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शर्मिंदगी

“ओहो! कितना कूड़ा हो गया। आग लगे इस मौसम में। मार आंधी-तूफ़ान… सारे आंगन में कीचड़ हो गई। देखियो, उधर सारी अंबियाँ झड़ गईं। कैसी हरी डाल टूट गई नीम की! …इस रामजी को भी चैन ना है! कै तो पसीना चुआवै कै ऐसा तूफान मचावै।” अपने आपसे बतियाती हुई पानी...

ब्लॉगर होगा पहला कवि

युग बीत गये हैं अब प्रकृति, बरखा या दर्द सहायक सामग्री नहीं है अब कविता के लिये! …अब नहीं जन्मती कविता वियोग या संयोग से! आजकल फ़ेसबुकिये हो गये हैं वाल्मीकि और तुलसीदास! “ब्लॉगर होगा पहला कवि पोस्ट से उपजा होगा गान!” ✍️ चिराग़...

ऑडियन्स कैप्चर की शतरंज

बुश बैरॉन का एक टीवी हमारे पास भी था। घर का सबसे स्पेशल कोना सुशोभित होता था उससे। क़माल ये था कि संज्ञा के तौर पर टीवी ने पूरा कमरा हड़प लिया था। टीवीवाला कमरा नाम था उस चुम्बकीय कक्ष का। कुछ अपरिहार्य कर्मों के इतर, लगभग सबके सभी नित्य-अनित्य कर्म उस कमरे में सम्पन्न...

विचार और मूर्त

दिल की ज़मीन पर जो इक बीज पड़ गया है हर हाल में फलेगा, ये सृष्टि का नियम है कोई विचार मन में, आकर ठहर गया तो जन्मों-जनम पलेगा, ये सृष्टि का नियम है सुख-दुख के चंद पल हैं, जीवन जिसे हैं कहते युग-युग के चक्करों में, बिन बात फँसते रहते अज्ञानवश जो अपना गुलशन उजड़ गया है वो...

गुरूपूर्णिमा

एक महान आदमी में सीखने की प्रवृत्ति इतनी अधिक थी कि उसने गधे को भी गुरू बना लिया। लेकिन आजकल लोग गुरु को गधा बनाने पर तुले रहते हैं। इसका कारण ये नहीं है कि नयी पीढ़ी उद्दंड है बल्कि सुभद्रा मैया जब पिताजी की डींगों का इम्प्रेशन अभिमन्यु पर झाड़ रही थी तो अभिमन्यु माँ...
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