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रेशम है कविता

रेशम है कविता झट से फिसल जाती है उंगलियों को चूमती हुई। थाम लेते हैं इसे जीवन के खुरदरे अनुभव। दर्द रिसता तो होगा। पीर बहती तो होगी। कौन जाने क्या ज़्यादा दुखदायी है दर्द का रिसना या रेशम का फिसलना? …डर लगता है गुलाबी छुअन से। रेशम का कसता फंदा सहला भर जाता है...

क्या कर लेगा ऊलाला

सौम्य धुनों से क्या जीते रीमिक्सों का गड़बड़झाला ओरिजनल से पस्त रहेगा, हर नकली-शकली वाला जब महफ़िल में गुंजित होगी, बच्चन जी की मधुशाला क्या कर लेंगी शीला-मुन्नी, क्या कर लेगा ऊलाला ✍️ चिराग़...

सिर्फ़ हंगामा

आज स्वर्गीय दुष्यंत कुमार पर बहुत गुस्सा आ रहा है। उनका एक शेर पूरे हंगामे की जड़ बन गया है। पहले कोई भी विवाद खड़ा करने से पहले हर आदमी को यह भय रहता था कि मुझे कलेसी समझा जाएगा। लेकिन अब दुष्यंत ने सब कलेसियों को सुविधा दे दी है कि जब के कलेस करो और अंत में दो मिसरे...

ग़ज़लों की सादा बस्तियों को चूम आता हूँ

नज़र की शोख़ियों को, मस्तियों को चूम आता हूँ जे़ह्न में तैरती कुछ कश्तियों को चूम आता हूँ ठहाकों के मुहल्ले में सजी महफ़िल से उठकर मैं हसीं ग़ज़लों की सादा बस्तियों को चूम आता हूँ ✍️ चिराग़...

वंदना के गीत

जश्न में खोने से पहले दो घड़ी ख़ुद को जगा लें उत्सवों की देहरी पर देवताओं को मना लें मुस्कुराहट दिव्य हो जाएगी गर दो पल ठहर कर उल्लसित होने से पहले वंदना के गीत गा लें ✍️ चिराग़...
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