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मुक़म्मल क़लाम

सभी ग़मों को ग़ज़ल का मुकाम देता है ख़ुदा सभी को कहाँ ये इनाम देता है वो जिसकी एक-एक साँस जैसे मिसरा हो वही जहाँ को मुक़म्मल क़लाम देता है ✍️ चिराग़...

मैं शायर नहीं होता

मुहब्बत के बिना अहसास से दिल तर नहीं होता अगर अहसास न हो तो सुख़न बेहतर नहीं होता मेरी पहचान है ये शायरी, ये गीत, ये ग़ज़लें किसी से प्यार न करता तो मैं शायर नहीं होता ✍️ चिराग़...

लफ्ज़ों के शोर में

हालात ने जब-जब भी माजरा बढ़ा दिया जीने की हसरतों ने हौसला बढ़ा दिया लफ्ज़ों के शोर में ये समन्दर ख़मोश थे चुप्पी ने शाइरी का दायरा बढ़ा दिया यूँ ख़त्म हो चुका था रात को ही मसअला सुब्ह की सुर्ख़ियों ने मामला बढ़ा दिया कुछ पहले ही लज़ीज़ थीं चूल्हे की रोटियाँ फिर माँ की उंगलियों...

हमारी ज़िंदगानी

अंधेरों की कहानी आफ़ताबों में नही मिलती हक़ीक़त की निशानी चंद ख़्वाबों में नहीं मिलती हमारे दर्द को महसूस करने की ज़रूरत है हमारी ज़िंदगानी इन किताबों में नहीं मिलती ✍️ चिराग़...

जीत की चाहत

चंद सस्ती ख्वाहिशों पर सब लुटाकर मर गईं नेकियाँ ख़ुदगर्ज़ियों के पास आकर मर गईं जिनके दम पर ज़िन्दगी जीते रहे हम उम्र भर अंत में वो ख्वाहिशें भी डबडबाकर मर गईं बदनसीबी, साज़िशें, दुश्वारियाँ, मातो-शिक़स्त जीत की चाहत के आगे कसमसाकर मर गईं मीरो-ग़ालिब रो रहे थे रात उनकी लाश...
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