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संवाद कविता

आगे के सफ़हों पर जो कुछ है वह भी है तो गोमुख निसृत गंगाजल ही, लेकिन इसका संचय जिस पात्र में किया गया है वह किंचित आधुनिक है। यह खण्ड फेसबुक पर हुई चर्चाओं का यथावत् संकलन है। इसमें मित्रों से हुई काव्यात्मक चैटिंग को जस का तस समायोजित किया गया है। इस खण्ड में केवल...

सृजन का आत्मविश्वास

जब मन से निःसृत शब्दों का हर आभूषण बहुत खरा हो अपनेपन का भाव किसी पल अंतस् में आकंठ भरा हो जब दर्शन का दंभ भुला कर निश्छल स्रोता स्वयं झरा हो या भौतिक सुख की दलदल में निस्पृहता का पल उभरा हो उस पल चाहे पूजन लिख दूँ चाहे प्रणय निवेदन लिख दूँ जीवन की अभिलाषा लिख दूँ...

अंजुरी

तुमसे मिलते ही बह निकलती हो कविता -ऐसा नहीं है। न तो मोम है कविता न ही आग हो तुम। तुम तो अंजुरी हो छपाक से भर जाती हो कविता में डूबकर! ✍️ चिराग़...

चौरकर्म

फेसबुक के प्रयोक्ताओं को रोज़ कुछ अच्छा स्टेटस डालने का शौक तो चर्रा गया है, लेकिन इसके साथ अपनी सृजनात्मक क्षमता बढ़ाने की ललक नहीं जगी। ऐसे में दूसरों की प्रोफाइल से स्टेटस या स्टेटसांश कॉपी करके अपनी timeline पर पेस्ट करने की प्रवृत्ति बढ़ गयी है। इसमें कोई बुराई तो...

पीड़ा जगनी थी

अन्तस् में पीड़ा जगनी थी, यह निर्धारित था ठेस अपेक्षा से लगनी थी, यह निर्धारित था रत्ना तो बस बानक भर थी, पूरे किस्से में तुलसी को मानस् रचनी थी, यह निर्धारित था ✍️ चिराग़...
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