Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जिसको सुख का उत्सव समझा,
वो दुख का आयोजन निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे,
उसका नाम विभीषण निकला
जीवन भर विश्रांत रहा जो, हमने उसको शांतनु माना
जिसने हर अनुशासन तोड़ा, उसका नाम सुशासन जाना
जिसका जीवन लाचारी था, उसका परिचय भीष्म बताया
अपशकुनों का मूल रहा जो, वह जग में शकुनी कहलाया
कृष्ण कहा जिसको दुनिया ने, वह जग का आभूषण निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे, उसका नाम विभीषण निकला
नाम श्रवण था जिसका, उसने आहट नहीं सुनी दशरथ की
एक मंथरा क्षण भर में ही इति बन गई हर सुख के अथ की
मानी को समझाने अंगद बनकर बुद्धि स्वयं आई थी
कुम्भकर्ण तक जाग गया पर रावण पर तंद्रा छाई थी
मुख दिखलाने योग्य नहीं जो, वह कुल्हन्त दशानन निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे, उसका नाम विभीषण निकला
जिस वेला में राजतिलक होता उसमें वनवास हुआ है
उत्सव की चौसर पर कुल की लज्जा का उपहास हुआ है
कंचन मृग लाने निकले थे, घर की मृगनयनी खो बैठे
खाण्डव वन को स्वर्ग किया था, ख़ुद ही वनवासी हो बैठे
जिस अवसर पर मेल लिखा था, उसका अंत विभाजन निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे, उसका नाम विभीषण निकला
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
महाभारत में मित्रता के दो उदाहरण हैं। एक, कर्ण-दुर्योधन, दूसरा अर्जुन-कृष्ण। कर्ण दुर्योधन के प्रति इतना निष्ठावान है कि दुर्योधन के दुराचार पर भी उसका प्रतिकार नहीं कर पाता। और कृष्ण, अर्जुन के इतने हितैषी हैं कि स्वयं अर्जुन के ही निर्णय का विरोध करने में भी नहीं हिचकते। कर्ण का उद्देश्य दुर्योधन की गुड बुक में बने रहना है, जबकि कृष्ण का उद्देश्य अर्जुन का फ्यूचर सुरक्षित करना है। कर्ण ने अपनी महत्ता सिद्ध करने के लिए मित्र को सीढ़ी बनाया, जबकि कृष्ण ने मित्र के हित में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा तोड़ने से भी परहेज नहीं किया। कर्ण की मित्रता दुर्योधन को समूल नष्ट कर गई और कृष्ण की मित्रता अर्जुन को युगपुरुष बना गई। अगर अर्जुन का मित्र कोई कर्ण होता और दुर्योधन के पास कोई कृष्ण होता तो महाभारत के युद्ध का परिणाम पलट गया होता
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
एक गर्भिणी हथिनी, तीन दिन तक अपने भीतर पल-पल बढ़ती टीस का कारण समझने की कोशिश में तड़प-तड़पकर मर गई। अपने जर्जर मुँह पर मनुष्य के बर्बर चेहरे के हस्ताक्षर लिए वह माँ अपने बच्चे को साथ लेकर दूर चली गई।
‘मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया, तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया’ की हिक़ारत के साथ उसके जलसमाधि ले ली। अपनी धर्मपरायणता का ढोंग करते मनुष्य ने कब अपने दिल में पत्थर विराजित कर लिए, पता ही न चला। स्वयं को गॉड फीयरिंग कहनेवाले आदमी के इस दुःसाहस को देखकर गॉड भी (अगर कहीं हो तो) काँप गया होगा।
हथिनी तो गणपति भाव से मनुष्य के भीतर उग आए पशु की कथा लिखकर चली गई, लेकिन उसकी मौन कराह मनुजता के ध्वंस का एक ऐसा अध्याय प्रारम्भ कर गई है, जिसका हर पलटता पृष्ठ मनुष्यता से हीन मनुष्य जाति के पटाक्षेप की वक़ालत करता रहेगा।
समुद्र से उठते भीषण चक्रवात, हवा में घुलता जा रहा विष, मर्यादा की लक्ष्मण रेखा लांघती सूनामी, रह-रहकर काँप उठती धरती, आग बरसाता आसमान, रिहायशी इलाक़ों में घुस आए तेंदुए, खेतों पर टूट पड़ते टिड्डीदल, खड़ी फसल पर गिरते ओले, हज़ारों की संख्या में बिछी चमगादड़ों की लाशें, जगह-जगह हो रहे गृहयुद्ध, चरमराती व्यवस्था में पनपती अराजकता और वर्चस्व की होड़ में अनदेखा होता अस्तित्व; चीख़-चीख़ कर मनुष्य को अल्पविराम का इंगित कर रहा है।
एक पल, ठहरकर संवेदनाओं को पोषित करने की सलाह दे रहा है। एक क्षण, बैठकर पैरों को विश्राम देने की दुहाई दे रहा है ताकि मस्तिष्क तक रक्त का संचरण हो सके और मस्तिष्क अपनी दिशा-दशा पर विचार करने में सक्षम हो पाए। एक लम्हा, रुककर धौंकनी बन चुके फेफड़ों में प्राणवायु भर लेने की सिफ़ारिश कर रहा है।
उस मूक संवेदना की इस दर्दनाक़ मौत को भी इस अल्पविराम का निमित्त नहीं बनाया गया तो पूर्णविराम लगाना प्रकृति की विवशता होगी।
✍️ चिराग़ जैन
Ref : Kerala Elephant Murder Case
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
नींव भी पुष्ट हो
कुछ कंगूरे भी हों
एक साँकल भी हो
चौक पूरे भी हों
इन सभी से सजी ये इमारत रहे
एक भारत रहे, श्रेष्ठ भारत रहे
थार की रेत पश्चिम में बिखरी रहे
और पूरब निरंतर बरसता रहे
हिमशिखर भी युगों तक अडिग रह सकें
और सागर हमेशा लरजता रहे
हो मिठासों से इफ़्तार रमज़ान में
और फागुन में थोड़ी शरारत रहे
एक भारत रहे, श्रेष्ठ भारत रहे
सोच का रंग धानी हमेशा रहे
और आँखों में पानी हमेशा रहे
चाह में सावधानी हमेशा रहे
बाजुओं में रवानी हमेशा रहे
कोई तिरछी नज़र से अगर देख ले
तब रगों में ज़रा-सी हरारत रहे
एक भारत रहे, श्रेष्ठ भारत रहे
प्यास के रंग में कोई अंतर न हो
गागरें हों अलग, पर कुंआ एक हो
मंदिरों-मस्जिदों में भरोसा रहे
हों इबादत अलग, पर दुआ एक हो
क्यारियों की भले हों अलग खुशबुएँ
बाग़ बनने का उनमें महारत रहे
एक भारत रहे, श्रेष्ठ भारत रहे
जब हलाहल हवाओं में घुलने लगे
नीलकंठी बनें हम जगत् के लिए
सत्व पर आक्रमण जब कभी तम करे
दान हम कर सकें सर्व सत् के लिए
अपना सब कुछ लुटाकर नफ़े में हों हम
इस तरह की हमारी तिज़ारत रहे
एक भारत रहे, श्रेष्ठ भारत रहे
घर पड़ोसी का भी धूप से बच सके
ये सबक़ बरगदों ने सिखाया हमें
जो करिश्मा सिंहासन नहीं कर सके
त्याग ने वो भी करके दिखाया हमें
जब कभी हम नई आफ़तों से घिरें
तब दिमाग़ों पे दिल की सदारत रहे
एक भारत रहे, श्रेष्ठ भारत रहे
भूल जाना नहीं हम मिटे हैं सदा
देहरी के लिए, आन के वास्ते
ज़िंदगानी को चौसर पे मत हारना
शेख़ियों के लिए, शान के वास्ते
नफ़रतें, दहशतें जब रवानी पे हों
तब मुहब्बत की ज़िंदा इबारत रहे
एक भारत रहे, श्रेष्ठ भारत रहे
अपने घर को ही दुनिया समझते हैं जो
उनसे कह दो कि दुनिया हमारा है घर
हम चुनौती से आँखें चुराते नहीं
सावधानी रखी, कब रखा कोई डर
ग़ैर की भी हमें कुछ ज़रूरत रहे
ग़ैर को भी हमारी ज़रूरत रहे
एक भारत रहे, श्रेष्ठ भारत रहे
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
घुट-घुट कर साँस लेते आदमी को
घुटने से बचाने के लिए
व्यवस्था के घुटने बहुत काम आते हैं
दहशत में साँस लेती जनता को
एक ही बार में
साँस की चिंताओं से
मुक्त कर जाते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Ref : George Floyd Death Issue in America
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
बुनियाद पूरी इमारत का वज़्न उठा सकती है लेकिन एक कंगूरे का बड़बोलापन उसे बहुत भारी पड़ता है।
✍️ चिराग़ जैन