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निस्पृह

तुम हर बार तलाश लेती हो कोई नई वजह नकारने की। …और मैं हर बार बिना वजह स्वीकार लेता हूँ मन ही मन। हर बार बदल जाता है तुम्हारा बहाना …और मैं हर बार बिना वजह कर बैठता हूँ गुज़ारिश। मैं हर बार रहता हूँ वैसा का वैसा क्योंकि मैंने कभी तलाशी ही नहीं कोई वजह...

तनाव की आदत

भली कहाँ है भला ये तनाव की आदत ज़रा-सी बात से आँखों में ताव की आदत हरेक राह से मंज़िल तलक़ पहुँचता है नहीं चुनाव पे निर्भर बहाव की आदत माँ ने चीज़ें भी सहेजी सदा रिश्तों की तरह हमने अपनाई नहीं रखरखाव की आदत कभी ये देश धड़ी में हिसाब करता था सभी को पड़ गई है आज पाव की आदत...

ज़िन्दगी की शिक़ायत

उम्र भर मौत से भागते जो रहे मौत आई तो बस मौत के हो गए मेरे हर रोम में अपना अहसास भर एक पल में पिया सौत के हो गए एक ही पल में ये क्या से क्या हो गया एक पल ज़िन्दगी से बड़ा हो गया मौत को देखकर तुम पिघल से गए और रुख़ ज़िन्दगी पर कड़ा हो गया मौत ने छल किया? अपहरण कर लिया? या...

भावार्थ

इन दिनों संदर्भ निंदा कर रहे हैं विषय की भावार्थ से- शब्द लट्टू हो गए भाषा पे या फिर व्याकरण पे बोलियों के गेसुओं में फँस गया है मर्म कुछ अलंकारों में सीमित हो गया कवि-कर्म जटिल सा लगने लगा है आजकल सरलार्थ आँख मूंदे, मुस्कुराता मौन है भावार्थ ✍️ चिराग़...

वक़्त बीमार है

वक़्त बीमार है Short term memory loss का पुराना मरीज़। कुछ याद ही नहीं रह पाता इसको लिख-लिख कर मुश्क़िल से याद रख पाता है बड़ी से बड़ी बात मैंने अक्सर देखा है वक़्त को अपनी ही लिखी पर्चियों के बीच उलझे हुए इतिहास की किताबों में किसी क़िरदार की सबसे सही पहचान तलाशते हुए सुना...
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