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ओस पड़ी है

सपनों के कुछ चित्र खिंचे हैं, अन्तस के कॅनवास पर यूँ समझो कुछ ओस पड़ी है, सूखी-सूखी घास पर आँसू से मुस्कान भिगोई, तब जाकर कुछ रंग मिले सीमाओं के पिंजरे तोड़े, इच्छाओं के पंख हिले फिर पहरों तक मुग्ध रहे हम, मन के सहज उजास पर अलकों के पीछे इक दुनिया बसती है उल्लासों की...

नींव की कमज़ोरी

साफ़-साफ़ दिख रही है नींव की कमज़ोरी दीवार की लीपापोती छुपा नहीं पा रही है भीतर की दरारें। एक भय-सा झाँक रहा है झरोखों से! अंधेरा ही अंधेरा छा गया है रौशनदान के आरपार सब समझ आ रहा है कि क्यों लटक गया है कंगूरों का चेहरा! ✍️ चिराग़...
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