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ठौर ना पाया

कौन कहता है नदी सागर को प्यारी हो गयी ठौर ना पाया मिठासों में तो खारी हो गयी टूटकर बिखरी कहीं जब भी, तभी झरना बना पत्थरों ने गोद में लेकर कहा- ‘मरना मना’ सिर झुकाकर बढ़ चली पर चाल भारी हो गयी ठौर ना पाया मिठासों में तो खारी हो गयी घाट तक पहुँची, उलझकर रह गयी संसार में...

साईं बाबा

पहले शंकराचार्य जी ने बताया की साईं बाबा हिन्दू नहीं थे फिर उलेमा साहब ने बताया कि साईं बाबा मुसलमान भी नहीं थे ……तो क्या समझा जाए? क्या साईं बाबा इन्सान थे! ✍️ चिराग़...

बोगनवेलिया

सारा शहर सज उठा है तुमसे बरसात नहीं हुई तो भी… मायावी हो तुम बोगनवेलिया कभी कतार बाँध कर खड़े हो जाते हो तेज़ दौड़ती सड़क के दोनों ओर कभी लिपट जाते हो किसी वृक्ष से और कभी ऐसे ही बस उग आते हो निरुद्देश्य जहाँ-तहाँ तुम ऊँच-नीच नहीं जानते छोटा-बड़ा भी नहीं भाषा-धर्म समझते ही...

विरोध

देर तक खड़ा रिरियाता रहा बादल लेकिन नीम रूठा ही रहा न तो पाथेय दिया निंबोरी का न ही आंगन सँवारा नीमपुष्प से। लेट आए हो ना बदरा अब भुगतो भूख सहोगे तो समझोगे किसी की प्यास! ✍️ चिराग़...

मुल्क़ को स्वर्ग बनाने का ख़्वाब

अब इस तरह से अमन ये वतन न पाएगा सियासती कभी जनता का मन न पाएगा मुल्क़ को स्वर्ग बनाने का ख़्वाब देख तो लें मगर सियासती लोगों से बन न पाएगा ✍️ चिराग़...
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