Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
फेसबुक को अपने अस्तित्व का मापदंड माननेवाले लोगों का रक्तचाप मापने के लिए प्रति पोस्ट लाइक को प्रति पोस्ट शेयर से गुणा किया जाना चाहिए। इस डिजिटल संचार माध्यम ने एक ऐसी भ्रामक सृष्टि की सर्जना कर दी है कि किसी की चार दिन की निष्क्रियता उसके डिजिटल परिवार को ‘चिंतित महसूस कर रहा है’ वाली स्माइली चिपकाने पर विवश कर देती है।
इस गंभीर स्थिति में आधार कार्ड को फेसबुक से लिंक करने की बातें हो रही हैं। यह फ़रमान फेसबुकियों के लिए ऐसा वरदान सिद्ध हुआ कि मानो नास्तिकों की बस्ती में बने मंदिर के पुजारी को भगवान की माला के फूल मिल गए हों। सरकार की इस गंभीरता को देखते हुए फेसबुकजीवियों ने लॉगिन करते हुए और अधिक गंभीर होने का निर्णय किया है।
जो लोग अपनी पोस्ट पर टिप्पणियों की संख्या बढ़ाने के लिए इनबॉक्स तक दौड़-भाग करते थे, वे अब पोस्ट करने के उपरान्त 5000 लोगों को फोन मिलाने की सोचने लगे हैं। किसी के नकारात्मक कमेंट पढ़कर जिनकी भृकुटियाँ तन जाती थीं वे अब सिर पर ठंडे पानी की पट्टी रखकर एकाउंट लॉगिन करने लगे हैं।
फेसबुक पर कुकुरमुत्तों की तरह उग आए स्वयंभू साहित्यकारों में भी खासी हलचल है। मैं ऐसे कई कवियों को जानता हूँ जो ‘आत्मनिर्भरता ही सफलता की कुंजी है’ की सूक्ति को आत्मसात करते हुए पचास-साठ नक़ली फेसबुक खातों की बुनियाद पर अपनी प्रशंसाओं का विशाल भवन खड़ा कर रहे थे। एक पोस्ट करने के बाद बाक़ायदा पचास लॉगिन-लॉगआउट करना, फिर उन पचास खातों की आपसी लड़ाई करवाना और उस लड़ाई को सुलझाना… इतनी मेहनत-मशक्कत से अपने दम पर ज़िंदा ये मसिजीवी आधार लिंक करने के इस तुग़लकी फरमान से अचानक बेरोज़गार हो गए हैं।
नक़ली मुद्रा के बंद होने पर जो लोग सरकार की प्रशंसा में जुट गए थे, वे ही नक़ली खाते बन्द होने पर सरकार को कोस रहे हैं। महिला कोटे में बने खातों से लड़कियों से चुहलबाज़ चैटिंग करनेवाले संस्कारी युवा आधार लिंक करने के इस बेग़ैरत फैसले से सदमे में हैं।
सभ्यता का आधार कार्ड दिखाकर संस्कृति की दुहाई देनेवाले लोग मौब में तब्दील होते ही अशिष्ट हो जाते हैं। यदि पहचाने जाने का संकट न हो तो हम वे सब हरक़तें करेंगे जिनका हम आधार लिंक वाले खाते से विरोध करते हैं। सामाजिक नियमों की भौंडी सभ्यता की चुनरी कुण्ठाओं की सूरत पर एक आवरण डाल देती है।
फेसबुक के फेक एकाउंट्स बंद करवाने से पूर्व समाज को उन खातों से संचालित गतिविधियों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करना चाहिए। इन खातों में समाज का वह चेहरा उजागर होगा, जिसे सामने लाने के मार्ग में नियमों और नैतिकता के छद्म पहाड़ों का अवरोध सदैव दिखाई दिया है। इन नक़ली खातों के डिजिटल अखाड़े की अध्यक्षता में नियमों की पुनर्स्थापना की जानी चाहिए ताकि वर्जनाओं के टैबू से त्रस्त समाज राहत की साँस ले सके।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
ताननेवाले जमाने भर की तोपें तान लें
हौसला बारूद से डरता नहीं, ये जान लें
छोड़िये साहिब, खुशी से कौन मरता है भला
दर्द ही हद से गुजर जाए तो फिर भी मान लें
जो कभी हमको कहा करते थे अपनी जिंदगी
खुदकशी के मूड में हों तो हमारी जान लें
देख लीजे कुछ हमारे पास बचने पाए ना
ख्वाब लें, उम्मीद लें, अल्फाज लें, अरमान लें
इस भरे बाजार में हम भी बहुत बेचैन हैं
वे पुराना लूट लें तो हम नया समान लें
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
संस्कार अवरोही हो चुके हैं। मेरे पिता का संहनन मुझमें नहीं है। और मैं इस बात के लिए भी आश्वस्त हूँ कि मेरी संतति मेरे जीवन सिद्धान्तों को पुराना कहकर नकार देगी। पीढ़ियों का यह अनवरत संघर्ष हमें बैलगाड़ियों से अंतरिक्ष यान तक भी लाया है और नाड़ी विज्ञान से पैथोलॉजी लैब तक भी।
संस्कार की पाठशालाएँ बोलती हैं, कि चूल्हे की रोटी में जो स्वाद था वो फाइव स्टार के कैंडल लाइट डिनर में नहीं है लेकिन विकास की ऊँची मचान पर बने एयर कंडिशनड इंस्टिट्यूट्स बोलते हैं कि जब रेडीमेड से काम चल सकता है तो सिलाई मशीन में माँ की आँखें फुड़वाने का क्या तुक है।
यह सवाल ऐसा ही है जैसे बुद्धि और हृदय किसी विषय पर द्विपक्षीय वार्ता कर रहे हों। दिल के तर्क परंपरागत व्यवस्थाओं की तरफ़दारी करते हैं और दिमाग़ पैसे से सारे सुख खरीदने का पक्षधर रहता है। बुखार में माँ की गीली पट्टी मेडिकली शायद शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता न बढ़ाती हो, लेकिन उस स्पर्श से दिल को जो आत्मबल मिलता है, उससे क्रोसिन से थोडा फ़ास्ट ही असर होता है।
सामाजिक दिखावे के चलते हमने अपनी पीढ़ियों को कॉन्वेंट कल्चर में तो ला पटका लेकिन इस बात पर चिंतन न कर सके कि जब नई गाड़ी पर रोली से स्वस्तिक बनाने की बात पर ये पीढ़ी नाक-भौं चढ़ाएगी तो हम अपने उस बचपन को क्या उत्तर देंगे जिसकी हर सुबह पर एक डिठौना जड़ा हुआ है। अपने बच्चों को अच्छी नौकरी दिलाने की चाह में हमने इस बात को बिसार दिया कि इनको मालिक भी बनाया जा सकता है।
हमने अपने हाथ से अपनी संस्कृति की जड़ों में मट्ठा डाला है। इसलिए जर्जर होते इस वटवृक्ष को देखकर दुःखी होने का हमें कोई अधिकार नहीं। सौ साल की सोच रखकर नीम बोनेवाले पुरखों को उनकी पीढ़ियों से साल भर में दम तोड़नेवाली गुलदावरी का उपहार मिल रहा है। करौंदे भी धड़ी के हिसाब से ख़रीदनेवालों के वंशज जब पाव भर सीताफल तुलवाते हैं तो तराजू का पलड़ा ठहाका मारकर हँसता है और चिढ़ाते हुए कहता है कि अहले जहाँ हमारा सदियों दुश्मन रहा तो हमारी हस्ती बच गई लेकिन इस बार हमने ख़ुद ठानी है इस हस्ती से दुश्मनी।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
जब से कंधों पर कुछ भार पड़ा, तब से
हाथ बंधे हैं और ज़जीरें ग़ायब हैं
जिसने सख़्त ज़मीं पर चलकर देख लिया
उसकी बातों से तहरीरें ग़ायब हैं
जाने कैसे तुमने हाथ मिलाया है
हाथों की कुछ ख़ास लकीरें ग़ायब हैं
बस आईने लटके हैं दीवारों पर
और आईनों से तस्वीरें ग़ायब हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
यूँ तो हम युग के शिलालेखों पे अंकित हो गए
जो जिए हमने वो सारे दिन अलंकृत हो गए
किन्तु जब युग की टहनियों पर नई कोंपल उगी
तो हरे पत्ते हवाओं से सशंकित हो गए
जब हमारी श्वास में सरगम सजी आनन्द था
हम उठे, जग ने गई रस्में तजीं आनन्द था
जब हमारी गुनगुनाहट राग बनकर पुज गई
थपकियों से बन गई तालें, अजी आनन्द था
किन्तु जब युग में नई बन्सी बजी तो क्या हुआ
क्यों हमारे पीर वाले तार झंकृत हो गए
कुल मिलाकर ज़िन्दगी है चार पहरों की तरह
हर किसी का वक़्त चढ़ता है दुपहरों की तरह
सांझ को दुल्हन सी सजती है सभी की ज़िन्दगी
और फिर सूरज ढलक जाता है चेहरों की तरह
ब्रह्म की संज्ञा भी दे सकते थे अंतिम प्रहर को
क्यों सवेरों का निरादर कर कलंकित हो गए
✍️ चिराग़ जैन