहीं रहती है। अफ़सर जैसे तैसे काग़ज़ों का पेट भरते भरते ज़िन्दगी गुज़ार देते हैं पर समस्या वहीं की वहीं रहती है। इतना पैसा, इतनी योजनाएं, इतने अफसर, इतने कर्मचारी, इतनी समाजसेवी संस्थाएं, इतने घोषणापत्र और इतने आंदोलन मिलकर भी देश की किसी समस्या का निदान इसलिए नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि समस्या की जड़ पर कोई चर्चा ही नहीं कर रहा। चमड़ी पर लगे कोढ़ को हटाने के लिए मरहम लेपा जा रहा है पर ख़ून साफ़ करने का उपचार कोई नहीं कर रहा। भारत की किसी भी समस्या को पकड़ कर उसके प्रारंभिक छोर तक कि यात्रा की जाए तो हमें एक ही शब्द दिखाई देगा – “जनसंख्या”। इस एक शब्द के आधार पर भारतीय समस्याओं का मकड़जाल बुना हुआ है। यह एक ऐसी समस्या है जिसको नियंत्रित किये बिना देश के विकास की बातें चुनावी जुमलेबाज़ी से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। हमें हिन्दू-मुस्लिम बनाकर ज़्यादा बच्चे पैदा करने के बयान दिए जाते हैं। यदि गंभीरता से विचार किया जाए तो ऐसा हर बयान राष्ट्रद्रोह जैसा अपराध है। भारतीय लोकतंत्र में वोट की संख्या को ही सत्ता का मापदंड बना दिया गया है। इसके स्थान पर यदि वोट की गुणवत्ता को तवज्जोह दी जाती तो स्थिति इतनी भयावह कभी नहीं होती। किसी भी परिवार के पहले बच्चे को ही मतदान का अधिकार हो, पहले बच्चे को ही सरकारी योजनाओं का लाभ मिले, पहले बच्चे की सरकारी नौकरी की गारंटी हो, पहले बच्चे को आयकर में छूट मिले, पहले बच्चे की शिक्षा तथा स्वास्थ्य मुफ्त हो… यह सुनने में थोड़ा कठोर लग सकता है लेकिन सोचने पर ज्ञात होगा कि जानवरों की तरह अस्पतालों, स्टेशनों, फुटपाथों और झुग्गियों में घिसट रहे भारत को सम्मानजनक जीवन देने के लिए इसके सिवाय अन्य कोई उपाय नहीं है। आज ही कि तिथि से ठीक दस माह के बाद की तारीख़ निर्धारित करके सरकार “एक बालक विधेयक” लागू कर दे कि इस तिथि के बाद जो भी बच्चे जन्म लेंगे उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ तभी मिलेगा यदि वे पहली संतान होंगे। यह कानून अब तक जन्म चुके या गर्भस्थ किसी भी मनुष्य के साथ अन्याय किये बिना जनसंख्या नियंत्रण का चमत्कार कर देगा। अभी भी सरकारी नौकरी में मेटरनिटी तथा चाइल्ड केयर लीव के संदर्भ में इस प्रकार के नियम सफलतापूर्वक क्रियान्वित हैं, इसलिए ऐसे नियमों के क्रियान्वयन में कोई विशेष बाधा नहीं आएगी। सरकार के कुल विज्ञापन बजट का तीस प्रतिशत व्यय इस कानून के प्रसार पर ख़र्च हो तो आज से बीस साल बाद हम उस भारत के दर्शन कर पाएंगे जिसके हर नागरिक को सम्मानपूर्ण जीवन का अर्थ पता होगा।

✍️ चिराग़ जैन

गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हाँक रे…

बुलेट ट्रेन और अंतरिक्ष यान की चर्चाओं के बीच आज कुछ वास्तविक यातायात साधनों की स्थिति ध्यान आ रही है। भारत में एक अदद रेल विभाग है। सड़ांध मारते स्टेशन और देर से चलने के लिए मशहूर रेलगाड़ियाँ इस विभाग की शान हैं। आज़ादी के सात दशक बाद भी भारतीय रेल ने लेटलतीफी की अपनी गौरवमयी परंपरा को बरक़रार रखा है। स्टेशन पर गठरियों की तरह पड़े लाचार यात्री भारतीय रेल की निष्ठा का शिलालेख है। यदि ट्रेन लेट हो जाए तो रेलवे की उद्घोषिका की रिकार्डेड आवाज़ सुनने को मिलती है कि आपको हुई असुविधा के लिए हमें खेद है। यदि रेल विभाग किसी भी कारण से ट्रेन कैंसिल करता है तो यात्री को कोई मुआवजा देने का कोई प्रावधान नहीं है लेकिन यदि यात्री किसी कारणवश अपना आरक्षण रद्द करवाए तो उससे जुर्माना लेने का प्रावधान है। इससे सिद्ध होता है कि भारत एक लोककल्याणकारी गणराज्य है। निजी सेवाओं की ओर देखें तो भारत में कुछ गिनी-चुनी विमानन सेवाएँ हैं जो नागर विमानन मंत्रालय तथा डीजीसीए की देखरेख में कार्य करती हैं। इनमें एयर इण्डिया सरकारी उपक्रम है और इंडिगो, गो एयरवेज़, जेट एयरवेज़, स्पाइस जेट, एयर विस्तारा तथा एयर एशिया निजी क्षेत्र की विमान सेवाएँ हैं। इन सभी कंपनियों का मुख्य कार्य मुनाफ़ा कमाना है, इसके साथ वे कुछ सवारियाँ भी ढो लेती हैं। एयर इण्डिया सरकारी विमान सेवा है। जो क्रमशः इण्डियन एयरलाइंस और एलाइंस एयर जैसी कंपनियों को लील लेने के बावजूद घाटे में चलती है। इसके यात्री अनियमितताओं और अव्यावसायिक रवैये से तंग होकर निजी सेवाओं का प्रयोग करने के लिए विवश हैं। इस कारण एयर इंडिया के जहाज सरकारी कर्मचारियों के दौरे के लिए ही उपयुक्त रहते हैं। निजी विमानन सेवाओं में किरायों को नियंत्रित तथा तर्कयुक्त बनाने का कोई प्रावधान नहीं है। भारतीय रेल की तरह फ्लाइट कैंसिल होने की स्थिति में मुआवजे का कोई विकल्प नहीं है किंतु यात्री द्वारा आरक्षण रद्द कराने पर सामान्यतः उसके आरक्षण का लगभग सारा पैसा जब्त कर लेने की सुविधा विमानन सेवाओं के पास है। फ्लाइट विलंबित होने की स्थिति में यात्रियों को होने वाले आर्थिक, व्यावसायिक, सामाजिक तथा व्यक्तिगत नुक़सान के लिए न कोई पूछता है न ही इस संदर्भ में कोई दिशानिर्देश बनाए गए हैं। डीजीसीए और नागर विमानन मंत्रालय इन कम्पनियों के बकाया, उधारी और सुरक्षा मानदंडों के क्रियान्वयन में इतने तल्लीन हैं कि उनके पास यात्रियों के संकटों की ओर देखने का समय ही नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि भारत एक लोककल्याणकारी गणराज्य है। सड़क यातायात में हर राज्य का अपना सड़क परिवहन निगम है। इन निगमों की सामान्य बसों से सरकारी तंत्र की सूरत मिलाई जा सकती है। हाँ, अंतरराज्यीय बस सेवाओं में राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश जैसे अनेक राज्यों ने वॉल्वो तथा अन्य लग्जरी बसें मुहैया करवाई हैं जो समुचित किरायों में सुविधाजनक सफ़र की मिसाल हैं। स्थानीय सेवाओं में मुम्बई की बस सेवाओं की व्यवस्था उदाहरणीय है। शेष शहरों में स्थानीय बस परिवहन की दशा बेहद शोचनीय है। दिल्ली में तो ब्ल्यू लाइन, रेड लाइन, ग्रीन लाइन, व्हाइट लाइन जैसे विविध प्रयोग काफ़ी शानदार तरीके से विफल हुए हैं। हाँ डीटीसी की क्लस्टर बसों से आशा बंधी थी लेकिन ब्ल्यू लाइन (जिसे किलर लाइन भी कहा जाता था) के बेरोज़गार ड्राइवरों की कॉन्ट्रेक्ट बेस पर भर्ती होने के बाद से इन बसों का दिल्ली की सड़कों पर आतंक देखते ही बनता है। बीच में “अंडर डीटीसी परमिट’ वाली योजना के तहत ऐसी बसें चलीं थीं जिनमें ड्राइवर बस मालिक का होता था और कण्डक्टर डीटीसी का। मेरे विचार में यह योजना सफल तथा निर्विवादित थी। इसको बन्द किये जाने का कारण मुझे ज्ञात नहीं हो पाता। दिल्ली, कोलकाता, मुम्बई, जयपुर, नागपुर और लखनऊ जैसे कुछ शहरों में मेट्रो रेल भी पब्लिक परिवहन का एक विकल्प है। इनमें दिल्ली मेट्रो सर्वाधिक सफल है। कोलकाता मेट्रो पूर्णतः जीर्णोद्धार की मांग करती है। शेष अपने शुरुआती दौर में हैं। टैक्सी सेवाओं की स्थिति भी भाषाओं की तरह तीन कोस पर बदलती रहती है। मुम्बई और कोलकाता में ऑटो रिक्शा तथा टैक्सी सेवाएं सुव्यवस्थित तथा परिपक्व हैं। दिल्ली में टीएसआर सेवाएँ मनमाने किरायों, ड्राइवरों की गुंडागर्दी और पुरानी खटारा गाड़ियों के कारण नगण्य है। हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों तथा कुछ मुख्य स्थानों पर प्रीपेड बूथ बनाए गए हैं लेकिन आवश्यकता के सामने इनकी संख्या भी नगण्य ही है। टीएसआर की नाकामी और मनमानी के कारण भारत में रेडियो टैक्सी सेवाओं का तेज़ी से प्रचलन बढ़ा। सस्ते दामों के दावों, डोर टू डोर सर्विस, साफ़ सुथरी गाड़ियों और डिस्काउंट कूपन्स के विज्ञापनों ने सबके मोबाइल में ओला और ऊबर की एप्प साइन अप करवा दी। ऑटो रिक्शा चालकों ने अपने ऑटो रिक्शा बेच बेचकर इन कम्पनियों में गाड़ी चलानी शुरू कर दी। सवारियों ने फ्री राइड और सस्ते किरायों के लोभ में इन सेवाओं की आदत डाल ली। और एक बार आदत पड़ जाने के बाद इन कम्पनियों ने एक शब्द से हमारा परिचय करवाया, और वह शब्द था ‘सर्ज’। यह सर्ज निरंतर हमारी जेब पर दर्ज होता रहता है। स्थिति यह है कि आठ रुपये प्रति किलोमीटर का विज्ञापन करने वाली ओला/ऊबर अब पन्द्रह से बीस रुपये प्रति किलोमीटर सामान्य स्थितियों में वसूल रही हैं और चालक को सवा छह से ग्यारह रुपये प्रति किलोमीटर अदा करके शेष गड़प कर रही हैं। सरकार ने इन कम्पनियों के नाम सर्ज न लगाने का फ़रमान जारी किया तो था लेकिन वह फ़रमान अब न तक सरकार को याद है, न ओला/ऊबर को और न ही सवारियों को। निजी कंपनियां धड़ल्ले से सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र में चांदी कूट रही हैं और जनता इस लोककल्याणकारी गणराज्य के फटे जूते से अपना सिर पीट रही है। रोड टैक्स, टोल टैक्स, एमसीडी टैक्स, पार्किंग चार्ज और डीजल-पैट्रोल की क़ीमतें जैसी कीलों ने आम नागरिक के वाहनों में अनगिनत पंक्चर कर दिए हैं और देश के विकास की गाड़ी दौड़ने का शोर करते हुए रेंग रही है।

✍️ चिराग़ जैन

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