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विजय का मंत्र

जो समर्पित हो गया मजबूर होकर
वह तुम्हारा हित करेगा; भूल जाओ
जो न अपने मन मुताबिक जी रहा हो
वह तुम्हारे हित मरेगा; भूल जाओ

कर्ण इक एहसान के वश में विवश थे
द्रोण इक प्रतिशोध के कारण खड़े थे
शल्य इक षड्यंत्र से आहत हुए थे
भीष्म इक प्रण की विवशता में लड़े थे
मन बचा पाया नहीं जो, शूर होकर
वह तुम्हारा ध्वज धरेगा; भूल जाओ

पाप बर्बर हो उठेगा जीत कर भी
तुम स्वयं की हार से भी प्यार करना
मूढ़ता संख्या जुटाती ही रहेगी
तुम निहत्थे मित्र का सत्कार करना
कृष्ण जिसके साथ हो, भरपूर होकर
वह किसी सूरत डरेगा; भूल जाओ

बैठ मत जाना थकन से चूर होकर
पास आएगी विजय; कुछ दूर होकर
जब निराशा टीस दे नासूर होकर
तब करो निर्माण; चकनाचूर होकर
स्वयं को स्वीकार ले जो क्रूर होकर
वह कभी दुःख से भरेगा; भूल जाओ

✍️ चिराग़ जैन

सच बोलना पाप है

क्या कहा, तुम सच कहोगे
और ज़िंदा भी रहोगे
झूठ का चाबुक तुम्हारी खाल खींचेगा समझ लो
और फिर सारा ज़माना आँख मीचेगा समझ लो

ख़ुद नदी ने इस तरह के दाँव सारे रख दिए हैं
नाव जैसे दिख रहे पत्थर किनारे रख दिए हैं
पेड़, जिसकी छाँह के दम पर भिड़े हो धूप से तुम
धूप ने उस पेड़ की जड़ में अंगारे रख दिए हैं
क्या कहा, सच का सहारा
ये महज भ्रम है तुम्हारा
हर सहारा फेर कर मुँह, होंठ भींचेगा समझ लो
और फिर सारा ज़माना आँख मीचेगा समझ लो

दिन दहाड़े हो नहीं सकता भला अंधेर कैसे
मौत पहले आ गई क्यों, न्याय में है देर कैसे
जो सभी की थालियों से, ले गया रोटी उठाकर
सब उसी को दे रहे हैं तोहफ़ों के ढेर कैसे
क्या कहा, दिल की सुनोगे
एक दिन तुम सिर धुनोगे
दिल उम्मीदों का ज़खीरा भी उलीचेगा समझ लो
और फिर सारा ज़माना आँख मीचेगा समझ लो

लूट के हर दृश्य में हम मूकदर्शक हो गए हैं
झूठ की हर कामयाबी के प्रशंसक हो गए हैं
कोई अत्याचार सुनकर दिल दहलता ही नहीं है
आत्माएँ हैं दिवंगत, मन नपुंसक हो गए हैं
क्या कहा विश्वास रखें
आसमां से आस रखें
आसमां ख़ुद तो न बंजर खेत सींचेगा समझ लो
और फिर सारा ज़माना आँख मीचेगा समझ लो

✍️ चिराग़ जैन

अज्ञातवास

राज्य, वैभव और निज पहचान तक से हाथ धोकर
चल दिये पाण्डव स्वयं के शौर्य से अज्ञात होकर
वीरता के उपकरण को गौण रहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है

भाग्य ने क्या खेल खेला है विवशता के पलों में
सूख जाने की अनोखी खलबली है बादलों में
शस्त्र, जिनको प्राप्त करने के लिए काया गलाई
अब उन्हीं सबको छुपाते फिर रहे हैं जंगलों में
प्राण के बिन, देह को चुपचाप दहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है

देख लो, राजा युधिष्ठिर कंक बनकर जी रहे हैं
द्यूतगृह में दांव हारे, रंक बनकर जी रहे हैं
विश्व जिनकी वीरता को देखकर इतरा रहा था
वे स्वयं के शौर्य का आतंक बनकर जी रहे हैं
पार्थ ने गांडीव तज, शृंगार पहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है

द्रौपदी को साज और सिंगार की अनुमति नहीं है
भीम को निज जीभ के सत्कार की अनुमति नहीं है
वीरता भयभीत है, कोई उसे पहचान ना ले
अब अनुज को अग्रजों के प्यार की अनुमति नहीं है
आह, हर इक चाह का अवसाद गहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है

शौर्य के हर चिह्न से परहेज करना पड़ रहा है
धैर्य की भी धड़कनों को तेज़ करना पड़ रहा है
यश बढ़ाने का हर इक आशीष अब अभिशाप सा है
हाय अपने आपको निस्तेज करना पड़ रहा है
रक्त तक को धमनियों में शांत बहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है

इस पराभव का जनक क्या द्यूत का षडयंत्र बल है
कर्म के अनुरूप फल होगा, नियम ये भी अटल है
दांव पर थी लाज और भुजदण्ड में कंपन नहीं था
यह विवशता उस नपुंसक शौर्य से उत्पन्न फल है
इक घड़ी का मौन अब दिन-रात सहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है

✍️ चिराग़ जैन

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