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याद का गीत

याद ने इक रेशमी-सा जाल फिर फैला लिया है मन ज़रूरी काम सारे छोड़कर है गुम याद फिर से आ रही हो तुम त्यौरियां चिन्ताओं का बोझा सम्भाले फिर रही हैं चेतना बरसों पुराने हर्ष में उलझी हुई है हाथ में तो ढेर सारे काम हैं आधे-अधूरे उंगलियाँ केवल तुम्हारे स्पर्श में उलझी हुई हैं...

समाधान

बहुत समझदार हो तुम! जब कभी उदासी का आँचल ओढ़कर जवान होने लगता है मेरा कोई दर्द तो चुपचाप बिना किसी शोर-शराबे के कंधा देकर …पहुँचा आते हो उसे वहाँ …जहाँ से लौट नहीं पाया कोई आज तक! ✍️ चिराग़...

बचपन नहीं जाता

अगर कुछ शोख़ियों की ओर उसका मन नहीं जाता तो फिर इंसान के मन से कभी बचपन नहीं जाता कोई कितना भी ख़ुद को सख्त दिल कहता रहे लेकिन कभी यादों से पहले प्यार का सावन नहीं जाता भले ही मिट गया दीवार का नामो-निशां भी अब मगर मेरे ज़ेह्न से वो बँटा आंगन नहीं जाता चुभन ही क्यों बहुत...

उस घड़ी

आप संग गुज़रे लम्हे, पीड़ा अजानी हो गये प्यार के रंगीन पल, क़िस्से-कहानी हो गये हर किसी के ख़्वाब जब से आसमानी हो गये पाप के और पुण्य के तब्दील मआनी हो गये एक दीवाने से झोंके ने उन्हें छू भर लिया और उनकी चूनरी के रंग धानी हो गये सर्द था मौसम तो बहती धार भी जम-सी गयी धूप...

व्यस्तता

जब तक तुम संग थीं मैंने नहीं तलाशी कोई ख़ुशी नहीं खोजी कोई मुस्कान नहीं ढूँढ़ी कोई हँसी …ज़रूरत ही नहीं पड़ी। अब तलाशता फिरता हूँ एक-मासूम सी ख़ुशी अपने दिल के लिये। एक कोमल-सी मुस्कान अपने होंठों के लिये। एक गीली-सी हँसी अपने चेहरे के लिये। और एक पावन-सी चमक अपनी...
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