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संबंधों की परिभाषा

जग सीमित करना चाहे, सम्बन्धों को परिभाषा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में

क्या बतलाऊँ मीरा संग मुरारी का क्या नाता है
शबरी के आंगन से अवध बिहारी का क्या नाता है
क्यों धरती के तपने पर अम्बर बादल बन झरता है
क्यों दीपक का तेल स्वयं बाती केे बदले जरता है
क्यों प्यासा रहता चातक पावस-जल की अभिलाषा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में

क्या ये थोथे शब्द सुमन की गन्ध बयाँ कर सकते हैं
क्या वीणा से सरगम का अनुबन्ध बयाँ कर सकते हैं
क्यों बौछारों से पहले मौसम पर धुरवा छाती है
क्यों कोयल का स्वर सुन आमों में मिसरी घुल जाती है
कल-कल-कल-कल बहती सरिता किस पावन जिज्ञासा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में

✍️ चिराग़ जैन

निस्पृह प्रेम

चाहता हूँ उन्हें ये अलग बात है
वो मिलें ना मिलें ये अलग बात है
एक अहसास से दिल महकने लगा
गुल खिलें ना खिलें ये अलग बात है

हम मिलें और मिलते रहें हर जनम
ज़िन्दगी भर का नाता बने ना बने
मन समर्पण के सद्भाव से पूर्ण हों
तन भले ही प्रदाता बने ना बने
बात दिल की दिलों तक पहुँचती रहें
लब हिलें ना हिलें ये अलग बात है

शब्द पावन हवन की महक से भरे
मुस्कुराहट में है यक्ष का अवतरण
आँख में झिलमिलाती चमक दीप की
अश्रु हैं दिव्य पंचामृती आचमन
नित्य श्रद्धा निवेदित करूँ मैं उन्हें
वर मिलें ना मिलें ये अलग बात है

✍️ चिराग़ जैन

चांद का किरदार

एक पल सूरज छिपा और फिर उजाला हो गया
लेकिन इसमें चांद का किरदार काला हो गया
साज़िशें सूरज निगलने की रची थीं चांद ने
पर वो अपनी साज़िशों का ख़ुद निवाला हो गया

✍️ चिराग़ जैन

वो शालीन पल

हाँ, गुज़ारे थे कभी दो-तीन पल
कुछ हसीं, कुछ शोख़, कुछ रंगीन पल

हर तरह की वासना से हीन पल
अब कहाँ मिलते हैं वो शालीन पल

भोग, लिप्सा, मोह के संगीन पल
कब किसे दे पाए हैं तस्कीन पल

आपका आना, ठहरना, लौटना
इक मुक़म्मल हादसा थे तीन पल

साथ हो तुम तो मुझे लगता है ज्यों
हो गए हैं सब मिरे आधीन पल

कँपकँपाते होंठ, ऑंखों में हया
किस तरह भूलेंगे ये रंगीन पल

दिल में रोशन रख उमीदों के ‘चिराग़’
छू न पाएंगे तुझे ग़मगीन पल

✍️ चिराग़ जैन

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