Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
उनकी अदालतें आपकी ज़िन्दगी घिस देंगी
फिर भी वे सामाजिक न्याय पर इतराएँगे
उनके थाने आपको नोच डालेंगे
फिर भी वे आंतरिक सुरक्षा पर फ़ख़्र करेंगे
देश के कुछ हिस्सों में संविधान लागू नहीं होगा
फिर भी वे प्रभुसत्ता सम्पन्न होने का दम्भ भरेंगे
वे अतिक्रमण करने वालों के हाथ जोड़ेंगे
वे समय पर टैक्स देने वालों की कमर तोड़ेंगे
पर हम यह सब चुपचाप देखते रहेंगे
क्योंकि हमें दिन-रात पिस-पिसकर
वो टैक्स का पैसा जुटाना है
जिसका हिसाब मांगने का अधिकार
हमें नहीं दिया जाएगा
लोकतंत्रात्मक गणराज्य के
इस फूहड़ नाटक से
पर्दा या प्रश्न उठाने वाले को
राष्ट्रद्रोह, न्यायालय की अवमानना और
संसद के विशेषाधिकार उल्लंघन का
दोषी मान लिया जाएगा।
राष्ट्रवादियों की सरकार हो
और मैंने आवाज़ उठाई
तो मुझे वामपंथी कहकर
नकार दिया जाएगा।
सेक्युलरों की सरकार हो
और मैंने बोलना चाहा
तो मुझे साम्प्रदायिक कहकर
मेरा तिरस्कार किया जाएगा!
वामपंथी सरकार हो और मैं बोला
तो मुझे पूंजीपति मान लिया जाएगा।
हर दल ने
अपने ऊपर उठने वाले प्रश्नों से
बचने के लिए
कोई न कोई शब्द गढ़ रखा है
ताकि जनता के सवालों से
उलझे बिना
आगे बढ़ा जा सके
ताकि जब कोई ‘नागरिक’
सवाल पूछे ‘अपनी सरकार से’
तो उसकी ज़ुबान पर
उस एक शब्द का ताला जड़ा जा सके।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
कोरोना की वर्तमान स्थिति भयावह है। जनता को चाहिए कि अपनी सुरक्षा के लिए सरकारी नियमों का पालन करे। बाज़ारों में भीड़ देखकर सरकार को घबराहट होती है। जनता होली जैसे अनावश्यक त्योहारों की आड़ लेकर समारोह करने की सोच रही है। लोग, होली मंगल मिलन जैसे बेहूदे कामों के लिये इकट्ठा हो रहे हैं। शर्म आनी चाहिए इस देश की जनता को। घर पर नहीं रह सकते?
सरकार को मजबूर होकर जनहित में सख्ती करनी पड़ती है। विवश होकर पुलिसवालों को कहना पड़ता है कि जो भी बिना मास्क दिखे उसको धर लो। और भी कुछ नहीं तो रिश्तेदारों के साथ ही होली खेलने चल दोगे! लज्जा नहीं आती? कोरोना से डर नहीं लगता? अरे मूर्खाे, अपनी नहीं तो औरों की जान की ही परवाह कर लो!
इस देश के महान राजनेता अपनी जान पर खेलकर लाखों लोगों की रैलियाँ कर रहे हैं ताकि लोकतंत्र बचा रह सके। कभी सोचा है कि कैसा लगता होगा जब दिल्ली में सोशल डिस्टेंस की सख्त नियमावली लागू करके बंगाल में लाखों लोगों की भीड़ के सामने मास्क हटाकर भाषण झाड़ना पड़ता है। कभी कल्पना की है कि अपनी आत्मा को क्या मुँह दिखाते होंगे बेचारे राजनेता!
महाराष्ट्र में लाखों केस आ गये, लेकिन हमारे राजनेता प्रदेश में गहराए राजनैतिक संकट से जूझने के लिए मंत्रालय, राजभवन, दिल्ली और प्रेस वार्ताओं में भागे फिर रहे हैं। कोरोना की जानलेवा दहशत को ताक पर रखकर, सरकारी गाइडलाइंस को धता बताकर भी कुर्सी की क़वायद में लगे हुए हैं। और तुम बस दो वक़्त की रोटी के लालच में धंधे-पानी पर निकल रहे हो। चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए ऐसी नाकारा जनता को।
क्या हो जाएगा अगर स्कूल नहीं खुलेंगे? क्या हो जाएगा अगर दफ़्तरों में काम नहीं होगा? क्या आफ़त आ जाएगी अगर लोग त्योहारों पर एक-दूसरे से नहीं मिलेंगे? कौन-सा पहाड़ टूट पड़ेगा अगर होली पर बिटिया के घर गुंजिया लेकर नहीं जा सकोगे? …इन सब टुच्ची बातों की तुलना चुनाव की महत्ता से करते हो?
उधर किसान आफ़त मचाए हुए हैं। इतने साल से अपने खेतों से कमा रहे थे ना! तब कौन से ताजमहल बना लिए तुमने। तब भी तुम फाँसी लगा-लगाकर मर रहे थे। अब सरकार जो कर रही है, उसे करने दो। इतनी हाय-तौबा क्यों? आकर बैठ गए हो दिल्ली बॉर्डर पर। …पड़े रहो। सरकार के पास क्या यही काम है कि तुम्हारा रोना सुनती रहे।
कभी बैठे हो सरकार में? कभी जाना है राजनीति किस चिड़िया का नाम है। सरकार के पास इन सब फालतू बातों के लिए वक़्त नहीं है, उसे चुनाव लड़ना है। चुनाव कोई हँसी-मज़ाक़ नहीं है। यह लोकतंत्र की आत्मा है। अब लोक के रोने-पीटने में लोकतंत्र को तो नहीं इग्नोर कर सकते ना! इसलिए ख़बरदार, अगर होली-वोली जैसे फालतू बहाने लेकर घर से बाहर क़दम निकाला तो!
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
न्यूज़ बुलेटिन देखो तो दिमाग़ भन्ना जाता है। एक ख़बर बताती है कि कोरोना के डर के चलते मध्यप्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र में सरकारी नियमों में सख्ती। कोरोना के डर के कारण पंजाब सरकार ने बच्चों की परीक्षाएँ रद्द की। महाराष्ट्र के कुछ शहरों में नाइट कर्फ्यू। दिल्ली में 200 लोगों से ज़्यादा की सभा की मनाही। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री ने कुम्भ पर लगाए प्रतिबंध हटाने को बताया जोखि़म भरा काम।
हम इन ख़बरों से डरने लगते हैं। जनहित के प्रति सरकार की गम्भीरता देखकर मन सरकार के प्रति श्रद्धा से भर जाता है। तभी ख़बर आती है कि खड़गपुर में केन्द्रीय गृहमंत्री की रैली में उमड़ी भारी भीड़। यह ख़बर देखते ही हमारी श्रद्धा की गति की दुर्गति हो जाती है। फिर एंकर बताती है कि ममता बनर्जी ने रैली में किया शक्ति प्रदर्शन। …हमारी श्रद्धा मुँह बाये हमारा थोबड़ा देखने लगती है। फिर पता चलता है कि तमिलनाडु, असम, पुदुच्चेरी, पश्चिम बंगाल और केरल में जमकर चुनावी रैलियाँ हो रही हैं, जहाँ ज़्यादा से ज़्यादा भीड़ दिखाना राजनेताओं की सफलता का मापदण्ड है। इसलिए सरकारों ने कोरोना को समझा दिया है कि तुम्हें कब किस रूट पर रहना है।
सरकार जानती है कि इस देश की जनता अनुशासित नहीं है। इसलिए सरकार ने जनता को अनुशासन में रखने के लिए कड़े कानून बनाए हैं। जैसे फ्लाइट में जाओ, तो एयरपोर्ट पर एक सीट छोड़कर बैठो लेकिन जहाज में एक-दूसरे से चिपककर बैठ सकते हो। क्योंकि सरकार ने कोरोना को समझा दिया है कि फ्लाइट में चिपकने पर मत फैलना।
ऐसे ही फ्लाइट में मास्क लगाकर बैठना ज़रूरी है क्योंकि एक-दूसरे की साँस से संक्रमण फैल सकता है। लेकिन जब एयर होस्टेस खाना बाँटती है, तब सभी यात्री अपना मास्क हटाकर एक-दूसरे से सटे हुए वातानुकूलित कम्पाउंड में बेझिझक खा सकते हैं, क्योंकि उतनी देर के लिए सरकार कोरोना का स्विच ऑफ कर देती है।
कोविड प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात करने के लिए शीर्ष नेता वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करके जनता को यह बताएंगे कि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कितना जरूरी है। लेकिन बंगाल में वही शीर्ष नेता उन्हीं मुख्यमंत्री के साथ हाथ से हाथ मिलाकर जनता को बताते हैं कि यहाँ कोरोना का स्विच ऑफ है।
स्टेडियम में लाखों लोग बिना मास्क के उछल-उछलकर मैच देखते हैं तो कोरोना नहीं फैलता, क्योंकि वहाँ सरकार ने कोरोना का स्विच ऑफ कर दिया है। लेकिन बिटिया की विदाई के समय यदि बारातियों की संख्या अधिक हुई तो कोरोना फैलने का डर रहता है, इसलिए सरकार वहाँ पुलिस भेज देती है। पुलिसवाला ऑफिशियली या अन-ऑफिशियली कुछ चार्ज लेता है और कोरोना का स्विच ऑफ करके चला जाता है।
अंतिम संस्कार में बीस से ज़्यादा लोग न हों क्योंकि वहाँ स्विच ऑफ नहीं किया गया है। यह स्विच ऑफ करवाने का उपाय सरकार जानती है, इसीलिए जिस प्रदेश में जिस सरकार को जो करना हो, वह कर लेती है। उसके पास कोरोना का स्विच है। लेकिन जनता को छूट दे दी गयी तो बेचारा कोरोना कहाँ जाएगा? और कोरोना चला गया तो न्यूज़ चैनल्स को बाक़ी ख़बरें दिखानी पड़ेंगी। और हमारे लोककल्याणकारी गणराज्य की सरकारें यह कतई बर्दाश्त नहीं करेंगी कि न्यूज़ चैनल्स ख़बरों में पेट्रोल डालने का काम करें।
न्यूज़ एंकर बताती है कि बाज़ारों में लोग लापरवाही कर रहे हैं इसलिए सरकार को सख्त होना पड़ रहा है। और अगली ही ख़बर में किसी राजनेता का रोड शो या रैली दिखाई जाती है, जहाँ न कोई मास्क है, न कोई सेनेटाइजर, न कोई सोशल डिस्टेंसिंग… लेकिन यहाँ तो स्विच ऑफ है।
मध्यप्रदेश में उपचुनाव थे, तब वहाँ स्विच ऑफ था लेकिन अब वहाँ धारा 144 लागू है। पंजाब में हाल ही में चुनाव हुए और चुनाव ख़़त्म होते ही कोरोना का स्विच ऑन हो गया। गुजरात में हाल ही में चुनाव हुए और अब वहाँ कोरोना है। बंगाल में अभी चुनाव हो रहे हैं इसलिए कोरोना की हिम्मत नहीं है कि वहाँ एंट्री कर ले।
सरकार ने कोविड को अच्छे से समझा दिया है कि पश्चिम बंगाल में इन दिनों चुनाव का माहौल है। देश के महत्वपूर्ण जननायकों को जनता से संवाद करके वोट मांगने हैं। यह लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है। लेकिन बच्चों की परीक्षा को टाल सकते हैं क्योंकि शिक्षा चुनाव से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है। बाज़ारों में धारा 144 लागू है क्योंकि जीना चुनाव से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है। कुम्भ और उर्स जैसे धार्मिक कार्यक्रमों में सावधानी बरतनी ज़रूरी है, क्योंकि धर्म भी चुनाव से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है। अंतिम संस्कार में सावधानी बरतनी होगी, क्योंकि मरना भी चुनाव से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
वो दौर गये जब लोग वसीयतों में ज़मीन-जायदाद छोड़कर जाते थे, आजकल तो चार सोशल मीडिया अकाउंट्स, कुछ हज़ार फॉलोवर्स और दस-पाँच ब्लॉक्ड प्रोफाइल्स से ज़्यादा किसी के पास कुछ नहीं है छोड़ने को…
सफेद बाल और अरथी देखकर वैराग्य घटित होनेवाली कहानियां सुनकर बड़े हुए थे, पर अब पता चला कि व्हाट्सएप-इंस्टाग्राम थोड़ी देर को बन्द हो जाए तो जीवन निरर्थक लगने लगता है।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हमारे यहाँ एक नया चलन चल पड़ा है कि जैसे ही आप कोई पर्व मनाने लगो तो कुछ लोग उसके लिए तर्कहीन प्रश्न उठाते हैं और दूध में खटाई डालकर स्वयं को लीक से हटकर चलता दिखाने की कोशिश में लग जाते हैं।
कल यही अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के साथ भी हुआ। जब सब लोग महिलाओं की उपलब्धि, महत्व, क्षमता और प्रतिभा की चर्चा कर रहे थे तब सोशल मीडिया पर लीक से हटकर चलने की होड़ में कुछ लोग हर वर्ष की तरह इस बार भी पूछ रहे थे कि महिला दिवस एक ही दिन क्यों?
अजीब सवाल है यार। हम पूरे वर्ष लक्ष्मी की आकांक्षा करते हैं किंतु दिवाली वर्ष में एक दिन ही क्यों आती है? हम पूरे वर्ष स्वतंत्र रहते हैं किंतु स्वतंत्रता दिवस एक ही दिन क्यों मनाते हैं? हम पूरे वर्ष अपनी बहन के प्रति स्नेहसिक्त रहते हैं किंतु रक्षाबंधन एक ही दिन क्यों मनाते हैं? संतति के शुभ के लिए मनाया जाने वाला अहोई अष्टमी और पति के सुख की कामना का पर्व करवा चौथ भी वर्ष में एक ही दिन मनाया जाता है! बेटियों के प्रति शुभेच्छा तो पूरे वर्ष रहती है, फिर हरियाली तीज एक ही दिन क्यों मनाई जाती है?
यह अनावश्यक असंतोष की प्रवृत्ति है, जो विवाद उत्पन्न करके उत्सव के उत्साह को भंग करती है। ऐसे सवाल हिन्दी दिवस पर भी उठते हैं। और जो लोग अपनी फेसबुक पर यह प्रश्न लिखकर स्वयं को क्रांतिकारी समझ रहे होते हैं उन्हें इतना भी भान नहीं है कि यह क्रांति इतनी बार हो चुकी है कि अब इससे प्रभाव नहीं, चिढ़ उत्पन्न होती है।
वर्ष के 365 दिन में से एक पूरा दिन जीवन के किसी एक पक्ष अथवा भाव को समर्पित करना ऐसा ही है, ज्यों लंबे सफ़र पर निकलते हुए पैट्रोल पम्प पर रुकना। गाड़ी पैट्रोल पम्प से ऊर्जा ग्रहण कर सैकड़ों किलोमीटर का सफ़र तय करती है। इस सफ़र में हर क्षण पैट्रोल गाड़ी की गति का कारक भी रहता है। किन्तु सफ़र में हर दस क़दम पर गाड़ी रोककर पैट्रोल का धन्यवाद ज्ञापन नहीं किया जाता।
ये महिला दिवस, ये हिंदी दिवस, ये हरियाली तीज जैसे पर्व वही पैट्रोल पम्प हैं जहाँ रुककर जीवन, किसी सम्बन्ध अथवा जीवनी शक्ति से स्वयं को इतना भर लेता है ताकि उस तत्व के साथ पूरे दमखम के साथ जीवन जिया जा सके।
देह को भोजन की आवश्यकता होती है, अतएव हम दिन में दो-तीन बार डाइनिंग टेबल पर बैठते हैं। अब कोई प्रश्न कर दे कि दस-पंद्रह मिनिट ही क्यों, आप पूरे दिन डाइनिंग टेबल पर क्यों नहीं बैठते? लीक से हटकर चलना हो तो यह विवाद खड़ा करके भोजन का आनन्द धूमिल किया जा सकता है किंतु अंततः इस प्रश्न के लिए ‘मूढ़ता’ से बढ़िया संज्ञा ढूंढ़ पाना असंभव होगा।
हाँ, यदि कोई व्यक्ति अन्न का अपमान करता हो, कोई भोजन को गाली देता हो अथवा दूसरों को भोजन करते देख उन्हें अपशब्द कहता हो तो ऐसे व्यक्ति को एक क्षण भी डायनिंग टेबल पर बैठने का अधिकार नहीं है। ऐसे व्यक्ति को एक कण भी भोजन नहीं मिले इसके लिए वैधानिक व्यवस्था होनी चाहिए। सो ऐसी व्यवस्था हमारे कानून में है। जो व्यक्ति महिलाओं के प्रति आपराधिक सोच रखता हो अथवा महिलाओं के प्रति किसी अपराध में संलग्न हो उसे हमारा न्यायालय दंड देता है।
यदि कहीं किसी महिला के साथ कोई अपराध हुआ हो तो इस हवाले से पूरे विश्व से महिला दिवस का उत्सव तो नहीं छीना जा सकता। किसी महिला ने कोई अपराध कर दिया तो भी महिला दिवस के उत्सव की भर्त्सना करना उचित नहीं हो सकता। किसी भाई ने अपनी बहन की हत्या कर दी, तो पूरे समाज से राखी थोड़े ही छीन ली जाएगी? बल्कि जब-जब रक्षाबंधन का पर्व आएगा तब-तब अपनी बहनों के प्रति किसी विद्वेष से भरे भाइयों के मन का कुछ कलुष धुलेगा ही।
जब-जब हिंदी दिवस आएगा तो सरकारी दफ्तरों में हिंदी में पत्राचार करनेवालों को कुछ नैतिक बल ही मिलेगा। जब-जब महिला दिवस मनाया जाएगा, तब-तब महिलाओं के प्रति रूढ़िवादी, अश्लील अथवा संकुचित सोच रखने वाले लोगों की नज़रें नीची ही होंगी।
साल में 365 दिन यदि बिखर-बिखरकर लोग महिलाओं के महत्व पर लिखेंगे तो वह छितराई हुई फुहार होगी जिससे कुछ विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा, किन्तु जब एक दिन ये सारी फुहारें एक साथ मिलकर बरसती हैं तो सोच पर जमी धूल और समाज में पड़े कचरे को बहा ले जाती हैं, धरती का मन तृप्त कर देती हैं और फिर पूरे बरस धरती पर हरियाली दिखाई देती है।
✍️ चिराग़ जैन