Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
आजकल मुझसे न पूछो, कब उगा सूरज गगन में
आजकल मैं प्रेम के इक ताल में उतरा हुआ हूँ
बुद्धि का मत है विकलता मौन से होगी नियंत्रित
किन्तु हर इक रोम अब वाचाल हो बैठा अचानक
अब गिरा या तब गिरा का एक कौतुक चल रहा है
मन मुआ मोती भरा इक थाल हो बैठा अचानक
भाग्य है जिसका चुभन स्वीकार कर शृंगार करना
आजकल मैं उस कढ़े रूमाल में उतरा हुआ हूँ
कल्पना शालीनता के छोर से आगे बढ़ी है
प्रेम मन की देहरी को लांघ तन पर छा रहा है
कनखियों से देख कर वो झट पलट लेती निगाहें
इस झिझक को देख मेरा मन प्रफुल्लन पा रहा है
दृष्टि मेरी भाँप कर वो ढाँपती जिससे स्वयं को
मैं अभी उस लाल ऊनी शाॅल में उतरा हुआ हूँ
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Poetry, Unpublished Geet
इक किरण सूर्य की आई हो जैसे धरती के प्रांगण में
वैसे ही आई है बिटिया मेरे मुस्काते जीवन में
उसके आ जाने से मेरी मुस्कानों ने मआनी पाए
उसको गोदी में ले चूमा तो अन्तस् ने उत्सव गाए
शब्दों को ख़ूब निचोड़ लिया फिर भी यह गान अधूरा है
बिटिया के जन्मोत्सव के इस सुख का अनुमान अधूरा है
सारी ख़ुशियों से बढ़कर है उल्लास पिता बन जाने का
मन को बालक कर देता है अहसास पिता बन जाने का
तुलना करना नामुमक़िन है, जग के सब रिश्ते-नातों से
क्या मिलता है जब छूती है मुझको वो कोमल हाथोे से
उसकी किलकारी से बेहतर कोई मधुरिम संगीत नहीं
उसकी सुविधा से आवश्यक दुनिया की कोई रीत नहीं
जब वो अपना छोटा सा सिर सीने पर रखकर सोती है
उस क्षण धरती का राजा होने की अनुभूति होती है
दुनिया का सब ऐश्वर्य व्यर्थ सारा सुख-वैभव झूठा है
अपनी संतति की धड़कन सुनने का आनंद अनूठा है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सपनों के कुछ चित्र खिंचे हैं, अन्तस के कॅनवास पर
यूँ समझो कुछ ओस पड़ी है, सूखी-सूखी घास पर
आँसू से मुस्कान भिगोई, तब जाकर कुछ रंग मिले
सीमाओं के पिंजरे तोड़े, इच्छाओं के पंख हिले
फिर पहरों तक मुग्ध रहे हम, मन के सहज उजास पर
अलकों के पीछे इक दुनिया बसती है उल्लासों की
जिसमें बस बातें होती हैं रासों की मधुमासों की
उसमें जाकर हँस लेता हूँ, जीवन के संत्रास पर
आँख खुली तो दिन आ पहुँचा लेकर कर्ज़ हज़ारों का
मैंने उसको हाल सुनाया सपनों के गलियारों का
तब से ये दिन शर्मिन्दा हैं, रातों के उपहास पर
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Poetry, Unpublished
चौपालों पे कितने ठहाके गूंजा करते थे
आज अधरों पे मुस्कान भी नहीं रही
कभी स्वाभिमान तलवारों से दमकता था
आज तलवार छोड़ो, म्यान भी नहीं रही
पेड़ों से घरों की पहचान थी कभी पर अब
पेड़ भी नहीं हैं पहचान भी नहीं रही
नारियों के हाथ में भी आई न व्यवस्था और
हद ये है पुरुष प्रधान भी नहीं रही
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
आज
डिनर टेबल पर
गोल्डन एप्पल नहीं खाए
माँ ने।
बस कह भर दिया-
“मुझे ना अच्छे लगते सेब-पेब।”
और फिर
हम सब
चट कर गये
सारे सेब
हाथों-हाथ।
…रात में तकिये पर सिर टिकाए
छत पर चमकते रेडियम के सितारों में
अचानक उभरकर याद आई
माँ की बात-
“सुन रे!
सेब लिअइयो
भोत दिन हो गए सेब खाये!“
सम्पन्नता या विपन्नता से
कोई फ़र्क नहीं पड़ता
उसकी आदत पर
दूसरों को खिलाकर ही
ख़ुश होती है माँ।
✍️ चिराग़ जैन