व्यवस्था
इसने कहा
कि उसकी वजह से व्यवस्था फेल हो गयी
उसने कहा
कि इसकी वजह से व्यवस्था फेल हो गयी
लेकिन एक बात तो दोनों ने कही-
‘व्यवस्था फेल हो गयी।’
✍️ चिराग़ जैन
इसने कहा
कि उसकी वजह से व्यवस्था फेल हो गयी
उसने कहा
कि इसकी वजह से व्यवस्था फेल हो गयी
लेकिन एक बात तो दोनों ने कही-
‘व्यवस्था फेल हो गयी।’
✍️ चिराग़ जैन
मनुष्यो!
हमारे साथ लगभग डेढ़-दो सौ युवा अनवरत गिलहरी की भूमिका में इस विपत्ति से लड़ रहे लोगों की सहायता का प्रयास कर रहे हैं। इन्हें न बदले में कोई धन्यवाद चाहिए न तमगा!
इनके प्रयासों ने विवशता के रेगिस्तान में खड़े कई प्यासे लोगों का गला तर भी किया है और कुछ तक बस एकाध बून्द ही पहुँचा सके हैं। कहीं-कहीं एक बून्द भी पहुँचाने में सफलता नहीं मिली है। लेकिन जिस भी दिशा से किसी मदद की गुहार आई, ये मरहम लेकर उस दिशा में दौड़े ज़रूर हैं।
मदद हो जाने के बाद हम उसके लिए पोस्ट की गई अपील भी अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से डिलीट कर देते हैं ताकि अंधाधुंध फॉरवर्ड करनेवालों की टोकरी में वह संदेश न चला जाए।
यह जटायु का रावण से संग्राम है। यह जुगनू की अंधेरे से जंग है। इस युद्ध में जुटे योद्धाओं की ताक़त देश के सामान्य परिवारों में बसनेवाले वो सद्भाव हैं जो किसी न किसी तरह से किसी की मदद करना चाहते हैं लेकिन वास्तविक ज़रूरतमंद तक पहुँचने का ज़रिया उनके पास नहीं है।
पिछले 12-15 दिन के दौरान इन नन्हीं गिलहरियों ने काफी हद्द तक आँसू और ग्लीसरिन में अंतर करना सीख लिया है। आप यदि कोई मदद करने के इच्छुक हैं तो हमसे सम्पर्क कीजिये।
ज़रूरी नहीं कि आपको स्वयं ही कोई मदद करनी होगी। आप अपने आस-पड़ोस में उपलब्ध कोविड सम्बन्धी किसी सेवा की ‘बिल्कुल सटीक’ जानकारी भी भेज देंगे तो भी उससे अनेक लोगों का लाभ होगा।
कृपया व्हाट्सएप और फेसबुक पर चल रहे किसी भी संदेश को बिना वेरिफाई किये न भेजें। आप केवल उसी सेवा की सूचना भेजें जो स्वयं आपके द्वारा उपलब्ध कराई जा रही हो अथवा जिसके विषय में आपने पूरी आश्वस्ति कर ली हो।
आपकी सेवा किस शहर के लिए है, यह अवश्य लिखें।
किसी भी मददगार का नम्बर सार्वजनिक नहीं किया जाएगा और आपके पास सीधे मरीज़ के परिजन का ही फोन आएगा।
सोशल मीडिया पर सेवा का कई क्विंटल कचरा घूम रहा है। इस कचरे के ढेर में से असली सूत्र ढूंढने में हमारी मदद करें।
और हाँ, हमें आर्थिक मदद के लिए तभी सम्पर्क करें जब हम इसके लिए कोई अपील पोस्ट करें।
एक लास्ट रिक्वेस्ट, व्हाट्सएप पर केवल आवश्यक सूचना ही भेजें। प्रशंसा के सन्देश पढ़ने में जो समय नष्ट होता है उसका सदुपयोग कर हम कोई लीड ढूंढ़ लेंगे।
✍️ चिराग़ जैन
ईश्वर का सिस्टम पूरी तरह त्रुटिरहित होता तो मनुष्यों की देह में वीभत्स पशुओं का जन्म सम्भव नहीं था। किसी के मर जाने पर उसके परिजन जो रुदन करते हैं, उसे देखकर भी जिसकी आत्मा न काँपती हो वह कम से कम मनुष्य तो नहीं हो सकता।
एक अदद इन्सान को साँसों के लिए तड़पते देखकर भी जो ऑक्सीजन, दवाई और अस्पताल में जगह दिलवाने के बदले पैसा कमाने की सोच रहा हो उसकी देह में मनुष्यता रखना तो ईश्वर भूल ही गया होगा।
रोते बच्चे, बिलखती औरतें और तड़पते मरीज़ जिसके भीतर करुणा न उपजा सकें, उनके आँसुओं और पीड़ा में भी जो लाभ-हानि का गणित जोड़ने की गुंजाइश निकाल ले वह तो सड़ांध मारते शव पर लिजलिजाते कीड़ों से भी ज़्यादा घिनौना है।
ये सब प्राणी, जिन्हें कम से कम मैं मनुष्य तो नहीं कह सकता; ईश्वर ने मनुष्यों के वेश में धरती पर छोड़े हैं इसका साफ मतलब है कि ईश्वर की फैक्ट्री में भी मिलावटखोरी का धंधा जारी है।
तवायफ़ भी किसी मौके पे घुंघरू तोड़ देती है। लेकिन ये मिलावटी जीव किसी भी अवसर को भुनाने से नहीं चूकते। अस्पतालों के डॉक्टर से लेकर फुटपाथ पर पड़े नशेड़ी तक और राजनीति के गलियारों से लेकर दफ़्तर के बाबू तक; यह मिलावटी जीव हर जगह मौजूद है।
इसको बनाते समय ईश्वर के कर्मचारियों ने कोमल तंतुओं से बना हृदय बेच खाया होगा और इसके सीने में पत्थर का टुकड़ा रखकर ऑर्डर पूरा कर दिया होगा। इसके भीतर आत्मा, ज़मीर तथा दिल ही बदले गए हैं। इसलिए इसका शेष आचरण देखने में मनुष्यों जैसा ही रहता है।
यह अन्य मनुष्यों की भाँति बीमार भी पड़ता है। लेकिन बीमारी को भी अवसर मानकर यह मदद करने वाले को ही नोच खाने की जुगत में लग जाता है।
यह उसी प्रजाति का जीव है जो ‘हार की जीत’ कहानी में लाचार भिखारी बनकर बाबा भारती से उनका घोड़ा छीन लेता है। बस अंतर इतना है कि उस कहानी में बाबा भारती के वचन सुनकर खड़गसिंह का ज़मीर जाग जाता है, लेकिन इस प्राणी के जिस्म में ज़मीर सोया नहीं बल्कि मर चुका है।
इस प्राणी के कारण वास्तविक मनुष्यों को भी अपमान और अभाव सहना पड़ता है। इस प्राणी की पहचान आसान नहीं है, क्योंकि यह मेन्युफेक्चरिंग फ्रॉड है। धरती की कंपनियां तो अपनी साख बचाने के लिए कई बार अपने ख़राब प्रोडक्ट को कॉल बैक कर लेती है, लेकिन ईश्वर के यहाँ शायद क्वालिटी मेंटेनेंस विभाग में भी रेकॉर्ड्स बदल दिए गए हैं।
✍️ चिराग़ जैन
परसों रात से ही ऐसे फोन आने लगे थे कि मरीज़ अस्पताल में तो एडमिट है लेकिन ऑक्सीजन न होने के कारण अस्पताल वालों ने बैड ख़ाली करने को कह दिया है। सुनकर दिल दहल गया। जिसे साँस ठीक से नहीं आ रही, वह अस्पताल से भी निकाल दिया गया तो कहाँ जाएगा! ऐसे मरीज़ों की मदद के लिये अस्पतालों में फोन करवाए तो डॉक्टर और अस्पताल प्रशासन के लोग रोते-बिलखते मिले। उनका कहना है कि जब हमारे पास ऑक्सीजन ख़त्म हो रही है तो हम मरीज़ को यहाँ रखकर क्या करें। वेंटिलेटर हैं, लेकिन उन्हें ऑपरेट करने वाले टेक्नीशियन नहीं हैं। जिन छोटे-छोटे नर्सिंग होम में मरीज़ भरे हुए हैं, वे सामान्यतया विज़िटिंग डॉक्टर्स के बेस पर बने हुए हैं और अब उनमें मरीज़ तो हैं लेकिन डॉक्टर्स की कमी है।
मरीज़ों के परिजन जब विकल हो जाते हैं तो उनका ग़ुस्सा डॉक्टर और अस्पताल प्रशासन पर उतरता है। विवशता ने इतना अमानवीय बना दिया है कि अस्पताल के बाहर पड़ा रोगी इंतज़ार कर रहा है कि भीतर किसी की साँसें रुक जाएँ तो मुझे बैड मिले!
इन परिस्थितियों में स्वयं को खड़ा करके सोचा तो डॉक्टर्स पर नाराज़ होते परिजन भी ग़लत नहीं लगे; मरीज़ के आगे लाचार खड़े डॉक्टर भी अपनी जगह किसी हद्द तक सही लगे; और अस्पताल के बाहर किसी के मरने की प्रतीक्षा करता रोगी भी पूरी तरह ग़लत नहीं लगा।
फिर ग़लत है कौन? इस सबका दोषी है कौन? राजनैतिक या कार्यपालिका के स्तर पर किसी से पूछो तो वह हमें ‘पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन’ का पाठ्यक्रम पढ़ाने लगता है। उसका फोकस समस्या का समाधान ढूंढने से ज़्यादा इस बात पर होता है कि इस समस्या का ठीकरा उसके सिर न फूट जाए। इन चारित्रिक दरिद्रों की स्थिति देखकर मेरा साधारण-सा प्रश्न यह है कि जब अभी तक यही स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इस सिस्टम में किस काम के लिए उत्तरदायी कौन होगा, तो पिछले सात-आठ दशक से यह सिस्टम का भौंडा नाटक क्यों चल रहा था?
पूरे तंत्र में हर अधिकारी केवल अपनी टेबल से फाइल को किसी अन्य की टेबल पर स्थानांतरित करने का ‘काम’ कर रहा है।
बाढ़ आने के बाद पुल बनाने का ड्रामा सिस्टम के लिए शर्मनाक है। लेकिन जो गाँववाले बाढ़ आने के बाद बेतरतीबी से ही सही, डूबतों को बचाने के लिए दौड़ पड़ते हैं; वे स्तुत्य होते हैं। हमारे समाज में भी इस समय ऐसे लोगों की उपस्थिति है, जो ख़ुद घुटनों-घुटनों पानी में खड़े होकर किसी डूबते को बचाने के लिए हाथ बढ़ा रहे हैं। लेकिन हमारे समाज में ऐसे भी लोग मौजूद हैं जो इन हाथ बढ़ाते लोगों के पाँव डगमगाने के लिए प्रयासरत हैं।
कालाबाज़ारी और मुनाफाखोरी से ग्रसित इस समाज में यदि कोई सहृदय व्यक्ति किसी समस्या और समाधान के मध्य सेतु बनते हुए किसी का लिंक किसी पीड़ित को फॉरवर्ड कर देता है, और दुर्भाग्य से वह फोरवार्डिड लिंक किसी मुनाफाखोर का निकलता है तो इसमें उस व्यक्ति की क्या ग़लती है, जो लिंक फॉरवर्ड कर रहा है। लेकिन इस स्थिति में हमारा सिस्टम बड़ी जल्दी एक्टिव होने लगता है। वह असली मुनाफाखोर को पकड़ने से पहले इस बेचारे संवेदनशील व्यक्ति को ज़रूर धर दबोचेगा। ऐसा मैं नहीं कह रहा, ऐसा वे लोग बता रहे हैं जो सहायता करनेवालों के हौसले पस्त करना चाहते हैं।
सड़ांध मारते इस सिस्टम में अपराध करना आसान है लेकिन किसी की मदद करना बेहद मुश्किल है। ‘तू ज़्यादा समाजसेवी बन रहा है’; ‘दूसरों के फटे में टांग मत फँसा’; ‘फटी के ढोल ख़रीदे हैं तो बजाने तो पड़ेंगे’ और ‘अपने घर में चुपचाप बैठ, घणी नेतागिरी मत कर’ जैसे जुमलों ने सामाजिक परोपकार की भावना को नपुंसक करने का काम अनवरत किया है। हमारे घरों में भी इन जुमलों से प्रभावित अभिभावकों की पूरी पीढ़ी सक्रिय है।
सामाजिक मदद के लिए आगे बढ़नेवाले का उपहास गली-नुक्कड़ों से लेकर बन्द कमरों तक हर जगह स्थान पा लेता है। हमारे थाने और कचहरियाँ तो इन लोगों के जज़्बे को भौंथरा करने के लिए निर्मित ही किये गए हैं। गांधी, बिनोवा और भगतसिंह के देश में यदि जनसेवा की निष्काम भावना के साथ यही व्यवहार होता रहा तो स्वयं को ‘जनसेवक’ कहकर सत्ता हथियानेवालों के हाथ समाज बार-बार ऐसे ही छला जाता रहेगा कि जिन अस्पतालों में ज़िन्दगी को साँस मिलनी चाहिए थी, वे ख़ुद ऑक्सीजन के अभाव में दम तोड़ने लगेंगे और जिन डॉक्टरों की आँखों में तैरता आत्मविश्वास मरीज़ों के परिजनों को हौसला देता था, वे डॉक्टर ख़ुद आँखों में आँसू भरकर अपनी लाचारी का प्रेस्क्रिप्शन लिखते दिखाई देंगे।
एक बात साफ़ समझनी होगी कि जो मरहम लगाने वाले के मरहम को मिर्च कहकर भ्रांति फैला रहा है, उसकी अपनी चुटकी में मरहम तो दूर, मिर्च भी नहीं मिलेगी।
✍️ चिराग़ जैन
जो लोग कोविड की आपदा को अवसर समझकर ऑक्सीजन से लेकर दवाइयों तक की कालाबाज़ारी कर रहे हैं; वे भी इसी देश के हिस्से हैं। जो लोग बिना किसी कारण के ऑक्सीजन और ज़रूरी दवाइयाँ अपने घरों में स्टॉक कर रहे हैं, वे भी इसी देश के हिस्से हैं। जो लोग किसी से दुश्मनी निकालने के लिए उसका फोन नम्बर कोविड हेल्प के पोस्टर पर चिपका कर वायरल कर रहे हैं, वे भी इसी देश के हिस्से हैं। और जो लोग तन-मन-धन से जुटकर लोगों की यथासम्भव मदद कर रहे हैं, वे भी इसी देश के हिस्से हैं।
हमारा समाज सामान्यीकरण करने की प्रवृत्ति का शिकार रहा है। दिल्ली में कोई बलात्कार हो गया तो हर दिल्लीवाले को घूर-घूरकर देखने लगे। भाजपा का कोई नेता बेईमान निकल गया तो हर भाजपाई को गरियाने लगे। कांग्रेस का कोई नेता नाकारा निकल गया तो पूरी कांग्रेस का उपहास करने लगे। भगवा वस्त्र पहनकर कोई अपराध करता पकड़ा गया तो पूरे हिन्दू समाज को कठघरे में खड़ा कर दिया। जाली टोपी लगाकर कोई गुनाह करता मिला तो सभी मुसलमानों को गुनहगार मान बैठे। एक महिला दहेज की आँच में जली तो हर दूल्हे को हत्यारा समझ लिया। एक पति का परिवार दहेज कानूनों के कारण बर्बाद हो गया तो हर दुल्हन को षड्यंत्री मान लिया।
यह प्रवृत्ति समाज के लिए घातक है। जिन खेतों में अन्न उपजता है वहाँ धतूरा भी फूट आता है। कैक्टस के झाड़ में भी दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत फूल खिल जाते हैं। किसी के प्रति धारणा पालकर उसके पूरे समुदाय के लिए जजमेंटल हो जाना अविवेक का प्रमाण है।
हमने तो अपने धर्मग्रन्थों में देखा है कि सौ कौरवों में भी एक ‘विकर्ण’ हो सकता है। हमने अपनी कथाओं में पढ़ा है कि बाली के घर भी अंगद जन्म ले सकता है। फिर हम इतनी सरलता से किसी एक के कृत्य को देखकर किसी अन्य का आकलन क्यों करने लगते हैं?
एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक की यात्रा तो बड़ी बात है हमने तो एक ही अशोक का चंड रूप भी देखा है और विरक्त रूप भी। हमने एक ही अंगुलिमाल में दो चरित्र देखे हैं। यदि बुद्ध भी अंगुलिमाल के प्रति जजमेंटल हो गए होते तो उसके गले से अंगुलियों की माला उतारकर उसे कांचुकीय पहनाने में कभी सफल न हुए होते।
धारणाएँ बनाकर समाज को देखना बन्द करना होगा। पूरी दुनिया की राजनीति ने ऐसी ही पूर्वग्रह ग्रसित धारणाओं के आधार पर समाज को बाँटा है और पूरी दुनिया के अध्यात्म ने इस बँटवारे को पाटने के लिए मनुष्यता का भराव किया है।
जो बाँट रहा है, वह अपना कोई भी नाम रख ले, लेकिन उसके मूल में सियासत मिलेगी। और जो जोड़ रहा है, वह चाहे अपना कोई भी रूप बना ले, उसके मूल में मनुष्यता मिलेगी।
यह समय व्यक्तियों के प्रति धारणाएँ बनाने का नहीं अपितु मनुष्यता को पोसने का है। विपत्ति का यह कालखण्ड यदि मनुष्य को मनुष्यता का सम्मान करना सिखा गया तो इसके लिए चुकायी गयी क़ीमत की टीस काफ़ी कम हो जाएगी।
चिराग़ जैन