Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
क्या करना है कारोबार
कल और इलेक्सन होंगे
कल और इलेक्सन होंगे, घनघोर इलेक्सन होंगे
हर ओर इलेक्शन होंगे, पुरजोर इलेक्शन होंगे
सब कुछ मुफ्त मिलेगा यार
कल और इलेक्सन होंगे
एमपी वाले चावल देंगे, दिल्ली वाई-फाई
पटना जाकर फोकट में ले लेंगे यार दवाई
मेहनत के मुँह पर पोतेंगे, उंगली की सब स्याही
जब उंगली से काम चले तो काहे देह हिलाई
महंगा वोटों का बाजार
कल और इलेक्सन होंगे
हर नेता में होड़ लगी है, ख़ूब लुटाओ पैसा
राजनीति में सब जायज़ है, इसमें खटका कैसा
भैंस उसी की, जिसने अपने खूंटे बांधा भैंसा
उसने ऐसी-तैसी की थी, हमने ऐसा-तैसा
जी भर जीमो बिना डकार
कल और इलेक्सन होंगे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
ये तुमने कौन से अंदाज़ से छुआ साहिब
हुई है बेअसर हर शख़्स की दुआ साहिब
सियार करते थे शब भर हुआ-हुआ साहिब
उन्हें भगाने चला आया तेंदुआ साहिब
हमारे चैन की हुंडी का हो गया सौदा
ज़रा बताओ, मुनाफ़ा किसे हुआ साहिब
ज़ुबां तो काट दी, रोटी न छीनना हमसे
सुना है पेट भी देता है बद्दुआ साहिब
ज़रा-ज़रा सा कब तलक करोगे क़त्ल हमें
दबा ही क्यों नहीं देते हो टेंटुआ साहिब
कई करोड़ निवाले हैं दाँव पर इसमें
तुम्हारे वास्ते जो है महज़ जुआ साहिब
सही बताओ, तुम्हें कुछ समझ नहीं आता?
बहाते रहते हैं क्यों लोग टेसुआ साहिब
तुमसे पहले की मसीहाई चुआती थी छतें
ये तुमने क्या किया, आँखों से कुछ चुआ साहिब
जोंक जब जिस्म से चिपकी तो ये समझ आया
इससे अच्छा था गये साल केंचुआ साहिब
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
सियासत किस तरह करती रही बर्ताव, मत भूलो
कुरेदेंगे तुम्हारे ही बदन के घाव, मत भूलो
तुम्हारी चीख़ से कुर्सी न हिल जाये मसीहा की
अरे ओ हाथरस वालो, अभी उन्नाव मत भूलो
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
कहाँ तक झूठ का पर्दा करोगे
कभी तो झील में चेहरा करोगे
बिछाकर जाल दाना डालता है
तो क्या सय्याद का सजदा करोगे?
कराहों को दबाया जा रहा है
कहीं चीखें उठीं तो क्या करोगे
सुना है भूख शर्मिंदा हुई है
हवस को कब तलक पूरा करोगे
अगर ज़िल्लत की आदत पड़ गई तो
फिर ऐसी ज़िन्दगी का क्या करोगे
उजालों को मिटा कर देख लेना
अंधेरे में तुम्हीं रोया करोगे
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
सोशल मीडिया पर एक पार्टी विशेष के नेताजी पर कोई टिप्पणी की जाए अथवा कोई प्रश्न पूछा जाए तो यकायक कमेंट बॉक्स गालियों से भरने लगता है। इन गालीबाज़ों की प्रोफाइल देखें तो अधिकतर ने अपनी प्रोफाइल पर किसी धर्मविशेष अथवा दलविशेष के समर्थन की घोषणा कर रखी होती है।
इस घोषणा के तमगे से सजी प्रोफ़ाइलधारी जब अश्लील, भद्दी और असंसदीय भाषा का प्रयोग करते हैं, तो उससे उस धर्म अथवा दल की छवि पर क्या प्रभाव पड़ेगा -इस विषय पर कोई इसलिए नहीं बोलना चाहता क्योंकि राजनीति को यह बात समझ आ गई है कि इस देश से लोकतंत्र का दौर समाप्त होने जा रहा है और ‘बाहुबल’ के आधार पर वह तानाशाही व्याप्त हो रही ह,ै जिसे सभ्य भाषा में गुंडागर्दी कहा जाता है। और गुंडागर्दी के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करनेवाले सभ्य नागरिकों की नहीं, बल्कि अराजक, असभ्य और बर्बर मवालियों की आवश्यकता होती है।
मुम्बई में व्यंग्य-चित्र फॉरवर्ड करने पर एक दल विशेष के कार्यकर्ताओं द्वारा एक वरिष्ठ नागरिक की पिटाई की घटना उसी विषबेल का पहला फल है जो पूरे देश में एक राष्ट्रीय पार्टी ने अब तक बोई है। भीड़ की आड़ में निजी दुश्मनी निकालने की परंपरा, मॉब लिंचिंग की गलियों से गुज़रते हुए अब सरेआम गुंडागर्दी की शक्ल ले चुकी है।
कंगना रनौत के मुद्दे पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार की राजनैतिक तनातनी का विकृततम रूप यह है कि एक राजनैतिक दल अपने मुखपत्र में साफ़-साफ़ लिखता है कि कंगना रनौत ने पानी में रहकर मगरमच्छ से वैर किया है।
उफ़्फ़! क्या यही लोकतंत्र की भाषा है। समाचार पत्र के माध्यम से सरेआम धमकी देने के लिए क्या कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी। हम रिया, कंगना, सुशांत के कंधे पर रखी राजनैतिक बंदूकों के डिजाइन पर मुग्ध होकर यह क्यों नहीं देख पा रहे हैं कि सिस्टम की विफलताओं का लाभ उठाकर इन राजनैतिक बंदूकों से लोकतंत्र की हत्या की जा रही है।
भाजपा, शिवसेना, कांग्रेस, टीएमसी, जद …ये सब वेदियाँ तभी तक पूज्य हैं जब तक लोकतंत्र का मंदिर सलामत रह सकेगा। हम किसी भी राजनैतिक विचारधारा से प्रभावित हों, लेकिन लोकतंत्र की जड़ों में मट्ठा डालनेवालों का विरोध करते समय उस विचारधारा के परिचय पत्र का बचाव नहीं करना चाहिए।
भारत की मूल प्रवृत्ति लोकतंत्रात्मक है। यदि लोकतंत्र ध्वस्त हुआ तो कुछ न बच सकेगा। सत्ता का विरोध करनेवालों पर अचानक भिन्न-भिन्न धाराएँ लगने लगती हैं। क्यों भई! इस देश के सिस्टम को शर्म से मर नहीं जाना चाहिए कि मुंबई जैसे शहर में कंगना रनौत जैसी प्रसिद्ध हस्ती ने ग़ैरकानूनी निर्माण कर रखा था और उस पर एक्शन तब हुआ जब उसने सत्ता का विरोध किया। क्या हमारी एजेंसियों को अपने नाकारापन पर शर्म नहीं आनी चाहिए कि मुंबई फ़िल्म उद्योग से जुड़े लोग ड्रग्स का सेवन करते हैं और उसकी खुशबू तक एजेंसियों को तब तक नहीं आती जब तक रिया चक्रवर्ती को गिरफ़्तार करने के बाकी सब रास्ते बंद नहीं हो गए।
शर्मनाक स्थिति तक आ चुका है हमारा सिस्टम और वधस्थल में लाकर बांध दिया गया है हमारा लोकतंत्र। अपनी-अपनी राजनैतिक निष्ठाएँ त्यागकर यदि लोकतंत्र के पक्ष में चेतना नहीं आई तो हमारे महान देश के भविष्य पर गहरा अंधकार पसर जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन