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बँटवारा

आदमी की तरह जन्मते ही बँट जाते हैं भाव भी अलग-अलग जातियों में अलग-अलग धर्मों में। प्रसव की पीड़ा भावों की दुनिया में भी एक जैसी है। और वहां भी आ चुकी है कवि का पेट चीरकर सर्जिकल डिलीवरी की प्रक्रिया। बढ़िया ही है इस तकनीक में दर्द नहीं सहना पड़ता! देवनागरी की देह में क़ैद...

मन की कविता

कविता मेरे अस्तित्व का आधार है। यदि मुझसे मेरी कविताओं को श्रेणीबद्ध करने को कहा जाए तो मैं अपनी तमाम रचनाओं को दो वर्गों में रखूंगा- एक ‘मंच की कविता’ और दूसरी ‘मन की कविता’। ‘मंच की कविता’ रोज़ रात को कवि-सम्मेलनों में तालियाँ और वाह-वाही लूटती फिरती है। लेकिन ‘मन की...

ब्लॉगर होगा पहला कवि

युग बीत गये हैं अब प्रकृति, बरखा या दर्द सहायक सामग्री नहीं है अब कविता के लिये! …अब नहीं जन्मती कविता वियोग या संयोग से! आजकल फ़ेसबुकिये हो गये हैं वाल्मीकि और तुलसीदास! “ब्लॉगर होगा पहला कवि पोस्ट से उपजा होगा गान!” ✍️ चिराग़...

विचार और मूर्त

दिल की ज़मीन पर जो इक बीज पड़ गया है हर हाल में फलेगा, ये सृष्टि का नियम है कोई विचार मन में, आकर ठहर गया तो जन्मों-जनम पलेगा, ये सृष्टि का नियम है सुख-दुख के चंद पल हैं, जीवन जिसे हैं कहते युग-युग के चक्करों में, बिन बात फँसते रहते अज्ञानवश जो अपना गुलशन उजड़ गया है वो...

गीत विरह के

जाने क्या-क्या सह के लिक्खे ये जो गीत विरह के लिक्खे मेरा तो बस नाम लिखा है तूने मुझमें रह के लिक्खे ✍️ चिराग़...
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