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अन्ना आंदोलन

आज मैंने एक ग़ज़ब का नज़ारा देखा मैंने देखा एक होड़ सी लगी थी बारिश के जज़्बे से लोगों के जज़्बे की। झमाझम बरसात में दिल्ली की सड़कें उफ़न आईं थीं लोगों के हुज़ूम से। किसी को कोई डर ही नहीं था बीमार पड़ने का क्योकि वे सब आए थे देश की महामारी का इलाज़ करने। जहाँ तक निगाह जाती थी...

संकुचन

हम फैलाना चाहते हैं बाइबल को गीता को क़ुरआन को जातक को आगम को। लेकिन समेट लेना चाहते हैं अपने ईसा अपने कृष्ण अपने पैग़म्बर अपने बुद्ध और अपने महावीर। हमने शास्त्र बना दिया है किताबों को विस्तृत करके। और पुरखा बना दिया है भगवान को संकुचित करके। ✍️ चिराग़...

आज़ादी

शहीदों ने लिखी थी कल हमारे नाम आज़ादी मगर हमने बना डाली है इक इल्ज़ाम आज़ादी ‘ग़ुलामी की ज़दों में ज़िन्दगी दुश्वार होती है’ हमें चुपके से दे जाती है ये पैग़ाम आज़ादी कमाई से कहीं मुश्क़िल है दौलत की हिफ़ाज़त भी संभाले रख नहीं पाए कई सद्दाम आज़ादी घड़ी भर को नज़र चूकी, अंधेरा हो...

झूठ के दम पे मुहब्बत

सच के कारण मिली नफ़रत क़ुबूल है लेकिन झूठ के दम पे मुहब्बत नहीं अच्छी लगती यूँ तो रिश्ते मेरे दिल को सुक़ून देते हैं पर ये रिश्तों की सियासत नहीं अच्छी लगती भूख जिस वक़्त कलेजा गलाने लगती है तब ख़ुदाओं की इबादत नहीं अच्छी लगती उनको कल तक मेरा क़िरदार बहुत भाता था अब मेरी...

घुटने

जिनकी पहचान थी ख़ुद्दारी, उन्हीं लोगों के हाथ तो हाथ मेरे यार, जुड़े हैं घुटने बात जब अपने पे आती है बदलते हैं उसूल पेट की ओर ही हर बार मुड़े हैं घुटने ✍️ चिराग़...
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