Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
लता जी का जाना, किसी सरस्वती के साकार से निराकार हो जाने जैसा अनुभव है। बहुत लम्बी तपस्या के बाद वरदान देने को प्रकट हुई किसी देवी के अंतर्धान हो जाने पर तपस्वी को जो अनुभूति होती होगी, ठीक उसी अनुभूति से आज भारत का एक-एक बाशिंदा गुज़र रहा है।
भारतभूमि के सहस्रों पुण्य फलित हुए तब जाकर तिरानबे वर्ष पहले देवी ने इस धरा पर जन्म लिया और भारतीय संगीत उस देवी के सुरम्य वरदानों से निखर उठा। अलाप, मुरकी और गायन की ऐसी-ऐसी हरक़तें संगीत के आंगन में किलोल करने लगीं कि कान से लेकर मन तक निहाल हो गया। ‘मेरी आवाज़ ही पहचान है’ गाते हुए जब उन्होंने ‘आवाज़’ शब्द गाया तो ऐसा लगा जैसे उनके कण्ठ में विद्यमान माँ वाणी लास्य कर उठीं। ‘नैनों में बदरा छाए’ गीत ने जब उनके कण्ठ का तीर्थ किया तो ऐसा लगा जैसे धैर्य के उत्तुंग शिखर से मिलन कि प्यास का झरना फूट पड़ा हो। ‘लग जा गले’ के शब्दों को जब उस स्वर का संसर्ग मिला तो ऐसा लगा मानो दुर्भाग्य के द्वार पर खड़े सौभाग ने वक़्त के उस लम्हे को अपने बाहुपाश में समेट लिया हो। और ‘ऐ मेरे वतन के लोगो’ को जब लता जी ने अपनी आवाज़ दी तो ऐसा लगा कि हिमालय के वैराट्य में साकार होकर माँ भारती बिलखते हुए अपने वीर बेटों का शौर्य गा रही हो।
पिछली एक शताब्दी से हम भारतीयों को इस आवाज़ की आदत पड़ गयी है। पिछली एक शताब्दी में हम इस सौभाग्य को इतना उपलब्ध मान चुके हैं कि कभी यह विचार ही नहीं आया कि एक दिन ये देवी अंतर्धान हो जाएगी। हम यह कल्पना ही न कर सके कि सुरों के सागर से नित नये नग़मे उलीचने वाली यह मेरुशिला एक दिन अचानक विलीन हो जाएगी। उनके सहज जीवट ने कभी आभास ही नहीं होने दिया कि आयु का देवता इस काया की भी उम्र का हिसाब रख रहा होगा। हम सोच ही न सके कि भारत में एक दिन ऐसा भी सूरज उगेगा, जिसके भाग्य में लता मंगेशकर को साँस लेते देखने की लकीर नहीं होगी।
आज सोशल मीडिया देखा तो ऐसा लगा जैसे एक बार फिर एक कलाकार तमाम विषाद, तमाम विद्रूपताओं और तमाम नकारात्मकताओं के आगे अपने पूरे अस्तित्व के साथ अड़ गया है। आज जिधर देखो उधर लता ही लता है। कहीं उनके गीत, कहीं उनकी गुनगुनाहट, कहीं उनकी यादें, कहीं उनके चित्र और कहीं उनकी बातें…! आज कला ने फिर पूरे देश के शोर-शराबे को सुरों से ढँक लिया है।
आज बहुत दिन बाद, दुःख में ही सही; लेकिन पूरा देश एक ही सुर में कोरस कर रहा है। आज बहुत दिन बाद; दुःख में ही सही; लेकिन पूरे देश की आँखों में एक ही रंग के आँसू है। आज बहुत दिन बाद पूरा देश एक ही लय में मौन है।
लता जी के महाप्रयाण पर मैंने अपनी पलकों के नम किनारों पर खड़े होकर करोड़ों सुबकियों की आवाज़ सुनी है। बेशक़ लता जी इस देश के सवा सौ करोड़ लोगों से व्यक्तिगत रूप से नहीं मिली थीं लेकिन आज पहली बार ऐसा लग रहा है कि इस देश के सवा सौ करोड़ लोगों ने उन्हें किस हद्द तक अपना माना हुआ है।
वसन्त पंचमी के दिन श्वेतवर्णी लता मंगेशकर निराकार हुई हैं। देश उनसे रोज़ बतियाता हो ऐसा नहीं है लेकिन देश उनकी आवाज़ सुने बिना कोई दिन नहीं बिताता यह सत्य है।
तिरंगे से लेकर हर रंग आज उदास है। एक सम्पूर्ण कलाकार अपनी भरपूर कृपा लुटाकर ऐसे जा रहा है ज्यों अपने सातों रंग बिखेरकर कोई इंद्रधनुष अदृश्य हो गया हो।
जहाँ से गुज़र रहा हूँ, वहीं लता जी की आवाज़ सुनाई दे रही है। पूरा देश उन्हें बताना चाहता है कि दीदी! आप कितनी भी ज़िद्द कर लो, आप हमारे बीच से कहीं जा न सकोगी।
✍️ चिराग़ जैन
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‘रमेश मुस्कान’ -यह किसी व्यक्ति का नहीं, एक प्रवृत्ति का नाम है। ज़िन्दगी उन्हें कितनी ही सैड सिचुएशन दे, वे उसको ठहाके की ओर मोड़कर उसका ‘दी एन्ड’ करने में माहिर हैं।
कई बार कुछ लोगों को देखकर ऐसा लगता है कि इनके जीवन में कोई चुनौती, कोई परेशानी है ही नहीं। लेकिन ध्यान से देखने पर पता चलता है कि इन लोगों की आँखों का निचला हिस्सा ढेर सारा पानी रोके हुए है। निरंतर ठहाके लगाकर ये लोग अपनी अलकों के बांध से उस पानी को रोके रखने में सफल हो जाते हैं।
इनके ठहाके इतने प्रभावी इसलिए होते हैं कि इनमें बनावट की कोई गुंजाइश नहीं होती। हँसने के लिए मनुष्य का अतिरिक्त बुद्धिमान होना आवश्यक है। यदि आपमें लतीफ़ा समझने जितनी बुद्धि न हो तो लतीफ़ा आपके होंठों पर हँसी रखने की बजाय पेशानी पर परेशानी रख देगा।
ज़िन्दगी भी हमें हर घड़ी लतीफ़ा सुना रही होती है। मुझ जैसे मूर्ख लोगों को वह लतीफ़ा समझ नहीं आता और मैं उसे समझने की जुगत में परेशान दिखने लगता हूँ। बाद में जब परिस्थिति बीत जाती है तब मैं उसी बात पर ख़ूब हँसता हूँ, जिसने मुझे कभी परेशान किया था। रमेश मुस्कान सरीखे लोगों का आई-क्यू लेवल इतना हाई है कि ये ज़िन्दगी के लतीफ़े को झटपट समझ लेते हैं और हमेशा ज़िन्दगी के साथ खिलखिलाते हुए पाए जाते हैं।
कुछ वर्ष पहले रमेश मुस्कान का भयंकर एक्सीडेंट हुआ। टक्कर इतनी भयावह थी कि एक टांग की हड्डी दल बदलकर कूल्हे की हड्डी में घुस गयी। डॉक्टर साहब ने भूलवश एनेस्थीसिया की दवा का असर पूरी तरह होने से पहले ही सर्जरी शुरू कर दी। दर्द की इस चरम सिचुएशन में डॉक्टर को अपने होशो-हवास की इत्तला देने की बजाय ये ऋषिकेश मुखर्जी इस बात की प्रतीक्षा करते रहे कि डॉक्टर को हँसाने का अवसर कब मिलेगा। कुछ समय बाद डॉक्टर साहब किसी बात से परेशान होकर अपने सहायक पर झल्लाने लगे। रमेश जी झट से बोल उठे- ‘डॉक्टर साहब, मैं कुछ हेल्प कर दूँ?’
एक क्षण के लिए डॉक्टर सन्न रह गया और फिर दोबारा एनेस्थीसिया लगवाकर सर्जरी को आगे बढ़ाया। लेकिन इस एक पंक्ति ने ऑपरेशन थियेटर के सारे तनाव को छू-मंतर कर दिया।
आर्थिक चुनौती हो या व्यावसायिक चुनौती; रमेश मुस्कान हर स्थिति में मस्त रहने की कला जानते हैं। उनके साथ वक़्त गुज़ारना किसी पैट्रोल पम्प पर अपनी ऊर्जा का टैंक फुल कराने जैसा अनुभव है। उनकी सलाह हमेशा लाजवाब होती है क्योंकि वे चश्मा आँखों पर नहीं, माथे पर लगाए फिरते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
22 जनवरी 2005 को शाम के बुलेटिन में ख़बर आई की दक्षिणी मुम्बई के एक फ्लैट से परवीन बॉबी का शव बरामद हुआ है। समाचार वाचक ने बताया कि परवीन बॉबी की मौत के दो दिन बाद पुलिस ने उनका शव बरामद किया।
मुझे आज भी अच्छी तरह याद है कि उस दिन वह समाचार बुलेटिन मेरे भीतर एक सिहरन पैदा कर गया था। मैं देर तक यह सोचता रहा कि जिन सितारों को दूर से देखकर हम रोमांचित होते हैं उनके भीतर का भयावह अकेलापन उनके जीवन को किस हद्द तक असह्य बना देता है।
एक अदद ज़िन्दगी अनबूझ पहेली की तरह दुनिया से विदा हो गयी, और इस भयावह सन्नाटे में अचानक खुसर-फुसर की आवाज़ें सरसराने लगीं। किसी ने कहा कि वह शराब बहुत पीती थी इसलिए किडनी फेल हो गयी। किसी ने कहा कि डैनी के प्यार में पागल होकर मर गयी। किसी ने अमिताभ बच्चन से नाम जोड़ा तो किसी ने महेश भट्ट से। किसी ने कबीर बेदी की दीवानी बताया तो किसी ने कहा कि काम मिलना बंद हो गया था इसलिए भूखी मर गयी।
कनबतियाँ चटखारे लगाती रहीं और फिल्मी ग्लैमर के चरम को छूकर लौटी एक नायिका अपने भोगे हुए सच को अपनी पलकों में मूंदे हुए दुनिया से रुख़सत हो गयी। उस दिन मैं बहुत देर तक उदास रहा था। आज तक पर देखी वो खिलखिलाती सूरत देर तक मेरे ज़ेहन में ठहाका मारकर हँसती रही और मैं उसके ठहाकों की व्यंजना में संवेदना की कराह को देर तक सुनता रहा।
उस दिन से मैंने किसी भी सामाजिक व्यक्ति की निजता में झाँकना बन्द कर दिया। उस दिन के बाद मैंने जाना कि फलों से लदा हुआ हर वृक्ष अपनी जड़ों में दमघोंटू उमस से घिरा होता है।
आज बस यूँ ही तारीख़ पर निगाह पड़ी तो याद आ गया वह एहसास जो मैंने एक क्षण में उस अभिनेत्री के साथ जी लिया था। एक ऐसी अभिनेत्री के साथ जिससे मेरा कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था, जिससे मैं कभी मिला नहीं था…
लेकिन यह एहसास मुझे आज भी हिला देता है कि जिस दुनिया के मनोरंजन के लिए उसने अपने आँसुओं पर खिलखिलाहट का मेकअप पोत लिया था, उस दुनिया ने उसकी मौत को भी गॉसिप की थाली में रखकर मिर्च-मसाला लगाकर यूज़ कर लिया।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Kohra Ghanaa Hai, Prose
भाषा किसी भी व्यक्तित्व का प्रथम विज्ञापन है। आप अपनी बात कहने के लिए जिस शब्दावली का प्रयोग करते हैं, वह आपकी मूल प्रवृत्ति की द्योतक है।
राजनैतिक भाषणों की गाली-गलौज, अराजकता, अभद्रता तथा अशिष्टता के सैंकड़ों उदाहरणों से यूट्यूब पटा हुआ है। निरर्थक वक्तव्य, कुतर्क, अश्लीलता और मूर्खतापूर्ण वक्तव्यों को रेखांकित करके मीडिया नकारात्मकता को हतोत्साहित करता है। यह अच्छी बात है। ट्रोलिंग कि माध्यम से भी ऐसी पोस्ट्स ख़ूब वायरल हो जाती हैं। लेकिन मुझे एक भी पोस्ट आज तक ऐसी नहीं मिली जो भाषा का स्तर पर सभ्य तथा शिष्ट लोगों की प्रशंसा में लिखी गयी हो। नकारात्मकता को हतोत्साहित करने में जितनी ऊर्जा व्यय होती है उसकी आधी ऊर्जा भी यदि सकारात्मकता के प्रोत्साहन में निवेश की जाए तो पूरा परिदृश्य बदल जाएगा।
जैसे प्रत्येक दल में बड़बोले, अशिष्ट और गालीबाज़ों की उपस्थिति है वैसे ही प्रत्येक दल में शिष्ट, विनम्र, शालीन तथा सभ्य नेताओं की भी उपस्थिति है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम इन नेताओं के सद्गुणों पर चर्चा करते ही नहीं हैं।
बात ये सभी लोग अपनी-अपनी पार्टी के एजेंडे के अनुरूप ही कहते हैं, लेकिन बात कहने का इनका सलीक़ा उल्लेखनीय है।
दो दशक के सामाजिक जीवन, कवि-सम्मेलनीय यात्राओं और लपेटे में नेताजी के सैंकड़ों एपिसोड करने के कारण अनेकानेक राजनैतिक व्यक्तित्वों से भेंट हुई है। इनमें से कुछ लोगों की वक्तृत्व कला तथा भाषा शैली मन मोह लेती है।
मैं पुनः स्पष्ट कर दूँ कि इनमें से किसी भी नेता के राजनैतिक विचार पर चर्चा न करके मैं केवल इनके भाषा संस्कार की बात कर रहा हूँ।
इस क्रम में पहला नाम है श्री सुधांशु त्रिवेदी का। रामचरितमानस की चौपाइयों से लेकर हिंदी की सैकड़ों कविताएं, उर्दू के हज़ारों अशआर तथा संस्कृत के अनेक श्लोक इन्हें कंठस्थ हैं। किसी भी विषय पर अपनी बात रखते समय ये इन काव्यांशों से अपनी बात को पुष्ट करते हैं। भाषा का संस्कार ऐसा है कि शब्द सधे हुए तथा प्रभावी वाक्य विन्यास के साथ उपस्थित होते हैं।
ठीक इसी तरह श्रीमती रागिनी नायक को भी न जाने कितनी ही नज़्में, ग़ज़लियात, कविताएं, चौपाइयां और श्लोक रटे हुए हैं। और साहित्यिक समझ इतनी परिपक्व है कि संदर्भ उपस्थित होते ही बिल्कुल परफेक्ट पंक्तियाँ उद्धृत करने में ये दक्ष हैं। स्वर को कब कितना ऊँचा करना है और कब खिलखिलाकर चर्चा के तनाव को ग़ायब कर देना है -इसकी समझ रागिनी जी को भरपूर है।
एक वक्ता के रूप में सुधांशु जी और रागिनी जी; दोनों ही की एक ख़ासियत मुझे बहुत प्रभावित करती है और वह यह कि ये दोनों ही लोग सामनेवाले के अखाड़े में उसके स्तर पर उतरकर दाँव लगाना जानते हैं लेकिन जिस भी अखाड़े में उतरते हैं उसे बहुत जल्दी अपने स्तर तक ले आते हैं।
श्री शत्रुघ्न सिन्हा भी हर बात का उत्तर किसी काव्योक्ति से देकर लाजवाब कर देते हैं। उनका अध्ययन कोष बहुत समृद्ध है। और सबसे बड़ी बात यह कि वे अशआर को अशआर की ही तरह पढ़ना जानते हैं।
ऐसे ही एक वक्ता है श्री राकेश सिन्हा। कड़वे सवालों का उत्तर देते समय भी उनकी मिठास कभी ग़ायब नहीं होती। श्री सुधांशु मित्तल भी बड़े धैर्य के साथ विरोधी की बात सुनते हैं फिर मुस्कुराते हुए अपने राजनैतिक अनुभव के पिटारे से कोई संदर्भ तलाशकर धीमी आवाज़ में पुख्ता बात कहते हैं। श्री मनीष सिसोदिया भी असभ्यता के दायरे से दूर रहकर अपनी बात रखने में परिपक्व हैं।
तर्क की कसौटी पर श्री गौरव वल्लभ, श्री कन्हैया कुमार, श्री आलोक शर्मा, श्री कपिल सिब्बल, श्री श्रीकांत शर्मा, श्री शाहनवाज़ हुसैन, श्री अससुद्दीन ओवैसी भी विषय को भटकाने की बजाय टू द प्वाइंट उत्तर देते हैं, किन्तु इन सबको कई जगह धीरज खोते देखा जा चुका है। असभ्य न भी हों तो इनकी आवाज़ से इनके अनियंत्रण को भाँप लिया जाता है।
भारतीय राजनीति ने पंडित अटल बिहारी वाजपेयी और सुषमा स्वराज सरीखे वक्ताओं के उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। लालू प्रसाद यादव जैसा हास्यबोध; आनन्द शर्मा जैसी समझ; शशि थरूर जैसी व्याख्या; के एक गोविंदाचार्य जैसी विद्वत्ता; राजनाथ सिंह जैसा ठहराव और मीरा कुमार जैसी मृदुता भारतीय राजनीति की पहचान रही है।
यदि हमने अच्छे लोगों की चर्चा करना शुरू कर दिया तो भारतीय राजनीति का वह दौर फिर लौट सकेगा।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
आगरा शहर पीछे छूट रहा था और राजमार्ग सकुचाते हुए एक समान्य सी सड़क में समा गया था। निमंत्रण देते समय ही होलीपुरा के वयोवृद्ध गीतकार शिवसागर शर्मा जी ने बता दिया था कि सड़क पर गाय-मवेशी बहुत मिलेंगे इसलिए गाड़ी आराम से ही दौड़ाना।
ज्यों-ज्यों हम आगरे की शहरी आबोहवा से बाहर निकल रहे थे, त्यों-त्यों सड़क किनारे हरियाली और सड़क पर गैया की मात्रा बढ़ती जा रही थी।
आसमान के बादल रह-रहकर हमारी गाड़ी पर रिमझिम से हस्ताक्षर कर रहे थे। सड़क के बीच मवेशियों की महा-पंचायतें लगी थीं। ऐसा लगता था जैसे गौवंश के महाकुंभ में अलग-अलग अखाड़े अपनी बिछावत सजाए बैठे हों। इनकी संख्या इतनी अधिक थी कि महानगरों में सरपट दौड़ती गाड़ियां यहाँ दबे पांव किनारे होकर निकल रही थीं।
इस वृंदावननुमा वातावरण से गुज़रते हुए जब काफ़ी समय बीत गया तो जीपीएस ने हमें मुख्य सड़क से लगभग एक पगडंडी पर उतार दिया। दोनों ओर खेत कतार बाँध कर खड़े थे और उनके बीच से हमारी गाड़ी लहराती हुई पगडंडी पर दौड़ रही थी। खेतों का साम्राज्य संपन्न हुआ तो हम होलीपुरा के रिहायशी इलाके में पहुँच गए।
रास्ता, मौसम और गांव… तीनों ने मन को रमणीक बना दिया था। हवा की नमी से मन भीगने लगा था कि अचानक गाड़ी एक बड़े से गेट में प्रविष्ट हुई और एक मैदान में जाकर रुक गई। सामने बड़ा सा फ्लैक्स लगा था जिसमें आमंत्रित कविगण की सूची में मेरा भी शानदार चित्र छपा था।
बैनर से लेकर आयोजक तक सादगी का समारोह था। गाँव के इंटर कॉलेज के टीनवाले सभागार में आयोजन था। दीवारें ख़ूबसूरत और महंगे पेण्ट से सजी नहीं थीं, लेकिन उन पर जीवन की वे इबारतें लिखी थीं, जिनको आत्मसात करके मनुष्य बना जा सकता है। स्टेज पर गद्दा बिछा था और उस पर मसनद लगाई गयीं थीं। आयोजकों की भागदौड़ (जो कार्यक्रम सम्पन्न होने तक यथावत बनी हुई थी) से गद्दे में सिलवटें पड़ गयी थीं लेकिन स्वागतकर्ताओं की मुस्कान में ज़रा भी सिलवट नहीं मिली।
एनसीसी कैडेट्स और अन्य कुछ बच्चे स्टेज के ठीक सामने बिछी दरी पर विराजित थे। शेष श्रोतादीर्घा कुर्सियों से सज्ज थी। हॉल में थोड़ी आवाज़ गूंज रही थी लेकिन साउंड सिस्टम इतना बढ़िया था कि हॉल की इको का दुष्प्रभाव कवियों की प्रस्तुति पर नहीं पड़ा।
कार्यक्रम का आयोजन सीधे-सादे गीतकार श्री शिवसागर शर्मा की दो पुस्तकों के लोकार्पण के उपलक्ष्य में किया गया था। पीले कुर्ते के नीचे सफेद रंग की धोती पहने शिवसागर जी बड़े ख़ुश थे। सारी व्यवस्था प्रयत्क्ष रूप से वे स्वयं ही कर रहे थे इसलिए कवियों के स्वागत, श्रोताओं की व्यवस्था, माइक, हॉल, पुस्तक लोकार्पण, माला, भोजन, मानदेय, दीप प्रज्ज्वलन की मोमबत्ती और सभी व्यवस्थाओं ने उनको अतिरिक्त व्यस्त कर रखा था।
प्रोफेसर हरि निर्माेही ने प्रारंभिक संचालन किया और पुस्तक लोकार्पण का कार्य सम्पन्न करवाया उसके बाद शिवसागर जी ने काव्यपाठ भी किया और अपने बेहतरीन गीत से कार्यक्रम का स्तर सुनिश्चित कर दिया।
इसके बाद मेरे संचालन में सभी कवियों ने सधा हुआ, संक्षिप्त किन्तु सार्थक काव्यपाठ किया। स्थानीय कवियों को सुनकर भी यह समझ आ गया था कि परिवेश गीत का है। फिर तो सभी कवियों ने अपने मन का काव्यपाठ किया। भोजन का समय होने पर कार्यक्रम में ब्रेक दिया गया। सबने मान-मनुहार से भोजन किया।
एक बार मुझे ऐसा लगा कि इस ब्रेक के कारण श्रोताओं की संख्या कम हो जाएगी लेकिन जब हम भोजन करके लौटे तो हॉल उतना ही भरा हुआ था।
कवि-सम्मेलन क्या था, कविताओं का महोत्सव था। गीत पर श्रोताओं की प्रतिक्रिया देखकर मैं भी गीत सुनाने की हिम्मत कर सका; जिसे सफल कहा जा सकता है।
एक गर्म दुःशाला, एक डिब्बा गुंजिया, दो सद्य प्रकाशित पुस्तकें और ढेर सारा ‘मन’ लेकर गाँव से घर लौट आया हूँ लेकिन यह स्वीकार करना चाहता हूँ कि तानसेन बनकर घूमते-घूमते आज हरिदास की कुटिया में पहुँचा तो अपनी अट्टालिकाओं का बौनापन समझ आ गया।
भव्य मंच, ग्लैमरस साज-सज्जा, चकाचौंध और बेतहाशा शानो-शौक़त से दूर आज गाँव का कवि-सम्मेलन करके लौटा हूँ। ऐसा लग रहा है ज्यों बहुत दिन तक पिज़्ज़ा और डबलरोटी खाने के बाद यकायक किसी ने चूल्हे के पास बैठाकर पानीवाले हाथ की रोटी, ताज़ी पिसी चटनी के साथ परोस दी हो।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
अभी घर से निकला। एक बुज़ुर्ग महिला सड़क किनारे एक ट्री-गार्ड को पकड़कर खड़ी थी। उन्हें शायद किसी सोसाइटी में जाना था लेकिन बिना सहारे के चलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थीं और ट्री-गार्ड को पकड़े हुए आते-जाते लोगों की ओर कातर दृष्टि से निहार रही थीं।
सोसाइटी के बाहर इस समय बहुत तो नहीं, लेकिन थोड़ी चहल-पहल भी थी। पर अपनी-अपनी व्यस्तता लादे वहाँ से गुज़रनेवाला कोई शख़्स रुककर उस वृद्धा की सहायता न कर सका।
मैं फोन पर ऊबरवाले से कॉर्डिनेट कर रहा था। एक बार मैं भी अपनी कैब पकड़ने के चक्कर में उस कातर दृष्टि को अनदेखा करने की हिम्मत जुटा गया, लेकिन दो-तीन क़दम ही बढ़कर मुझे पलटना पड़ा।
मैंने उनकी ओर हाथ बढाते हुए धीरे से पूछा- ‘आंटी, कहीं छोड़ दूँ?’
उन्होंने मेरा वाक्य पूरा होने से पहले ही मेरी हथेली थाम ली और ट्री-गार्ड छोड़कर मेरी ओर बढ़ आईं। सामनेवाली सोसाइटी के गेट पर गार्ड ने उनका हाथ मेरे हाथ से अपने हाथ में लिया और मुझे कहा कि मैं अम्मा को घर छोड़ दूंगा, आप जाइये।
मैंने वृद्धा की ओर देखा तो उनके चेहरे की घबराहट एक आश्वस्ति में तब्दील हो चुकी थी। मैं आकर अपनी कैब में बैठ गया और सोचने लगा कि क्या कभी वह दुनिया वापस आएगी जब बुजुर्गों को सहायता के लिए कातर दृष्टि की नहीं, आवाज़ के रुआब का प्रयोग करना होगा।
मैंने यह घटना इसलिए नहीं लिखी कि मुझे स्वयं को महान सिद्ध करना है, बल्कि मैं अपने उन दो क़दमों के लिए स्वयं से मुख़ातिब हूँ, जो मैं अपनी व्यस्तता का बहाना करके बढ़ा चुका था।
हम सब अपनी व्यस्तताएँ ओढ़े हुए मनुष्यता की कातर दृष्टि से दो क़दम आगे बढ़ चुके हैं। यदि यहाँ से हम नहीं पलटे तो मनुष्यता किसी सड़क किनारे यूँ ही खड़ी रह जाएगी!
✍️ चिराग़ जैन