+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

भावार्थ

इन दिनों संदर्भ निंदा कर रहे हैं विषय की भावार्थ से- शब्द लट्टू हो गए भाषा पे या फिर व्याकरण पे बोलियों के गेसुओं में फँस गया है मर्म कुछ अलंकारों में सीमित हो गया कवि-कर्म जटिल सा लगने लगा है आजकल सरलार्थ आँख मूंदे, मुस्कुराता मौन है भावार्थ ✍️ चिराग़...

अच्छा लगता है

इतनी सारी व्यस्तताओं के बीच निकाल ही लेता हूँ कुछ लम्हे कविता लिखने के लिए। बहुत सारी अधलिखी कविताओं को छोड़ चुरा ही लाता हूँ कुछ पल तुमसे बतियाने के लिए। अक्सर पूछ बैठता हूँ ख़ुद से क्या मिलता है मुझे कविता लिखने से? क्या हासिल होता है तुमसे बतियाने से? अच्छा लगता है...

लहरें शोर मचाती हैं

गहराई में जाकर बिल्कुल चुप हो जाती हैं और किनारे आकर लहरें शोर मचाती हैं लहरें पल भर में जीवन का सार बताती हैं जिसमें से उठती हैं उस में ही मिल जाती हैं जब उस अनुपम प्रथम मिलन की यादें आती हैं नम होते हैं अधर और पलकें मुस्काती हैं साहिल केवल कचरा ही देता है सागर को...

अनुचर

क़लम भी कुछ कम नहीं है कुदाल से। …शायद कुछ गहरी ही चोट करती हो। और यथार्थ …यथार्थ तो दास मात्र है विचार का। अनुचर है बेचारा हाथ बांधे चलता है विचार के पीछे-पीछे। हिम्मत नहीं कि एक क़दम भी आगे निकल जाए! …अवलम्बन चाहिए ससुरे को विचार का। ✍️ चिराग़...

अनकहा

सदियों से तलाश रहा हूँ एक ऐसा श्रोता जो सुन सके मेरी कविताओं का वह अंश जो मैंने कहा ही नहीं क्योंकि ‘बहुत कुछ’ कह देने की संतुष्टि से कहीं बड़ी है बेचैनी ‘कुछ’ न कह पाने की ✍️ चिराग़...
error: Content is protected !!