+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

जिन ध्वनियों में सबसे पहले मैंने अपनों को पहचाना
गड्ड-मड्ड होकर जो सबसे पहले कानों से टकराईं
जिनमें लाड लड़ाकर माँ ने मुझे कलेजे से चिपकाया
जिनमें बुआ बलैया लेकर अस्पताल में भी इतराई
जिन ध्वनियों की हर स्वर-लहरी में अवलम्बन आशा का है
उन ध्वनियों का इक-इक अक्षर केवल हिन्दी भाषा का है

जिस भाषा के स्वर, बचपन में मेरे बहुत घनिष्ठ हो गए
जिस भाषा के व्यंजन, तुतली बोली में स्वादिष्ट हो गए
जब उसको लिखना सीखा तो अ अनार की पूँछ बना दी
ढ का पेट बड़ा कर डाला, क और ल की मूँछ बना दी
इतने पर भी कभी न जिसमें बादल घिरा निराशा का है
इतना बड़ा कलेजा शायद केवल हिन्दी भाषा का है

जब भावों में प्रीत सजी थी, अलकों में इक आस भरी थी
तब धड़कन ने काग़ज़ पर आ देवनागरी देह धरी थी
पीर, हर्ष, उल्लास, हताशा, भय, संदेह, समर्पण, आशा
हर उलझन के लिए शब्द है, कितनी धनी हमारी भाषा
जैसा रिश्ता दीपक-बाती, बादल और पिपासा का है
वैसा रिश्ता अभिव्यक्ति से मेरी हिन्दी भाषा का है

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!