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नई कविता

अजीब सी पशोपेश में रहता हूँ आजकल तुम और कविता दोनों ही मांगती हैं वक़्त! मैं घण्टों बतियाता हूँ तुमसे और भीतर ही भीतर घुटती रहती है कविता। आज अचानक पूछ लिया तुमने- “क्या बात है बहुत दिनों से कोई नई कविता नहीं सुनाई?” मैंने कहा- “कल सुनाऊंगा। आज ही...

अलसाए झरोखों से

पल-पल भारी होती पलकों के अलसाए झरोखों से पढ़ ही लेता हूँ देर रात मोबाइल स्क्रीन पर आया तुम्हारा नाम! करवट बदलकर निंदियारी आँखें पहुँच ही जाती हैं उंगलियों के सहारे इनबाॅक्स तक! …देर तक पढ़ता हूँ मैसेज में लिखे दो छोटे-छोटे शब्द। भुजपाश में जकड़े तकिए पर ठुड्डी...

फ़र्क

इतना-सा फ़र्क है अंधियार और उजियारे में… …कि अंधियारा हाथों में उठाकर किसी को भेंट नहीं किया जा सकता! …कि अंधियार को हाथों में समेटने के लिए मुट्ठी बंद करनी होती है और उजियारा अंजुरी बना देता है हथेलियों को! …कि अंधियारा सीमित करता है और उजियारा...

पटनीटाॅप : मुहब्बत के नशे में लिखी गई कविता

जम्मू आये हुए मुझे छह महीने बीत गये हैं, गर्मी की जनता एक्सप्रेस जा चुकी है और सर्दी की राजधानी एक्सप्रेस आउटर सिग्नल पर खड़ी है। इस खूबसूरत मौसम में अचानक पटनीटॉप जाने का कार्यक्रम बन गया। दोपहर करीब तीन बजे जम्मू से रवाना हुआ। जम्मू शहर पार करते ही वादियों ने सिर...

थैंक्स गाॅड

बीत गए वो दिन जब मैं बहाने ढूंढ़ता था तुमसे मिलने के। अब तो साफ़-साफ़ कह देता हूँ- “मिलना है तुमसे।” थैंक्स गाॅड अब पूछती नहीं हो तुम कि क्या काम है वरना झूठ बोलना पड़ता था कुछ भी अल्लम-गल्लम- “वो ज़रा डिस्कस करना था कल की मीटिंग के बारे में ।” ✍️...
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