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अद्भुत थे प्राण।

अपने हर चरित्र में जो मनोवैज्ञानिक इंजीनियरिंग की वो कमाल थी। चाचा चौधरी का दिमाग़ बड़ा बनाया और होंठ मूछ में छुपा दिए। साबू का शरीर बड़ा बनाया। पिंकी, बिल्लू, चाची इन सबके आकार में एक प्रकार था। साबू जैसे चरित्र की कल्पना कार्टून जगत् में एलियन का प्रादुर्भाव था। संभवतः यह चरित्र भारतीय बच्चों का एलियंस से पहला परिचय है।
कैरिकेचर की दुनिया में वे एक नयी धारा के संयोजक थे। काल्पनिक चरित्रों को उन्होंने सूरत दी, पहचान दी। और खुद की पहचान को केवल एक साधारण से हस्ताक्षर तक सीमित करलिया।
बचपन के कनवास पर कौतूहल मिश्रित हास्य के बीज बोने वाले प्राण महान थे।
विनम्र श्रद्धांजलि

✍️ चिराग़ जैन

अभी बुलेटिन जाना है

कोसी का बढ़ता पानी तीन दिन मीडिया में बहता रहा। कोसी भी उचक-उचक कर देखती रही कि ख़बर में क्या चल रहा है। एक ही ख़बर को बार-बार देख बेचारी बोर हो गयी। बिहार देखता रह गया और कोसी उतार पे आ गयी।
किसी ने पूछा कि इतना सारा पानी (जो पूरे बिहार पर आफ़त बनकर टूटने वाला था) आख़िर अचानक कहाँ हवा हो गया। मैंने कहा- “पानी था ही नहीं, हवा ही थी। जो थोड़ा-बहुतेरा पानी आया था, सो मीडिया ने पी लिया।”
ठीक इसी तरह की आफ़त महीने भर पहले पॉवर प्लांट्स में कोयले की कमी को लेकर मची थी। पूरा देश अँधेरे में डूबने वाला था। खबर करंट की तरह दौड़ी। हा-हाकार मच गया। एनटीपीसी और अन्य पॉवर कम्पनियां अपना-अपना कोयला टटोलने लगीं। कोयला, जो पहले भी मीडिया का एक्सपीरियंस होल्डर रहा है, चुपचाप सारा तमाशा देखता रहा। दो दिन हल्ला मचा। ख़बर भी चलती रही और बिजली भी।
2012 में दुनिया ख़त्म होनी थी, नहीं हुई। मीडिया ने बचा लिया। फिर कानपुर में सोना निकलना था, नहीं निकला।शायद मीडिया से घबराकर किसी बिल में जा छुपा। साईं-शंकराचार्य विवाद पर हिन्दू-हिन्दू दंगे होने थे, नहीं हुए। ईश्वर ने स्वयं आकर मिडिया के पैर जो पकड़ लिए।
मैंने एक वरिष्ठ पत्रकार से पूछा- “उत्तरदायित्व का मतलब समझते हैं आप?”
वो बोले – “आधे घंटे बाद समझूंगा यार, अभी बुलेटिन जाना है।”

✍️ चिराग़ जैन

फ्रेंडशिप

“भाई नी है… दिखा दे ना।” उसने मेरे ठीक पीछे वाले बेंच पर से फुसफुसा कर कहा। मैं थोड़ा सा सरक गया।
“साले ढंग से दिखा वरना रहने दे।”
“अबे तो मैं अपना न लिखूँ।”
“अच्छा बस एक मिनिट।”
“एक बार में देख ले, फिर नहीं दिखाऊंगा। इत्ता लम्बा पेपर है, तेरे कारण मेरा भी रह जाएगा।”
“अबे मैं फेल हो गया तो तुझे अच्छा लगेगा।”
मेरी शीट उसके पास थी और मैं एक्स्ट्रा शीट पर अगला आन्स्वर लिखने लगा।

ये मेरी स्मृतियों में मौज़ूद दोस्ती का पहला एहसास है। जिसने मुझे अपनत्व के अधिकार का सुख महसूस करना सिखाया।
दोस्ती अद्भुत रिश्ता है। अपने लिए जीने की तमाम व्यवहारिक-नैतिक शिक्षा के बीच दोस्ती का अध्याय हमें दूसरों की संवेदनाओं का सम्मान करना सिखाता है। मेरे पास इस रिश्ते का भरपूर एहसास है।
दो-दो रुपयों के लिए लड़ते हुए शुरू हुई दोस्तियाँ आज बीस-बीस हज़ार की बेहिसाबी तक पहुँच गयी है। नोटबुक मांगने का अधिकार आज गाड़ी मांगने तक पहुँच गया है। सफ़र ज़ारी है। बड़ी ज़ोरदार ग्रिप है इस रिश्ते की। तेज़ दौड़ते रास्तों पर कई झटकों ने हाथ छुड़वाने की कोशिश की; पर….. सफ़र ज़ारी है।

✍️ चिराग़ जैन

अश्लीलता – अश्लीलता

अश्लीलता समाज के लिए हानिकारक है और समाज अश्लीलता के लिए। पार्क में पेड़ के पीछे बैठी लड़की तभी अश्लील कही जा सकती है जब वो मेंरे साथ न बैठी हो। यदि उसको मेरे साथ बैठने में ऐतराज़ न हो तो मुझे नाक-भौं चढाने वालों को अनपढ़ और मैनर्सलैस कहने में क्या एतराज़ हो सकता है।
पड़ोसी की बीवी को कपड़े सुखाते देखकर आहें भरनेवाले जब उसको दूधवाले से हंसकर बात करते देखकर बातें बनाते हैं तो ऐसा लगता है जैसे योगाचार्य उबकाई को चिगलते हुए हाज़मा दुरुस्त करने की कसरत करा रहा हो। लेकिन योगाचार्य कसरत कराता है साहब। उबकाई आती रहती है। कसरत करने वाले हाथ हिलाते रहते हैं। कसरत करने वालियां सांस लेती रहती हैं। कसरत कराने वाला भी सांस लेता रहता है।
खैर छोड़िये हम अश्लीलता पर थे।
योगा में अश्लीलता कहाँ। अश्लीलता अंग्रेजी में अश्लीलता नहीं रहती। उन गलियारों में वो मॉडर्न होती है। अश्लील लोग लड़कियों को पीठ पीछे माल, बम, पटाखा, आइटम जैसे भद्दे शब्दों से बुलाते हैं लेकिन सभ्य लोग उनको मुँह पर बेहिचक हॉट और सैक्सी कहते हैं । वो एडवांस जो हैं।
अश्लीलता का दायरा लिंगभेद भी जानता है। फिल्म के पोस्टर पर सनी लियोने का भीगे कपडे से ढंका चित्र अश्लील है लेकिन पीके के पोस्टर पर आमिर खान का रेडियो की ओट में समाया बदन आर्टिस्टिक है। रेडियो और कपडे का क्या मुकाबला साहब। रेडियो आमिर खान को पसंद है। इसलिए वो ग्रेट है। सनी की चद्दर में कहाँ कुछ छिपता है यार। इसलिए विरोध हुआ। हमें अंडर एस्टीमेट कर डाला। हमने साड़ी वाली माधुरी को भी उसी सौन्दर्यपरक नज़र से देखा था, ये भीगी चद्दर वाली…..हुँह।
सड़क पर खड़ी लडकियों को जब कोई गुंडा छेड़ता है तो अक्षय कुमार उसकी धुलाई कर डालते हैं। क्योंकि वो हीरो हैं। फिर अक्षय कुमार खुद उनको छेड़ते हैं। लेकिन वो अश्लील थोड़े ही हैं, वो तो हीरो हैं।

✍️ चिराग़ जैन

पुनरागमन

आज मुद्दत बाद
मेरा गीत मेरे द्वार आया

बात में उसकी कहीं कोई परायापन नहीं था
और मेरी याद से भी थी नदारद हर शिक़ायत
ठीक पहले सी सहजता थी हमारे बीच लेकिन
आँख की इक कोर पर थी सहज होने की क़वायद
आज ख़ुद से मैं उसे ख़ुद को छिपाते देख पाया

आज से पहले उसे छूना हुआ सौ बार लेकिन
आज उसका ग़ैर हो जाना रड़क कर चुभ रहा था
बस रहा था आज भी दिल में उसी के मैं मगर अब
इस बसावट में किसी का डर धड़क कर चुभ रहा था
आज उसका खिलखिलाना एक पल को कँपकँपाया

आज पहली बार था संवाद सपनों से अछूता
आज पहली बार मिलने का बहाना ढूंढना था
आज पहली बार बातें ख़त्म होती दीखती थीं
आज पहली बार बातों में ज़माना ढूंढना था
आज का अख़बार पहली बार अपने बीच पाया
✍️ चिराग़ जैन

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