एक ही पल में
उभर आए
कई सारे शिक़वे
ढेर सारे गिले
और फिर
अगले ही पल
मैंने ख़ुद-ब-ख़ुद
लाजवाब कर दिया उन्हें
अपने मन की अदालत में
….ऐसा नहीं था
कि सचमुच बेबुनियाद थीं
मेरी शिकायतें
बल्कि बात दरअसल ये थी
कि अदालत दिल की थी
और
दिल तुम्हारा…!
✍️ चिराग़ जैन
