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अपना-अपना शऊर था

सरे-बज़्म मैं रुसवा हुआ, यही दौर का दस्तूर था मैं ये बाज़ियाँ न समझ सका, मिरी सादगी का क़ुसूर था तूने ग़म में ख़ुशियाँ तबाह कीं, मैंने हँस के दर्द भुला दिये ये तो अपना-अपना रिवाज़ था, ये तो अपना-अपना शऊर था तुझे जिस्म से ही गरज़ रही, मिरा जिस्म तेरी हदों में था मिरी रूह...

मिलन का क्षण

प्यार के दो बसन्ती लम्हें छू गए और सूखा हुआ मन हरा हो गया सीप को बून्द का बून्द को सीप का प्रीत को प्रीत का आसरा हो गया पर्वतों से निकल कर लगी दौड़ने धूप में बर्फ बन कर गली इक नदी पत्थरों से लड़ी, जंगलों से घिरी अनबने रास्तों पर चली इक नदी जब नदी ने समन्दर छुआ झूम कर वो...

संबंधों की परिभाषा

जग सीमित करना चाहे, सम्बन्धों को परिभाषा में कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में क्या बतलाऊँ मीरा संग मुरारी का क्या नाता है शबरी के आंगन से अवध बिहारी का क्या नाता है क्यों धरती के तपने पर अम्बर बादल बन झरता है क्यों दीपक का तेल स्वयं बाती केे बदले जरता है...

निस्पृह प्रेम

चाहता हूँ उन्हें ये अलग बात है वो मिलें ना मिलें ये अलग बात है एक अहसास से दिल महकने लगा गुल खिलें ना खिलें ये अलग बात है हम मिलें और मिलते रहें हर जनम ज़िन्दगी भर का नाता बने ना बने मन समर्पण के सद्भाव से पूर्ण हों तन भले ही प्रदाता बने ना बने बात दिल की दिलों तक...

चांद का किरदार

एक पल सूरज छिपा और फिर उजाला हो गया लेकिन इसमें चांद का किरदार काला हो गया साज़िशें सूरज निगलने की रची थीं चांद ने पर वो अपनी साज़िशों का ख़ुद निवाला हो गया ✍️ चिराग़...
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