+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

पुरुषोत्तम: एक मंचन जिसकी पटकथा नहीं लिखी गई

हुई है वही, जो राम रचि राखा मुझे अक्सर ऐसा अनुभव होता है कि मैं एक ऐसी स्क्रिप्ट जी रहा हूँ, जिसमें मेरे लिए एक शानदार पार्ट लिखा गया है। ऐसा लगता है कि जीवन अलग-अलग किस्सों का एक पोथा है, जो अपनी बेहतरीन बुनावट के कारण एक उपन्यास सरीखा जान पड़ता है। आइए, इस पोथी के...

नए घर में

नए फ्लैट की दीवारों पर धीरे-धीरे उभर रहा है हमारा घर माॅड्यूलर किचन के खोपचों से आँख बचाकर एक कोने में पालथी मारकर बैठ गया है सरसों के तेल का पीपा सभी नए कंटेनरों के बीच चुपके से जा छुपी है युगों पुरानी हींग की डिब्बी! बरसों से इकट्ठे हुए शो-पीस चहक कर जा बैठे हैं...

क़हक़हे

बिल्कुल ख़ाली कर दिया है मैंने दिल का भरा-पूरा मकान आँखों की बाल्टी में आँसुओं का पानी भरकर धो डाला है मकान का एक-एक कोना …काफ़ी दिन हुए। लेकिन अब भी गूंजते हैं यादों के क़हक़हे टकराकर ख़ाली मकान की ख़ामोश दीवारों से। और मैं फिर से धोने लगता हूँ दिल के मकान की उदास...
error: Content is protected !!