सभी का मन सशंकित हो रहा था बहुत दिन से कहीं कुछ खो रहा था जुड़े सब हाथ ढीले पड़ गए थे पनीले नेत्र पीले पड़ गए थे तपस्या चरम तक आने लगी थी ये भौतिक चर्म कुम्हलाने लगी थी व्रतों पर नूर इतना चढ़ गया था कि तन का रंग फीका पड़ गया था हुई जर्जर तपस्यायुक्त काया तो यम...
आर्टिस्ट ग्रीन रूम में तैयार था मगर इस ज़िन्दगी ने मंच का परदा गिरा दिया जिजीविषा की लम्बी लड़ाई लड़ने के बाद ठहाके का हिचकी में तब्दील होना यकायक पलकें नम कर गया। ऐसा लगा ज्यों किसी ने अचानक हमारे बिल्कुल आसपास की रौनक को वीराने में बदल दिया हो। मृत्यु को बहुत नज़दीक से...
नोबेल पुरस्कार विजेता रूसी लेखक एलेक्जेंडर सोल्ज़ेनित्सिन का एक उपन्यास है- ‘द कैंसर वार्ड’। इस उपन्यास में एक स्थान पर कैंसर वार्ड में भर्ती एक रोगी की पीड़ा को देखकर, उसका मन बहलाने के लिए नर्स एक गाना गाती है। गीत के बोल थे- ‘आवारा हूँ, आवारा हूँ, या गर्दिश में हूँ...
लता जी का जाना, किसी सरस्वती के साकार से निराकार हो जाने जैसा अनुभव है। बहुत लम्बी तपस्या के बाद वरदान देने को प्रकट हुई किसी देवी के अंतर्धान हो जाने पर तपस्वी को जो अनुभूति होती होगी, ठीक उसी अनुभूति से आज भारत का एक-एक बाशिंदा गुज़र रहा है। भारतभूमि के सहस्रों पुण्य...