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कर्ण का परिताप

तुम प्रपंचों में समय अपना खपाना मैं समर के हर नियम को मान दूँगा तुम बदलकर वेश मुझसे मांग लेना मैं कवच-कुण्डल ख़ुशी से दान दूँगा हाथ की सारी लकीरें हैं विरोधी अब भला कुछ झोलियों का रीतना क्या न्याय से या सत्य से सम्भव नहीं जो झूठ कहकर उस समर को जीतना क्या तुम निहत्थे...

लड़ाई की संभावनाएं

सुर-असुर; शैव-वैष्णव; कौरव-पाण्डव; आर्य-द्रविड़, बौद्ध-वैष्णव, जैन-बौद्ध, हिन्दू-मुस्लिम, भारतीय-अंग्रेज, ऊँच-नीच और अमीर-ग़रीब का परस्पर संघर्ष तो समझ लिया हमने! लेकिन रजवाड़े आपस में क्यों लड़े, मराठा-पेशवाओं में आपसी संघर्ष क्यों था, मुग़ल आपस में क्यों एक न हुए, मौर्यो...

दलित का होत

भैये यो दलित दलित का होत है। कछु नाय होत भाई। ई सब नेता-ऊता पहिले चुनाब-चुनाब की कुश्ती खेलत हैं, फिर हिन्दू-मुसलमान की कबड्डी। अऊर जब सबन से उकता जइहैं तब दलित-उलित का सलीमा लगा लई हैं। ✍️ चिराग़...
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