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व्यस्तता

तुम आई थीं सुख की गगरिया लिए सुख लुटाने। पर मैं बैठा ही रह गया घात लगाए जीवन के अहाते में चुराने को दो पल सुख। अब सुख तो है पर चोरी का है तुम नहीं हो ना! गगरिया नहीं है मीठे सुख की। ✍️ चिराग़...

नेह का दर्प

प्रेम की धारा में तुम निर्बाध बह पाते काश मुझसे एक पल तुम सत्य कह पाते जब कोई अपनत्व था चरितार्थ तुममें जब कभी जागा हो कोई स्वार्थ तुममें क्यों मेरा संकोच बदला आग्रहों में कौन सा अधिकार था उनकी तहों में काश उस मनुहार का तुम अर्थ गह पाते जब किसी घटना से आहत हो गया मन...

उम्मीद के बिना

तुम हमेशा मुझे दोषी ठहराती हो कि मैं अपने रिश्तों में उम्मीदें बहुत रखता हूँ लेकिन समझ नहीं पाता हूँ मैं कि उम्मीद के बिना निभ ही कैसे सकता है कोई रिश्ता …..उम्मीद के बिना तो दान तक नहीं दिया जाता! ✍️ चिराग़...

कम्मो मिल गई बीच बाज़ार

कम्मो मिल गई बीच बाज़ार बीवी लड़ने कू तैयार कम्मो ने मुस्का कर देखा, बीवी हो गई ढोल चार दिनां से बोल रही ना हमसे मीठो बोल कम्मो ही बढ़िया थी यार कम्मो मिली मगर की हमने एक न मन की बात एक तरफ बीवी लतियाये एक तरफ जज़्बात फिर से जागा सोया प्यार ऐसी मिली घड़ी भर कम्मो खड़ी हो...

पेशा

हर पेशे की अपनी-अपनी ब्यूटी है हर पेशे की अपनी-अपनी ड्यूटी है हमें अक्सर सामने वाले का पेशा मज़ेदार लगता है क्योंकि उसका सच हमसे दूर होता है, लेकिन हर पेशे में कभी न कभी आदमी बहुत मजबूर होता है। जब कोई जज किसी की ज़िन्दगी का फैसला लिखता है तो वो ऊपर से बहुत आत्मविश्वासी...
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