+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

नाय पलटी सरकार

पायलट ऐसी-तैसी कर गौ, उलटो पर गयो वार
पूरा जोर लगाया फिर भी नाय पलटी सरकार

होटल-होटल नेता दौड़े, दिल्ली दौड़ी आस
सेंटर दौड़ा, जयपुर दौड़ा, सबकी फूली साँस
गुरुग्राम में लोकतंत्र का हो न सका उपचार
पूरा जोर लगाया फिर भी नाय पलटी सरकार

कांग्रेस में गाली गूंजी, बीजेपी में दाम
कैसे अपने लोकतंत्र की भली करेंगे राम
नए नोट हैं सूटकेस में, सत्ता है व्यापार
पूरा जोर लगाया फिर भी नाय पलटी सरकार

✍️ चिराग़ जैन

संदर्भ: सचिन पायलट को मोहरा बनाकर राजस्थान में सरकार गिराने की कोशिश नाकाम

मानवता को श्रद्धांजलि

ऋषि कपूर के निधन पर कुछ लोगों ने उन्हें हिन्दू विरोधी कहकर उनको श्रद्धांजलि देनेवालों को लानत भेजी। अमित शाह जी के कोविड संक्रमित होने पर भी कुछ संवेदनहीन लोगों ने नंगा नाच किया। राहत इंदौरी जी के निधन पर भी इस प्रवृत्ति को मुखर होते देखा।
यह किस समाज की स्थापना कर रहे हैं हम लोग? मतभेद को घृणा के किस मुकाम तक ले आए हैं हम? देर तक विचार किया, तो समझ आया कि जिस देश में धर्म अथवा जाति के आधार पर बने किसी राजनैतिक दल को संविधान में वैध नहीं माना जाता, उस देश की पूरी राजनीति धर्म और जाति के आधार पर समाज में घृणा फैलाने में सफल हो गई है।
विश्वास कीजिये, राजनीति का सिर्फ़ एक ही धर्म होता है और वह है सत्ता। इस धर्म के निर्वाह के लिए आध्यात्मिक मूल्यों से लेकर विचारधारा तक सबकी बलि चढ़ाई जा सकती है। जो आपसे आपके हिन्दू होने या मुस्लिम होने की दुहाई देकर वोट मांग रहा है, जो आपको दलित या सवर्ण होने का वास्ता देकर वोट मांग रहा है, वह किसी भी स्थिति में देश को समग्र विकास के पथ पर नहीं ले जा सकेगा।
राजनीति ने हमें विधर्मियों की घृणा से इतना लबरेज कर दिया है कि हम अपने ही धर्म के संस्कार भूल गए। ‘चाहे मय्यत हो किसी की, बढ़ के कंधा दीजिये, रंजिशें अपनी जगह, इंसानियत अपनी जगह’ – यह बात तो हमारी मनुष्यता की पक्षधर जान पड़ती है, इस बात ने तो कभी कहीं कोई दंगा नहीं करवाया! फिर हम इसको कैसे भूल गए?
मेघनाद की मृत्यु के उपरांत उसके शव को ससम्मान उसके परिजनों तक पहुँचानेवाले राम; अपनी पत्नी के अपहृता रावण तक कि मृत्यु को अपमानित न करने वाले राम; शत्रु की मूर्च्छा का उपचार करनेवाले सुषेण; शाप देने वाले श्रवण कुमार के माता-पिता की अंत्येष्टि करनेवाले दशरथ ….क्या कुछ भी याद नहीं रहा हमें। अभी तो राम मंदिर के शिलान्यास की ईंट भी ढंग से नहीं जमी कि हमने राम के समस्त आचरण से मुँह फेर लिया।
अनजाने शव को भी ससम्मान पंचतत्व में विलीन करनेवाले इस देश की संवेदनाएँ इतनी भौंथरी कैसे हो गईं भाई!
हमें क्यों नहीं समझ आता कि अनजाने ही जिन दलों के एजेंट बनकर हम आपस का व्यवहार कलुषित कर रहे हैं, उनके लिए हमारा धार्मिक मनोबल केवल वोट जुटाने का एक ज़रिया भर है। जिन विचारधाराओं के पीछे हम अपने अड़ोस-पड़ोस के लोगों से घृणा कर रहे हैं चुनाव का बाद सत्ता का जोड़-तोड़ के लिए उन विचारधाराओं का बलात्कार करने से पहले, हमसे एक बार पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा जाता।
मैं यहाँ उस हर दल की बात कर रहा हूँ जो ख़ुद को दक्षिणपंथी, वामपंथी, सेक्यूलर या अन्य किसी भी तमगे से नवाज़ने का ढोल पीटते हैं। यदि इनके पास सिद्धांत, नैतिकता या विचार जैसा कोई शब्द होता तो मूर्ति को फिजूलखर्च कहनेवाले आज ब्राह्मणों का वोट पाने के लिए मूर्ति बनवाने की घोषणा न कर रहे होते। यदि ये विचार के ही प्रति समर्पित होते तो वामपंथी दल राजग में कभी न रहे होते। कश्मीर में वह सरकार कभी न बनी होती जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।
लेकिन इस सबके लिए राजनीति ही दोषी नहीं है। हम भी तो परशुराम की मूर्ति देखते ही उन नेताओं की पिछली करतूतें भूल जाने में माहिर हैं। हम भी तो राहुल गांधी का जनेऊ देखकर उसके धर्म पर बुलेटिनों में बहस करने लगते हैं।
हमें क्या लेना-देना, तुम्हारे धर्म से। तुम जनेऊ पहनो या न पहनो। तुम टोपी लगाओ या न लगाओ। तुमने चाय बेची या शोरूम चलाया… इस सबसे हमें क्या मतलब! हमें तो यह बताओ कि देश कैसे चलाओगे? हमें तो यह बताओ कि न्याय व्यवस्था कैसे सुधरेगी? हमें तो यह आश्वस्ति चाहिए कि हमारे वोट का दुरुपयोग तो नहीं करोगे?
किसी भी दल में सारी अच्छाइयाँ नहीं हो सकतीं। इसीलिए सभी दलों की थोड़ी-थोड़ी अच्छाई के दम पर लोकतंत्र की गाड़ी चलती रहती है। लेकिन आजकल लगभग सभी दलों में एक बुराई ज़रूर घर कर रही है कि किसी धार्मिक मुद्दे को उछाल दो तो जनता आपस में लड़कर ख़ुश रहती है। इस बुराई के लिए केवल जनता ज़िम्मेदार है। और जनता ही इस कैंसर से देश की राजनीति को मुक्त कर सकती है।
अब हम मृत्यु पर भी गाली-गलौज करने लगे हैं। कम से कम अब तो दो मिनिट का मौन रखकर इस मरती हुई मानवता को श्रद्धांजलि देने का प्रयास करें।

✍️ चिराग़ जैन

रोटी मांगे पेट

राम जी का मंदिर बनैया रे, बनैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे
सरयू जी के तट पर रमैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

रामराज की फील करा दो, सब कुछ कर दो सेट
भूखे पेट भजन का करिहैं, रोटी मांगे पेट
कित्ते दिन मंझीरा बजैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

थाली और कटोरी देखें दो रोटी की राह
चूल्हा ठण्डा पड़ा सीगड़ी कब से रही कराह
बैठी-बैठी घूरे कढ़ैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

पैटरोल के दाम डराते, देस रहा है झेल
सारी पूंजी हर कर ले गया, रावण बनकर तेल
कैसे अब गड़िया चलैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

✍️ चिराग़ जैन

घूरे में पड़ा अतीत: आशापुरी

भोपाल के पास एक छोटा-सा कस्बा है, आशापुरी। यहाँ उत्खनन में कुछ प्राचीन मंदिरों के अवशेष मिले हैं। सड़क किनारे एक अहाते में खुले चौक में लाल पत्थर की भव्य मूर्तियाँ रखी गई हैं। पूछने पर पता चला कि खुदाई में इन्हें बरामद करने के बाद यहाँ रखा गया है। सर्दी, गर्मी, बरसात में यह बहुमूल्य धरोहर बेकद्री की शिकार है।
इन मूर्तियों का पुरातात्विक महत्व तो है ही, लेकिन इनको देखकर जो आस्था उपजती है, वह तो मूल्यातीत है। केयरटेकर टाइप के एक लड़के से पूछा कि इनकी ख़ैर-ख़बर लेने कोई आता है क्या, तो वह बेपरवाह होते हुए बोला- ‘कोई कछु ना पूछै साहब!’ उसकी बात का प्रमाण खोजते हुए इन अवशेषों की पड़ताल की तो देखा गंधर्व, तोरण, देहरी, वेदी, गणेश, महावीर, कुबेर, शिव, विष्णु, नृसिंह, नवावतर, इंद्र और न जाने कितने ही शिल्प यहाँ खुले में पड़े अपने उद्धार की राह देख रहे हैं। इनमें से कुछ खंडित हैं और कुछ समय की मार से स्वयं को बचा लाए हैं।
घूरे में पड़ी इन मूर्तियों पर पीपल और जंगली घास ने दस्तक देनी शुरू कर दी है। एक तराशे हुए विशाल पत्थर पर हरियाली बेल ऐसे इठलाकर बढ़ी है जैसे शिल्पी द्वारा पत्थर पर तराशी हुई बेल से ईश्वर अपनी बेल की प्रतियोगिता कर रहा हो। इस विलक्षण सौंदर्य को निहार ही रहा था कि अचानक ऐसा लगा जैसे ये हरी बेल इन मूर्तियों को ताना मार रही हो कि, ‘धरती मैया की गोद में रहकर तो दम घुटता था, अब यहाँ घूरे में पड़कर चैन मिल गया!’
आस्था और इतिहास पर गर्व करनेवाली संस्कृति में यह दृश्य मन को भीतर तक कचोट गया। इधर क्षोभ बढ़ रहा था, उधर कौतूहल। इसी कस्बे में आगे एक पहाड़ी जैसे इलाके की चोटी पर वह स्थान देखने को मिला जहाँ से ये मूर्तियाँ निकाली गई हैं। देखकर, समझा जा सकता है कि यहाँ कभी कितना भव्य देवालय रहा होगा! पत्थर का एक भी टुकड़ा ऐसा न मिला जिस पर किसी कलाकार ने नक्काशी से कोई आस्था न उकेरी हो।
क गर्भगृह अभी भी लगभग गर्भगृह जैसा ही लग रहा है। उसमें शिवलिंग का स्थान अभी तक यथावत है। किन्तु उसमें से शिवलिंग निकालकर एक पुजारी ने पास के ही मंदिर में स्थापित कर लिया है। अब जब भी कोई ‘पर्यटक’ इन खंडहरों की दुर्दशा देखने आ जाता है तो पुजारी जी वह शिवलिंग दिखाने के बहाने उसे अपने नवनिर्मित मंदिर में ले आते हैं और वहीं माथा टिकवाकर उससे दक्षिणा की डिमांड करते हैं। इस दृश्य पर अपने स्थान से अलग हुआ शिवलिंग ठठाकर हँस पड़ता है कि चलो इतने बड़े मंदिर का कोई हिस्सा तो किसी का रोज़गार बन सका।
यह मुझे नहीं पता चला कि यह अमूल्य धरोहर किसी धर्मांध आततायी की कट्टरता का शिकार हुई है या फिर धरती की किसी करवट ने ईश्वर के इस भव्य मंदिर को तहस-नहस कर डाला है। लेकिन इतना मुझे ज़रूर समझ आया कि अब, जब यह अमूल्य धरोहर स्वतः ही अपनी गर्द झाड़ कर चमकना चाह रही है तब सरकारी ढर्रे की लापरवाही इन खण्डहरों को दिन-प्रतिदिन जर्जर किये जा रही है।

✍️ चिराग़ जैन

थाने मत जइयो

हमारे यहाँ पूरा पुलिस महक़मा दर्शनशास्त्र के इसी सिद्धांत पर कार्य करता है कि बड़ी समस्या आते ही मनुष्य को अन्य समस्याएँ छोटी लगने लगती हैं। इसीलिए आप कोई भी समस्या लेकर थाने जाइये, पुलिसवाले उसे टुच्चा सिद्ध करने के लिए तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। तब आपको पता चलता है कि जिसे आप समस्या समझ रहे थे, वह तो दरअस्ल समस्या थी ही नहीं। समस्या तो वह है, जो आपने थाने आकर मोल ली है।
थाने में आपको जीवन का असली ज्ञान मिलता है। नैतिक शिक्षा की पोथियों में छुपा जो ज्ञान सीखने से मनुष्य चूक जाता है, वह थाने में उसे चुटकियों में प्राप्त हो जाता है। जैसे, मनुष्य को अहंकार नहीं करना चाहिए। जीवन का यह दिव्य सूत्र सिखाने में बड़े-बड़े संत-फ़क़ीर विफल हो गए। लेकिन थाने पहुँचते ही पुलिसवाले जिस भाषा में आपसे बात करते हैं, आप तुरंत समझ जाते हैं कि किस बात का अहंकार करना है! जिसे बातों से समझ नहीं आता उसके लिए पुलिसकर्मियों के पास एक विशेष विशारद पाठ्यक्रम भी है। इस पाठ्यक्रम के निष्फल होने का आज तक कोई प्रमाण मनुष्य जाति के पास नहीं है।
अव्वल तो आपकी समस्या पर सुनवाई की ही नहीं जाएगी। ऐसा इसलिए नहीं, कि पुलिस महक़मा आपकी समस्या को लेकर गंभीर नहीं है, वरन इसलिए कि आपको समझाया जा सके कि जिस धन की चोरी की रपट आप लिखवाने आए हैं, वह सब मोह-माया है। इसलिए रपट लिखने की बजाय आपको गीता का उपदेश दिया जाता है- ‘क्यों व्यर्थ चिंता करते हो। किससे व्यर्थ डरते हो। तुम्हारा क्या था, जो चला गया। तुम क्या लेकर आए थे, जो चोरी हो गया?’ फिर भी आपको यह महान ज्ञान समझ में न आए, तो आपसे पूछा जाता है कि जिस पैसे की चोरी हुई है, वह तुमने कैसे कमाया था? इस देश में किसी आम आदमी के पास एक नंबर में इतना पैसा हो ही कैसे सकता है, जिसे चुराया जा सके!
इन प्रश्नों का पिटारा खुलते ही आपको कहा जाता है कि जो पैसा चोरी हुआ है, उसे ईमानदारी का पैसा सिद्ध करो। इस कार्य को करने में जितने तरीके के काग़ज़ लगते हैं, उन्हें बटोरने में आपको अपने समस्त सत्कर्म और दुष्कर्म याद आ जाते हैं। एक तरह से पुलिसवाले आपको चिंतन करने का अवसर देते हैं कि जिस धन को आप अपना समझकर रपट लिखाने आए थे, वह तो दरअस्ल जी का जंजाल था। जिसके होते हुए आपकी नींद हराम हो गई थी, और जिसके चोरी होने पर थानेवाले आपका चैन छीन ही लेंगे।
यदि आपने ज़िद्द पकड़ ली और उसको ईमानदारी का धन सिद्ध कर ही दिया, और कहीं से एप्रोच लगाकर रपट दर्ज करा ही दी तो इंवेस्टिगेटिंग अफसर आपको पूछताछ के लिए बार-बार थाने बुलाएगा ताकि आपका उस धन से मोहभंग हो जाए। धीरे-धीरे आपके मन में चोर के प्रति सम्मान की भावना पनपने लगेगी कि वह बेचारा तो बिना आपको तंग किये, बिना आपका अपमान किये आपका पैसा ले गया। आपके मन में चोर के प्रति जो कलुष उत्पन्न हुआ था, वह धुल जाएगा और आपका मन पवित्र हो जाएगा।
इस अवस्था को प्राप्त होने के बाद आप अपनी कम्प्लेंट वापस लेने का विचार करेंगे तो थाना आपको एक और ज्ञान प्रदान करेगा कि ‘बिना विचारे जो करे, सो पीछे पछताय!’ अर्थात् रपट वापसी के लिए आपको कठोर तपस्या करनी होगी। चूँकि आपने एक अनावश्यक रपट लिखवाकर रोज़नामचे का काग़ज़ और पुलिसवालों का समय नष्ट किया है, इसलिए इसका आपको हर्जाना भरना होगा। आप यह हर्जाना भरने में आनाकानी करने की सोचोगे तो पुलिसवाले दिव्य शब्दयुग्मों से आपको विभूषित करेंगे, जिनका सामान्य भाषा में तात्पर्य होगा कि हम तेरे बाप के नौकर नहीं हैं, जो जब चाहे रपट लिख लेंगे और जब चाहे उसे रद्द कर देंगे। आखि़र पुलिस को भी आगे जवाब देना होता है।
आप अब तक ‘आगे जवाब देने’ का अर्थ समझ चुके होते हैं। सो, जनता की सेवा में रत पुलिसकर्मियों को आगे जवाब देने में कोई दिक्कत न हो, इसकी व्यवस्था करके ठुमरी स्टाइल में एक भजन गुनगुनाते हुए घर लौट आएंगे कि, थाने मत जइयो…!

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!