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कोई गीत नहीं लिखा

तुम रूठी तो मैंने रोकर, कोई गीत नहीं लिखा इस ग़म में दीवाना होकर, कोई गीत नहीं लिखा तुम जब तक थीं साथ तभी तक नज़्में-ग़ज़लें ख़ूब कहीं लेकिन साथ तुम्हारा खोकर कोई गीत नहीं लिखा प्यार भरे लम्हों की इक पल याद नहीं दिल से जाती मन भर-भर आता है फिर भी साँस नहीं रुकने पाती...

तू भी सब-सा निकला

जो जितना भी सच्चा निकला वो उतना ही तनहा निकला सुख के छोटे-से क़तरे में ग़म का पूरा दरिया निकला कुछ के वरक़ ज़रा महंगे थे माल सभी का हल्का निकला मैंने तुझको ख़ुद-सा समझा लेकिन तू भी सब-सा निकला कौन यहाँ कह पाया सब कुछ कम ही निकला जितना निकला ✍️ चिराग़...

नए नग़मे सजा लेना

मैं जहाँ भी रहूँ मुझको ख़ुशी मिल जाएगी बस मेरे गीत गुनगुना के मुस्कुरा देना जब मेरे गीत इस जहान के काबिल न रहें नए नग़मे सजा लेना मुझे भुला देना ✍️ चिराग़...

गीत गढ़ने का हुनर

मसख़रों की मसख़री अपनी जगह शायरों की शायरी अपनी जगह गीत गढ़ने का हुनर कुछ और है मंच की बाज़ीगरी अपनी जगह ✍️ चिराग़...

बावरा कवि

हँसने के लिए कारणों का मोहताज नहीं, आँसुओं का ख़ूब अनुभवी हो गया हूँ मैं सारी दुनिया को आज अपना-सा लगता हूँ, अपनों के लिए अजनबी हो गया हूँ मैं झूठ-अनाचार-बेईमानी की बदलियों में, सच के रवि की कोई छवि हो गया हूँ मैं बावरेपने में घूमता हूँ दुनिया को भूल, तब लगता है एक कवि...
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