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भूख

सिर
बर्दाश्त कर रहा है
अपनी क्षमता से अधिक भार।
हथेलियाँ कर चुकी हैं
अपनी खुरदरी छुअन को स्वीकार।
पैर सीख गए हैं
बोझा लेकर चलने की कला।
पीठ जान चुकी है
कि देह पर बोझ बन जाने से
बोझा ढोना भला।

कानों को
सुनाई नहीं देता उपहास
नाक को
गंदगी से नहीं आती है बास

अपनी काया को देखकर
आँख भी
बिल्कुल नहीं रोती है
क्योंकि पेट को
भूख
बर्दाश्त नहीं होती है।

✍️ चिराग़ जैन

पुराण साक्षी है

लंका, इसलिए नष्ट हुई क्योंकि वहाँ लंकेश की आलोचना को अपराध माना गया और रामराज्य इसलिए ख्यात हुआ क्योंकि वहाँ आम धोबी को भी राजा के आचरण पर प्रश्न पूछने का अभय था।
पुराण साक्षी है, कि जब भी कोई विभीषण शत्रु का सहयोगी बना है तो इसके मूल में किसी रावण द्वारा किया गया तिरस्कार ही उत्तरदायी रहा है। पुराण साक्षी है, कि जब भी किसी बाली ने सुग्रीव को ऋष्यमूक पर्वत पर छिपने के लिए विवश किया है, तब बाली के भय से थरथराने वाला सुग्रीव ही बाली के विनाश का कारण बना है।
राजनीति को द्रोह और आलोचना के मध्य अंतर करने का विवेक होना चाहिए। आलोचना को सुनना और द्रोह को युक्तिपूर्वक अशक्त कर देना राजा का कर्तव्य है। साकेत में भी मंथरा थी, जिसका द्रोह सिद्ध भी था, तथापि रघुकुलवंशियों ने अपनी मर्यादा में रहते हुए उसको कथा से लुप्त कर दिया।
जब आपका आचरण मर्यादित होता है तो शत्रु का आत्मबल ध्वस्त हो जाता है। नैतिक बल से बड़ा कोई अस्त्र नहीं होता। पाण्डव युद्ध जीतकर भी श्रद्धेय न हो पाए, किन्तु राम को, उनके आचरण ने पूज्य बना दिया।
राम और रावण में मूल अंतर यही था कि रावण के शिविर में चाटुकारिता को साधुवाद मिलता था जबकि राम के शिविर में मन्त्रणा को सम्मान मिलता था। राम ने शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए शत्रु जैसा आचरण करना स्वीकार नहीं किया।
महाभारत में भी राजनीति की पाठशाला के ऐसे ही सहज अध्याय पढ़ने को मिलते हैं। पाण्डवों के दल में सबसे कटुवक्ता श्रीकृष्ण थे। वे पाण्डवों की नीतियों और योजनाओं की उन्मुक्त आलोचना करते थे, तथापि पाण्डवों के लिए वे सर्वदा स्तुत्य रहे। उधर कुरुसभा में कटुभाषण करनेवाले महात्मा विदुर सदैव हेय दृष्टि से देखे गए।
पुराण साक्षी है, जिस सभा में भीष्म और द्रोण, विदुर का हश्र देखकर मौन रह गए उस सभा का कोई महारथी जीता न रहा, जिस सभा में माल्यवान रावण के स्वर से ऊँची आवाज़ उठाने में चूक गए, उस सभा का कुलनाश हुआ है।
विभीषण के लिए यह कदापि शोभनीय नहीं है कि वह अपने राजा और कुनबे को विपत्ति में छोड़कर शत्रु से जा मिले, किन्तु रावण को भी यह समझना होगा कि विपत्ति के समय विभीषण सरीखे सत्यवक्ताओं के कटुभाषण की सर्वाधिक आवश्यता होती है।
सबसे सफल राजा वही है, जो राज्य को किसी और कि धरोहर मानकर राजकाज करे। यदि धृतराष्ट्र और पाण्डु दोनों ही राम और भरत से प्रेरणा लेकर हस्तिनापुर को किसी की धरोहर मान लेते तो कुरुवंश का नाश न हुआ होता।
पुराण साक्षी है कि जब धृतराष्ट्र नेत्रहीन हो तो उसे विदुर से विमुख नहीं होना चाहिए क्योंकि राजसभा में अपमानित होने की क़ीमत पर भी सत्य बोलनेवाले हितैषी बहुत भाग्य से मिलते हैं। यदि सत्य की परतें खोलकर प्रत्यक्ष की वास्तविकता दिखानेवाले विदुर का सम्मान करने से चूक जाएँ तो भी घटनाओं का यथावत वर्णन करनेवाले संजय का सम्मान करना तो सीख ही लें क्योंकि यदि संजय ने धृतराष्ट्र के मन-मुताबिक़ घटनाओं का वर्णन किया, तो हस्तिनापुर कभी न जान पाएगा कि कब उसकी महारानी नपूती हो गई है, और कैसे उसकी मेधा उसकी राजहठ के कारण शरशैया पर जा लेटी है।
✍️ चिराग़ जैन

किस्सों को खूंटी पर टाँको

दूर खड़े रहकर मत आँको
झाँक सको तो मन में झाँको
घटनाओं की परतें खोलो
किस्सों को खूंटी पर टाँको
आँखें क्यों छोटी कर दी हैं, होठों के उल्लास ने
आँसू की नदियाँ ढक ली हैं मुस्कानों के व्यास ने

कैकई मैया का राजा के महलों बीच ठिकाना था
नौकर, चाकर, दास, दासियाँ सबका आना-जाना था
होने को तो उसके आगे सुविधाओं का मेला था
लेकिन मन के भीतर केवल मरघट का वीराना था
पानी तक पहुँची तो बदला रंग पुरानी प्यास ने
आँसू की नदिया ढक ली है मुस्कानों के व्यास ने

अपमानित शकुनी इक ज़िद पर पूरा जीवन वार गया
अपमानित चाणक्य उसी ज़िद पर हर बाज़ी मार गया
विष्णुगुप्त नायक है युग का और शकुनी खलनायक है
इसका मोहरा जीत गया है, उसका मोहरा हार गया
जो भी जीता उसे सिकंदर मान लिया इतिहास ने
आँसू की नदिया ढक ली है मुस्कानों के व्यास ने

क़िस्सा क्या है, आधे सच को ढकता एक झरोखा है
कथा, विजेता की सहमति से होने वाला धोखा है
आँखों देखी को भी बाँचो, किसकी आँखों से देखी
सच जो पर्दे के पीछे है, उसका रूप अनोखा है
वैभव की झोली खाली है, सुख पाया संन्यास ने
आँसू की नदिया ढक ली है मुस्कानों के व्यास ने

✍️ चिराग़ जैन

दान का उपदेश

हम अजीब किस्म के नकारात्मक लोग हैं। हमें दूसरों पर उंगली उठाने की लत पड़ी हुई है। इस भयावह संकट के समय में भी आज सुबह से लोग अलग-अलग सेलिब्रिटीज़, अलग-अलग उद्योगपतियों और अलग-अलग राजनेताओं के नाम लिखकर लानत भेज रहे हैं कि संकट के समय वे अपनी पूंजी में से दान करके समाजसेवा क्यों नहीं करते?
हद्द है यार! ऐसी पोस्ट करनेवाले लोग एक ऐसी मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं, जिसमें ख़ुद के शरीर का कोढ़ इग्नोर करके दूसरे पर कीचड़ उछालने में मज़ा आने लगता है। हमने सुना है कि तवायफ़ भी किसी मौके पे घुंघरू तोड़ देती है, लेकिन ये इतने घृणित और नकारात्मक लोग हैं, जो अरथी उठाते हुए भी सबसे अलग स्टाइल में ‘राम नाम सत्य है’ का घोष करते हैं ताकि इनकी ओर ध्यान आकृष्ट हो सके।
किसी को दान करना होगा तो वह ढिंढोरा पीटेगा क्या? क्या इन फेसबुकियों के प्रमाण पत्र से ही किसी की मानवता सिद्ध हो सकती है। किसी भी सफल आदमी को गाली देने में इनको मज़ा केवल इसलिए आता है कि ऐसी हरक़त से इन्हें अपने जैसे विफल और घटिया लोगों के लाइक्स मिल जाते हैं।
मुझे बहुत खेद है कि आज पहली बार मैं इस प्रकार की भाषा प्रयोग कर रहा हूँ, लेकिन इस संवेदनशील समय में भी चरित्र हत्या और निजी प्रहार करके हीरो बनने की मानसिकता वाले लोग यदि कुछ अच्छा न भी बोल सकते थे, तो कम से कम मौन ही रह लेते।
इन बकवादियों से मेरा सीधा प्रश्न है कि आपने इस संकट की घड़ी में कौन-सी समाजसेवा की है? यदि आप देश की इस विकट पीड़ा से दुःखी हैं तो आपको अन्य लोगों के दान का हिसाब रखने की फुरसत कैसे मिल गई? और अगर आप स्वयं इस पीड़ा से विगलित नहीं हैं तो आपको अन्य लोगों पर उंगली उठाने का अधिकार कहाँ से मिल गया?
शर्म आनी चाहिए। देश का एक-एक नागरिक घुटन और त्रास में जी रहा है। सामान्य बुजुर्ग अपने नियमित उपचार के लिए अस्पताल नहीं जा पा रहे। एक-एक दाने को तरसते दिहाड़ी मजदूर एक अंतहीन यात्रा पर चले जाने को विवश हैं।
महंगे स्टूडियो में बेस्ट क्वालिटी के वीडियो बनानेवाले कलाकार अपने घर पर रॉ वीडियो बनाकर जनता का मनोरंजन करके उनका टाइम पास करने का प्रयास कर रहे हैं। चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए राजनेता रात-दिन जागकर स्थितियों को नियंत्रित कर रहे हैं। आम आदमी बिना कोई शोर मचाए प्रधानमंत्री राहत कोष और अन्य सामाजिक संगठनों को अर्थ दान कर रहा है। डॉक्टर और नर्स अपनी फीस का लालच छोड़कर, दिन-रात फोन पर लोगों की समस्याओं का निदान बता रहे हैं। पत्रकार स्काइप और अन्य तकनीकों के माध्यम से पत्रकारिता करके जनता तक सूचनाएँ पहुँचा रहे हैं। पुलिसवाले लोगों को सख्ती से घर रहने के लिए भी कह रहे हैं और नम आँखों से भूखे-बेघरों को खाना भी बाँट रहे हैं। सरकारी कर्मचारियों ने अपनी एक-एक दिन की तन्ख्वाह दान कर दी है। गुरुद्वारे के कारसेवक पीठ पर टंकी बांधकर सड़कों को सेनिटाइज़ कर रहे हैं। साधु-संत टेलिविज़न के माध्यम से अपने अनुयायियों से संयत रहने की अपील कर रहे हैं। यहाँ तक कि जेल में बंद कैदी भी दिन-रात एक करके मास्क बना रहे हैं ताकि देश में मास्क की कमी न होने पाए।
लेकिन इन नकारात्मक मस्तिष्कों के मोबाइल में ऐसी एक भी पोस्ट नहीं आएगी, जिससे इन्हें लगे कि इस देश की जनता इस दुःख की घड़ी में बिना किसी निजी स्वार्थ के परस्पर सहयोग की भावना से पगी हुई है। इन्हें केवल दूसरों के चरित्र पर उंगली उठाकर लाइक और कमेंट बटोरने से मतलब है।
सही कहा था बाबा तुलसी ने- ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी!’

✍️ चिराग़ जैन

‘वर्चस्व’ के लिए ‘अस्तित्व’ से खिलवाड़

विपत्ति मनुष्य को उसकी लापरवाही पर ध्यान देने का अवसर देती है। संभवतः किसी भी समय में किसी भी पीढ़ी के पास यह अवसर नहीं रहा होगा कि कई-कई सप्ताह तक बिना कुछ काम किये रहा जाए और उससे कोई प्रत्यक्ष हानि न हो। हमेशा समय की कमी का रोना रोनेवाला मानव आज पूरी तरह फ़ुरसत में है। उसकी दुकान बंद है, लेकिन उसे कोई बेचैनी इसलिए नहीं है कि उसके ग्राहक का कहीं और जाने का भय नहीं है। उसकी फैक्ट्री बंद है, लेकिन वह इस बात से संतुष्ट है कि उसके प्रतिद्वंद्वी की भी फैक्ट्री बंद है। फैक्ट्री ही क्या पूरा बाज़ार बंद है। बाज़ार ही क्या पूरा शहर बन्द है। शहर ही क्या पूरा देश बंद है। देश ही क्या पूरी दुनिया बन्द है। इतनी फ़ुरसत कभी किसी पीढ़ी के मनुष्य को उपलब्ध नहीं हुई है।
जब इस फ़ुरसत में बोरियत से बचने के समस्त उपायों से बोर हो जाएंगे तब दुनिया पलटकर देखेगी कि जिन कार्यों में हम अब तक इतने व्यस्त थे, वे सब तो हमारे इस संकट में हमारी सहायता कर ही नहीं पा रहे हैं। हम युद्ध की तैयारियों के लिए भयावह अस्त्र-शस्त्र बना रहे थे, लेकिन फिलहाल उनकी कोई सुधि ही नहीं ले रहा है। हम अपने थोथे अहंकार की पुष्टि के लिए समाज को ऊँची-नीची जातियों की अनुसूची में बाँट रहे थे, लेकिन महामारी का यह रक्तबीज न तो अनुसूचित जातियों को बख़्श रहा है न ही अनुसूचित जनजातियों को। हम उनके धर्मस्थल से ज़्यादा भव्य अपना धर्मस्थल बना रहे थे लेकिन यह महामारी मंदिर के फ़र्श से लेकर, मस्जिद की हौज तक हर जगह मौजूद है। हम घोटाले और घपले कर-कर के पूंजी बना रहे थे लेकिन आज हमारे पास उस पूंजी को ख़र्च करने का उपाय नहीं है। जो एक बड़ा भूखंड विजय कर चक्रवर्ती बने फिरते थे, वे आज दो कमरों के फ्लैट में बंद हैं। जिनके पास हर काम के लिए नौकर-चाकर थे, वे आज अपने घर में ख़ुद झाड़ू-पोंछा कर रहे हैं। कितना आश्चर्य है कि सुख के समय में हम अमीर, ग़रीब, हिन्दू, मुस्लिम, सवर्ण, अछूत, शहरी, ग्रामीण, गोरे, काले, साक्षर, निरक्षर, स्त्री, पुरुष और न जाने क्या-क्या संज्ञाएँ तथा विशेषण ओढ़े फिरते हैं; लेकिन दुःख आते ही हम सब ख़ालिस मनुष्य हो जाते हैं।
दो-दो महायुद्ध झेलने के बाद यूरोप ने यह सबक लिया कि जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति किसी भी सरकार का प्रथम उद्देश्य होना चाहिए। सत्ता और वर्चस्व की होड़ में विनाश के भयावह दृश्य देख लेने के बाद यूरोप के देशों ने अपनी सीमाओं पर ख़र्च होनेवाले धन का अधिकतम अंश अपने नागरिकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने पर लगाना शुरू किया।
कोरोना के विरुद्ध जारी इस महायुद्ध के समय में हम यह संकल्प तो ले ही सकते हैं कि हमारे देश के प्रत्येक नागरिक के पास जीवन जीने के न्यूनतम संसाधन तो अवश्य ही हों। राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए सभी दल जब ‘वर्चस्व’ की लड़ाई लड़ें तो उसका बोझ उस बजट पर न पड़े जो जनता के ‘अस्तित्व’ की रक्षा के लिए निर्धारित हो। युद्ध के लिए अस्त्र ख़रीदे भी जाएँ और बनाए भी जाएँ, लेकिन उन हथियारों को ख़रीदने के लिए किसी अस्पताल या किसी स्कूल का बजट एडजस्ट न किया जाए। हमारा राष्ट्रीय ध्वज मंगल पर भी फहराए और चांद पर भी फहराए; लेकिन पहले यह सुनिश्चित किया जाए कि हमारे राष्ट्रीय ध्वज के नीचे सोनेवाला कोई परिवार फाके तो नहीं कर रहा।
इन स्थितियों के लिए न तो मैं किसी सरकार पर दोषारोपण करना चाहता हूँ, न ही जनता पर। हमारी प्राथमिकताएँ क्या हों, यह हमें कोविडकाल चीख़-चीख़कर बता रहा है। पीछे पलटकर किसी से शिकायत करने जाने की संभावना शेष नहीं है। अशोक जब कलिंग के बाद संन्यास के पथ पर चले होंगे तब उन्होंने अपने वर्तमान को देखकर ही निर्णय लिया होगा; यदि वे अतीत से उलझते तो अतीत उन्हें कभी भविष्य सुधारने की मोहलत नहीं देता।
मैं वर्तमान को परिवर्तन का कलिंग युद्ध मानकर एक शांत और सुखद भविष्य की ओर क़दम बढ़ाने की संस्तुति करता हूँ। वर्तमान हमें बता रहा है कि लॉकडाउन की इस परिस्थिति में हमारे पास एक ऐसा पुख्ता तंत्र होना चाहिए था कि सरकार कम्प्यूटर पर सबकी यूनीक आईडी के माध्यम से चिन्हित कर पाती कि एक सौ पैंतीस करोड़ लोगों में से कितने ऐसे हैं जिनके व्यवसाय के कॉलम में ‘दिहाड़ी मजदूर’ लिखा है। यूनिक आईडी के माध्यम से सरकार उन सबके परिवारों की पहचान आसानी से कर लेती और उनके खाते में आवश्यक राशि पहुँचाकर उन्हें मरने से बचा लेती।
वर्तमान चीख़-चीख़कर कह रहा है कि हमारे पास न्यूनतम शिक्षा के साथ-साथ सिविक सेंस विकसित करने की भी शिक्षा प्रणाली होनी चाहिए ताकि सरकार को जनता की भलाई के लिए उस पर लाठियाँ न भाँजनी पड़ें।
वर्तमान चीख़-चीख़कर कह रहा है कि हमारी स्वास्थ्य सेवाओं के पास इतनी व्यवस्था अवश्य हो कि यदि किसी संकट की घड़ी में पाँच प्रतिशत जनसंख्या किसी महामारी, प्रदूषण, रोग, युद्ध आदि से प्रभावित हो जाए तो उनके उपचार में बाधा न आए।
वर्तमान चीख़-चीख़कर कह रहा है कि सरकार के पास ऐसे अधिकार हों कि ऐसी आपदा के समय निजी विमानन कम्पनियों, निजी अस्पतालों, निजी फार्मा कंपनियों, निजी टेलीकॉम कंपनियों, निजी मीडिया चैनल्स, निजी रिटेल स्टोर्स आदि को सरकारी नियंत्रण में लेकर जनहित में प्रयोग किया जा सके।
जो लोग निजीकरण की वक़ालत करते फिरते हैं, उनसे वर्तमान स्पष्ट शब्दों में कह रहा है कि जब बस्ती में आग लगती है तब व्यापारी केवल अपनी दुकान बचाता है और जैसे ही उसकी दुकान सुरक्षित होती है तो वह पानी की बाल्टियाँ बेचकर बस्ती में धंधा करने लगता है। राजनैतिक दल उस समय आग बुझाने का दिखावा करते हैं ताकि चुनाव के समय बस्ती में वोट मांगने का अधिकार मिल सके। केवल सरकार ही है जो पूरी बस्ती की आग बुझाने के लिए प्रयास करती है।
यह भीषण समय बीतने के बाद यदि हम अपनी मानवता को बलिष्ठ करके घरों से बाहर निकले तो ‘दुनियाबन्दी’ की दुर्घटना मनुष्यता के एक नए युग का सूत्रपात करेगी; लेकिन इसके बीतते ही यदि हम फिर से ‘मनुष्य’ की बजाय कोई भी अन्य संज्ञा लपेट बैठे तो कोरोना के विरुद्ध इस लड़ाई में शहीद हुए लोगों के बलिदान और हफ़्तों तक घरों में बंद रहकर अवसाद झेल रहे देश की तपस्या व्यर्थ हो जाएगी।

✍️ चिराग़ जैन

Published in Dainik Jagaran of 31 March 2020

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