Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जिसको सुख का उत्सव समझा,
वो दुख का आयोजन निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे,
उसका नाम विभीषण निकला
जीवन भर विश्रांत रहा जो, हमने उसको शांतनु माना
जिसने हर अनुशासन तोड़ा, उसका नाम सुशासन जाना
जिसका जीवन लाचारी था, उसका परिचय भीष्म बताया
अपशकुनों का मूल रहा जो, वह जग में शकुनी कहलाया
कृष्ण कहा जिसको दुनिया ने, वह जग का आभूषण निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे, उसका नाम विभीषण निकला
नाम श्रवण था जिसका, उसने आहट नहीं सुनी दशरथ की
एक मंथरा क्षण भर में ही इति बन गई हर सुख के अथ की
मानी को समझाने अंगद बनकर बुद्धि स्वयं आई थी
कुम्भकर्ण तक जाग गया पर रावण पर तंद्रा छाई थी
मुख दिखलाने योग्य नहीं जो, वह कुल्हन्त दशानन निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे, उसका नाम विभीषण निकला
जिस वेला में राजतिलक होता उसमें वनवास हुआ है
उत्सव की चौसर पर कुल की लज्जा का उपहास हुआ है
कंचन मृग लाने निकले थे, घर की मृगनयनी खो बैठे
खाण्डव वन को स्वर्ग किया था, ख़ुद ही वनवासी हो बैठे
जिस अवसर पर मेल लिखा था, उसका अंत विभाजन निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे, उसका नाम विभीषण निकला
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
एक गर्भिणी हथिनी, तीन दिन तक अपने भीतर पल-पल बढ़ती टीस का कारण समझने की कोशिश में तड़प-तड़पकर मर गई। अपने जर्जर मुँह पर मनुष्य के बर्बर चेहरे के हस्ताक्षर लिए वह माँ अपने बच्चे को साथ लेकर दूर चली गई।
‘मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया, तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया’ की हिक़ारत के साथ उसके जलसमाधि ले ली। अपनी धर्मपरायणता का ढोंग करते मनुष्य ने कब अपने दिल में पत्थर विराजित कर लिए, पता ही न चला। स्वयं को गॉड फीयरिंग कहनेवाले आदमी के इस दुःसाहस को देखकर गॉड भी (अगर कहीं हो तो) काँप गया होगा।
हथिनी तो गणपति भाव से मनुष्य के भीतर उग आए पशु की कथा लिखकर चली गई, लेकिन उसकी मौन कराह मनुजता के ध्वंस का एक ऐसा अध्याय प्रारम्भ कर गई है, जिसका हर पलटता पृष्ठ मनुष्यता से हीन मनुष्य जाति के पटाक्षेप की वक़ालत करता रहेगा।
समुद्र से उठते भीषण चक्रवात, हवा में घुलता जा रहा विष, मर्यादा की लक्ष्मण रेखा लांघती सूनामी, रह-रहकर काँप उठती धरती, आग बरसाता आसमान, रिहायशी इलाक़ों में घुस आए तेंदुए, खेतों पर टूट पड़ते टिड्डीदल, खड़ी फसल पर गिरते ओले, हज़ारों की संख्या में बिछी चमगादड़ों की लाशें, जगह-जगह हो रहे गृहयुद्ध, चरमराती व्यवस्था में पनपती अराजकता और वर्चस्व की होड़ में अनदेखा होता अस्तित्व; चीख़-चीख़ कर मनुष्य को अल्पविराम का इंगित कर रहा है।
एक पल, ठहरकर संवेदनाओं को पोषित करने की सलाह दे रहा है। एक क्षण, बैठकर पैरों को विश्राम देने की दुहाई दे रहा है ताकि मस्तिष्क तक रक्त का संचरण हो सके और मस्तिष्क अपनी दिशा-दशा पर विचार करने में सक्षम हो पाए। एक लम्हा, रुककर धौंकनी बन चुके फेफड़ों में प्राणवायु भर लेने की सिफ़ारिश कर रहा है।
उस मूक संवेदना की इस दर्दनाक़ मौत को भी इस अल्पविराम का निमित्त नहीं बनाया गया तो पूर्णविराम लगाना प्रकृति की विवशता होगी।
✍️ चिराग़ जैन
Ref : Kerala Elephant Murder Case
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
घुट-घुट कर साँस लेते आदमी को
घुटने से बचाने के लिए
व्यवस्था के घुटने बहुत काम आते हैं
दहशत में साँस लेती जनता को
एक ही बार में
साँस की चिंताओं से
मुक्त कर जाते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Ref : George Floyd Death Issue in America
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
बुनियाद पूरी इमारत का वज़्न उठा सकती है लेकिन एक कंगूरे का बड़बोलापन उसे बहुत भारी पड़ता है।
✍️ चिराग़ जैन
Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose, Story
वन्स अपॉन ए टाइम। जम्बूद्वीपे भरतखण्डे एक ऐसा राजा था, जिसे प्रशंसा सुनने का बहुत चाव था। उसने राजा बनते ही अपने महल में से बहादुर सिपाहियों को हटाकर वहाँ सैनिक के कपड़ों में प्रशंसक खड़े कर दिए।
प्रशंसा और चाटुकारिता की क्षमता देखते हुए राजतंत्र को पद तथा पदोन्नतियाँ दी गईं। जब कोई नागरिक राजा के दरबार में समस्या लेकर जाता तो प्रशासकों के वेश में बैठे चाटुकार, उसकी समस्या सुनने के बजाय उसे राजा की प्रशंसा से भरी पुस्तिका थमा देते। जो कोई राज्य की किसी अव्यवस्था या समस्या की बात करता, उस पर राजद्रोह का अभियोग चलाकर उसे पड़ोसी देश चले जाने का दण्ड सुना दिया जाता।
एक दिन राज्य पर शत्रु ने आक्रमण कर दिया। सारा राज्य तहस-नहस हो गया। जनता मरती रही और राजमहल राजा की महानता की पुस्तिकाएँ जारी करता रहा। राज्य को ध्वस्त करने के बाद शत्रु राजमहल में घुस गया।
राजा अपनी जान बचाने के लिए भागने लगा। उसने महल के द्वार पर खड़े सिपाही से रक्षा करने की गुहार की। गुहार सुनते सैनिक ने अपने शस्त्र नीचे रखे और तालियाँ बजाते हुए गाने लगा- ‘वाह महाराज, क्या भाग रहे हैं! वाह राजन, क्या दौड़ रहे हैं!’
अगले दिन प्रशंसा पुस्तिका में छपा- ‘हमारे राजा ने विश्व में सबसे तेज़ दौड़ने का कीर्तिमान स्थापित किया।’
✍️ चिराग़ जैन