आपको अगर क्रिकेट का पूरा मज़ा लेना है तो स्टेडियम में जाने की बजाय किसी लोकल टाइप की क्रिकेट अकादमी में जाकर टीवी पर क्रिकेट का मैच देखिए। इसमें भी सावधानी यह कि आपको मैच नहीं देखना है, आपको तो मैच देख रहे लड़कों और उन लड़कों के गुरुजी को देखना है।
इस सिचुएशन में एक खेल तो स्टेडियम में चल रहा होता है, जिसका प्रसारण टीवी पर किया जाता है। और एक खेल लोकल क्रिकेट अकादमी के लोकल गुरुजी के मन में चल रहा होता है, जिसका प्रसारण उनकी भाव भंगिमाओं और हरकतों में हो रहा होता है। मुहल्ले के लड़कों को इकट्ठा करके ख़ुद को रवि शास्त्री समझनेवाले गुरुजी को क्रिकेट मैच देखते हुए देखना, मैच से अधिक मनोरंजक होता है।
वे टीवी के सामने ठीक इस मुद्रा में बैठते हैं जैसे भारत की टीम इलेवन का कोच पवेलियन में बैठकर अपने लड़कों की परफॉर्मेंस देख रहा हो। जब तक मैंच चलता है ये श्रीमान क्रिकेटगुरु टीवी स्क्रीन से साढ़े तीन फीट दूर अपनी कुर्सी पर स्थापित हो जाते हैं। इनकी तशरीफ़ सीडान कार की डिक्की की तरह थोड़ी पीछे की ओर निकल आती है। पीठ, टांगों से लगभग पचहत्तर डिग्री का एंगल बनाते हुए आगे को झुकती है लेकिन रीढ़ की हड्डी बिल्कुल सीधी रहती है। पीठ के ऊपरी छोर के बाद गर्दन कुछ ऐसे आगे को निकल आती है जैसे कोई राहु अपने केतु से अलग होकर हवा में लटक रहा हो। होंठ गोलाकार होकर कुछ चूसने की मुद्रा में यथासंभव आगे बढ़ जाते हैं और आंखें चुम्बक की तरह टीवी स्क्रीन पर चिपक जाती हैं। दोनों कुहनियां उनके भारी कंधों का बोझ उठाए हुए घुटनों पर दबाव बनाती हैं और उंगलियां पूरी टीम की चिंता में आपस में उलझती रहती हैं।
किसी भारतीय खिलाड़ी से कैच छूट जाए तो इस लोकल रवि शस्त्री की नाक सिकुडती है और सहसा उसके मुंह से ‘आइला’ या ‘शिट’ टाइप का कोई शब्द निकल पड़ता है। फिर वह अपने छोकरों की ओर देखकर सांत्वना देते हुए ‘कोई बात नहीं, कोई बात नहीं’ की ध्वनि के साथ अपने मैच्योर होने का प्रदर्शन करता है।
अच्छा शॉट लगने पर जब वह गर्वानुभूति के साथ आंखें मिचमिचा कर प्रसन्न होता हुआ ‘वेलडन वीरू वेलडन’ बोलता है, तो ऐसा लगता है कि किसी पट्ठे का दांव देखकर उस्ताद पहलवान की आत्मा मडोना बन गई हो।
भारतीय बल्लेबाज किसी बॉल पर बीट हो जाए तो लोकल रवि शास्त्री के चेहरे पर गहरी चिंता और भय का मिश्रित प्रभाव प्रकट होता है और वह जैसे-तैसे अपने होश संभालकर बोल पाता है, ‘क्या कर रहा है सचिन यार, थोड़ा संभलकर!’
पूरे खेल के दौरान इन गुरुजी का ब्लड प्रेशर ‘रनिंग बिटीवन द विकेट्स’ करता ही रहता है। ‘यॉर्कर डाल यार’, ‘स्ट्राइक दे’, ‘प्रेशर मत ले’, ‘आराम से’ और ‘गुड शॉट’ कहते हुए गुरुजी लगातार मैच में बने रहते हैं।
शुक्र है विज्ञान का, कि टीवी के सामने बैठकर बोलनेवालों की आवाज़ स्टेडियम में खेल रहे खिलाड़ियों के कानों तक नहीं पहुंच पाती। वरना वैभव सूर्यवंशी तय नहीं कर पाते कि उन्हें पहले बॉल को पीटना है या क्रिकेटप्रेमियों को।
एक कमेंट्री टीवी पर चल रही होती है और एक-एक कमेंट्री हर लोकल रवि शास्त्री कर रहा होता है।
पूरी दुनिया में किसी भी खेल के प्रशंसक होते हैं लेकिन हमारे देश में क्रिकेट के दीवाने होते हैं। हमारे यहां क्रिकेटर्स को खिलाड़ी नहीं, डायरेक्ट भगवान मानने की परंपरा है। ये और बात है कि जब वही क्रिकेटिया भगवान आउट ऑफ फॉर्म हो जाता है, तो हम उस भगवान के घर-वर तोड़ने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते। हमारे यहां क्रिकेटरों के लिए यह कहावत बहुत सूट करती है कि ‘एक गेंद पर निखरे इज्जत, एक गेंद पर होवे हुज्जत।’
इन दिनों वैभव सूर्यवंशी का प्रदर्शन देखकर सोशल मीडिया पर किसी ने उसे भविष्य का विश्वविजेता बताया तो किसी ने उसे अगला प्रधानमंत्री तक घोषित कर दिया। एक ज्योतिषी बता रहे थे कि इसकी राशि पर आज बृहस्पति गोचर कर रहे हैं, इसे अच्छा खेलना ही था। मैंने माथा पीट लिया, पूरा देश वैभव को बधाई दे रहा है, जबकि असली मेहनत पृथ्वी से करोड़ों किलोमीटर दूर बैठा बृहस्पति कर रहा था।
हम भारतीय भावनाओं में जीते हैं। खेल का मैदान हो या असल जीवन, जब तक तथ्य और सत्य बेचारे पैदल चलते-चलते हांफते हुए सबके सामने पहुंचते हैं, उससे काफी पहले भावनाएं दौड़कर मंच पर पहुंच जाती हैं और तांडव मचा चुकी होती हैं।
✍️ चिराग़ जैन
