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सीता की पाती

मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है अभ्यास सुनो! लेकिन तुमने दे डाला है ख़़ुद को कितना त्रास सुनो! तुमने त्याग दिया है मुझको, पर मुझमें बाक़ी हो तुम मैं तुमको संग ले आयी हूँ, कितने एकाकी हो तुम मुझको बस वनवास दिया है, ख़़ुद को कारावास सुनो! मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है...

रावण

यदि अब राम की शरण में चला गया; तो मुझे मेरे भीतर का पाप मार डालेगा एकमात्र सधवा बचेगी मेरी पत्नी तो शेष विधवाओं का विलाप मार डालेगा जिनसे सुशोभित थी रावण की राजसभा उन रिक्त आसनों का शाप मार डालेगा मृत्यु जो करेगी वह जग को दिखायी देगा जीवन तो मुझे चुपचाप मार डालेगा जिस...

अयोध्या

शोभ रही नगरी सरयू-तट, खोज रहे उपमा तुलसी नील सरोवर में दमके, जिस भाँति कली इक रातुल-सी मानस-मानस राम बिराजत, आंगन-आंगन माँ तुलसी या नगरी वरनैं न थके, क्या तो आदिकवि, अरु क्या तुलसी ✍️ चिराग़...

हर सम्भव के साधन हैं

सपनों की आँखें पथराईं हिम्मत की पाँखें कुम्हलाईं संघर्षों की तेज पवन ने प्राणों की शाखें दहलाईं इन सारे झंझावातों से लोहा लिया ज़मीर ने अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने राजतिलक की शुभ वेला में राघव को वनवास मिला स्वर्ण जड़ित आभूषण उतरे, जंगल का संत्रास मिला...

जीतकर पछता रहे हैं

जब तलक संघर्ष में थे, व्यस्तता के हर्ष में थे दृश्य कितने ही मनोरम, कल्पना के स्पर्श में थे स्वप्न जबसे सच हुआ, उकता रहे हैं हम जीतकर पछता रहे हैं हम जब हमें हासिल न थी, मंज़िल लुभाती थी निरन्तर बाँह फैलाए हमें हँसकर बुलाती थी निरन्तर पर पहुँच कर जान पाए, है निरी रसहीन...
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