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हम भारतीय लोग प्रवृत्ति से विश्वासजीवी हैं। विश्वास दो प्रकार का होता है, एक अटल विश्वास और दूसरा अटूट विश्वास। भाषा के बहुत गहरे विश्लेषण के हाथों मजबूर न हों तो इन दोनों का अर्थ एक ही है किन्तु फिर भी विश्वास दो प्रकार का होता है ऐसा हमारा विश्वास है।
जब हम किसी पर अटूट विश्वास करते हैं तो उसे तब तक अटूट बनाए रखते हैं जब तक वह टूट न जाए। एक बार टूट जाने के बाद हम फिर दोगुनी शक्ति लगाकर अटूट विश्वास करने लगते हैं।
नेता चुनाव में जो वायदे करते हैं, वे झूठे होते हैं -ऐसा हमारा विश्वास है। इसलिए प्रत्येक दल के वायदे सुनने के बाद सबसे बढ़िया झूठ बोलनेवाले नेता को अपना विश्वास मत देकर हम उसे सदन में भेज देते हैं। वह जीतते ही हमारे दुःख-दर्द को भूल चुका होगा- ऐसा हमारा विश्वास है। इसलिए हम उसके विपक्षी पर विश्वास करके उसके खि़लाफ़ नारे लगाने लगते हैं।
जो लोग सरकार के विरोधी हैं वे विपक्ष पर विश्वास करते हैं। जो लोग विपक्ष के विरोधी हैं वे सरकार पर विश्वास करते हैं। जो किसी के विरोधी नहीं हैं वे सब पर विश्वास करते हैं। और जो सबके विरोधी हैं वे ख़ुद पर विश्वास करते हैं।
मुहल्ले के कोई गुंडा भारतीय लोकतंत्र पर टिके हमारे विश्वास की हत्या करे तो हम पुलिस पर विश्वास कर बैठते हैं। जैसे ही हमें हमारी भूल का आभास होता है हम तुरंत अपने विश्वास की आरती का थाल लेकर न्यायालय में घुस जाते हैं। न्यायालय में जब विश्वास की लौ झपकने लगती है तो हम उसे संसद की ओट से बचाने की कोशिश करते हैं। जब संसद में भी विश्वासमत गिरने लगता है तो हम मीडिया के कैमरे के सामने विश्वास की गठरी खोल बैठते हैं। कैमरे के हाथ जब उल्टे हमारी ही गर्दन की ओर बढ़ने लगते हैं तो हम मुहल्ले के किसी गुंडे को लाख-दो लाख रुपये चढ़ाकर अपने विश्वास की रक्षा कर लेते हैं।
कल कुछ विश्वासी नागरिक बोल रहे थे कि सरकार ने सुशासन और सुविधाओं का पार्सल दिल्ली से रवाना किया है। अब समस्या यह है कि जिस ट्रेन से रवाना किया है वह लेट चल रही है।
हमने तार्किक उत्तर का विश्वास रखकर प्रश्न पूछ लिया- ‘पर भैया, जिस सरकार ने पार्सल भेजा है; ट्रेन भी तो उसी सरकार के आदेश पर चलती है।’
प्रश्न सुनते ही वे भड़क गए। बोले, ”तुम जैसे लोगों के कारण ही इस देश का सत्यानाश हुआ है। जब देखो सरकार को उंगली खोंचते रहते हो। और कुछ काम ही नहीं है। तुम साले पाकिस्तान के एजेंट हो। राष्ट्रद्रोही हो तुम। तुम ही सरकार को बदनाम करने के लिए ट्रेनवा लेट कराए हो। तुम्हें खटक रहा है कि कोई आदमी काम कैसे कर ले। तुम्हारी छाती पर तो साँप लोट रहे हैं।”
उनका यह रौद्र रूप देखकर हमें विश्वास हो गया कि सरकार ने सचमुच दिल्ली से पार्सल भेजा है जो एक न एक दिन गाँव तक ज़रूर पहुँचेगा, लेकिन मिलेगा उसी को जिसे सरकार पर अटूट और अटल दोनों तरह का विश्वास होगा।

© चिराग़ जैन

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