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गौरक्षा की दुहाई

विषय लज्जा से कहीं आगे निकल चला है। एक शब्द पकड़ कर उसका कैसा-कैसा प्रयोग किया जा सकता है ये सच पिछले दो दिन में बेहद घृणास्पद चेहरे के साथ बार-बार सामने से गुज़रा है। अफ़वाह तंत्र कितना शक्तिशाली और भयावह है, इस बात के प्रमाण पिछ्ले 48 घंटों से अनवरत मिलते जा रहे हैं।...

जोकर का तमाशा

लड़ाई क़ायम रहनी चाहिये। जंग चलती रहनी चाहिये। जोकर का तमाशा कभी नहीं रुकता। हिन्दू-मुस्लिम के खेल से ऊब जाओ तो विचारधाराओं का खेल खेलो। उनसे मन भर जाए तो जातियों का पंगा डाल दो। जाति हटे तो भाषा, भाषा हटे तो उत्तर-दक्षिण, ये नहीं तो कुछ और, कुछ और नहीं तो कुछ भी और।...

दंगे

बाज़ी बिछी हुई है और दांव हैं दंगे होते हों, आदमी पे अगर घाव हैं दंगे कुछ लोग हैं बेचैन सियासत की भूख से जिस पर सिकेगी रोटी वो अलाव हैं दंगे ✍️ चिराग़...

अनदेखी

कैसा था वो अनुभव तुमने सबसे पहले जब मेरे संदेशों की अनदेखी की थी जब सम्बन्ध प्रगाढ़ रहा था सहज मिला करते थे हम-तुम पहरों जाने कितनी बातें रोज़ किया करते थे हम-तुम तब भी मुझको डर लगता था तब भी मैं सोचा करता था आपस में दूरी आई तो तुम उत्तर ना दे पाई तो तब कैसे रातें...

व्यक्तित्व

एक अज्ञात कलाकार ने हवा में कुछ लकीरें बनायीं कुछ खड़ी रेखाएँ जैसे भृकुटि के मध्य त्यौरियाँ पड़ती हैं कुछ आड़ी रेखाएँ जैसे ललाट पर बौद्धिकता उभरती है। कुछ अर्द्धवृत्ताकार जैसे नयनों के नीचे की चिन्ताएँ कुछ हल्की पनियाई जैसे आँखों की कोरों पर तैरती इच्छाएँ कुछ होंठों पर...
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