+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

दिल खोलकर…

अपने रोग का संज्ञान होने से लेकर अब तक की यात्रा में जो कुछ जीवन सीखने का अवसर मिला, उसके लिए यह सारा कष्ट बड़ा मोल नहीं है। पहली बार पता लगा कि लोगों की धूर्तता ही नहीं, बल्कि उनकी सहृदयता पर भी एक आवरण चढ़ा होता है, जो ऐसे ही समय में अनावृत होता है।
मोर्चे पर खड़े सिपाही को दुनिया बिल्कुल अलग रंग की दिखने लगती है। उसके लिए लोगों की मान्यता के अर्थ बदल जाते हैं। और लोगों की भी उसके प्रति धारणाएँ बदल जाती हैं।
मैंने पिछले एक महीने में इन अनुभूतियों को गहरे तक महसूस किया है। दुःख-सुख, अच्छे-बुरे, नैतिक-अनैतिक के आकलन से परे सब कुछ आश्चर्यबोध से युक्त था। पीड़ा का उद्वेग मन को सतह से कुछ नीचे अवश्य ले जाता है; बस इसी स्थान पर सतह की मरीचिका अदृश्य होने लगती है। इस स्थान पर पहुँचकर जब सतह पर किसी को सतही आचरण करते देखो तो उसके कलापों को देखकर क्षोभ नहीं, आनंद होता है।
एक छोटा-मोटा सा तुरीयावस्था योगी मन के भीतर बैठा ‘तमाशा-ए-अहले-करम’ देखता रहता है। उसे पता है कि दुआ और ढिंढोरे का कोई आपसी मेल नहीं है। वह समझता है कि भीगी हुई कोरों के होंठों का रंग मुस्कानी होता है। वह जानता है कि ‘जल्दी आ जा यार’ जैसा वाक्य बोलते हुए मुस्कुराहट कितना सारा दर्द एक साथ छिपा लेती है।
उस रात, जब मुझे ऑपरेशन थियेटर में ले जाया जा रहा था तब मैं यह समझ पा रहा था कि यहाँ से कहानी आगे न बढ़ी तो इसी को इतिश्री मानना होगा। यद्यपि एक रात पहले एंजियोग्राफी में ऐसा ही ऑपरेशन थियेटर देख चुका था लेकिन फिर भी उस रात का एहसास थोड़ा विशेष था।
कुछ डॉक्टर्स मुझे पहचानने लगे थे, सो ऑपरेशन की तैयारियों के दौरान वहीं एक डॉक्टर ने दिनकर की रश्मिरथी शुरू कर दी। मैंने भी ऑपरेशन टेबल पर लेटे-लेते छोटा-मोटा काव्यपाठ किया।
अचानक दाहिने हाथ में थोड़ा मोटा इंजेक्शन लगने जैसा अनुभव हुआ और उसके बाद मुझे सुनाई दिया कि कोई मेरे गाल पर चपत लगाकर ‘चिराग़ जैन… चिराग़ जैन’ बोल रहा था। मेरी आँखें न खुल सकीं थीं लेकिन मैं महसूस कर पा रहा था कि मेरी नाक और गले में से नलियाँ गयी हुई हैं, मुझे बहुत भयंकर प्यास लगी है और कोई बेचैन होकर मुझसे मेरा नाम पूछ रहा है। ढेर सारी ऊर्जा बटोरकर मैंने अपना नाम बताया तो पूछनेवाले के स्वर में हर्ष घुल गया।
उसने मुझसे पूछा- ‘तुम्हें कुछ याद है?’ …मैंने कुछ शास्त्रीय कविताओं के अंश दोहराकर स्वयं को आश्वस्त किया।
उसने कहा, ग्रेट। ऑपरेशन बढ़िया हुआ। अब हम वेंटिलेटर निकालेंगे। थोड़ा दर्द होगा, बर्दाश्त करना। जब तक मैं कुछ समझ पाता तब तक उस व्यक्ति ने गले में घुसी हुई नली को अच्छे से हिलाकर बाहर खींच दिया। प्यास से बेचैन कण्ठ में यह घर्षण एक आह में घुटकर रह गया। मैं पानी को तरसता रहा लेकिन तीन-चार घण्टे तक होंठ गीले करने से ज़्यादा पानी मेरे लिए उचित नहीं था।
उस क्षण से अब तक लगातार समझ रहा हूँ कि उस रात रश्मिरथी के पाठ के बाद क्या हुआ होगा। पेट में से चार-पाँच जगह नलियाँ गयी हुई थीं, जो डॉक्टर्स ने एक-एक करके धीरे-धीरे निकालीं। कल जब टाँके काटे गये तो एक बार मोक्ष जैसी अनुभूति हुई। यद्यपि इतने बड़े परिवर्तन को स्वीकार करने में देह को अभी कुछ सप्ताह लगेंगे, लेकिन यह महसूस होने लगा है कि खानपान और मान्यताओं के स्तर पर मैं मैंने एक सविवेक मस्तिष्क के साथ सद्यजात होने का अनुभव पा लिया है।

✍️ चिराग़ जैन

दिल की डायरी

दिल में काफी बड़ा घोटाला पकड़ा गया है। जिस विभाग को शरीर में ख़ून वितरित करने का उत्तरदायित्व दिया गया था, वह पिछले 36 वर्ष से कुछ रक्त बचाकर दिल के भीतर फेंकता रहा है। इस भ्रष्टाचार की वजह से दिल का पूरा तंत्र कमज़ोर होता रहा और अब वह अपनी क्षमता का एक-चौथाई काम ही कर पा रहा है।
जाँच कमेटी ने उक्त विभाग को बदल देने की कड़ी सिफ़ारिश की है। काफ़ी देर तक पड़ताल के बाद जाँचकर्ताओं को पता चला कि दिल बड़ा है। यह सुनकर मुझे हँसी आ गयी। छोटा रहा होता, तो कविता कैसे लिख पाता!
बहरहाल, ज़िन्दगी ने मुझे यह अवसर दिया है कि अपना दिल चीर के दिखा सकूँ। देख लेना, कुछ नहीं निकलेगा इसमें। फिर मैं डंके की चोट कह सकूंगा कि मैं कोई बात दिल में नहीं रखता।
✍️ चिराग़ जैन

वो सुबह कभी न आए!

उस दिन सुबह जब आँख खुली तो पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गयी। मोबाइल पर आदित्य जी की मृत्यु का समाचार था। तब सोशल मीडिया इतना एक्टिव नहीं था। सो, परस्पर फोन से ही सूचनाएँ मिल पाती थीं। कुछ कवियों को फोन मिला तो पता चला कि दुनिया लुट चुकी है। रात को जो कवि-कुनबा उत्सवों की रौशनी में नहाया हुआ था, अब उसके आंगन में मातम पसरा है।
टेलिविज़न पर न्यूज़ चैनल खोला तो वहाँ भी शोक ही शोक दिखा। कहीं हबीब तनवीर साहब की श्रद्धांजलि चल रही थी तो कहीं देर रात घटी इस दुर्घटना की रपट प्रसारित हो रही थी। प्रकृति हम मनुष्यों के सुख-दुःख से हमेशा स्वयं को बचाए रखती है। हम ज़मीन में धँसे जा रहे थे, और सूरज रोज़ की तरह अंगारे बरसाता हुआ ऊपर चढ़ रहा था।
दिल्ली, बैतूल, शाजापुर… सबके चेहरे लटक गये थे। एक जहाज़, हास्य के शिखर को बांधकर दिल्ली ला रहा था, तो उधर पंजाब से बैतूल पहुँचनेवाले एक हवाई जहाज में क्रन्दन सवार था। एक मातम भोपाल से बैतूल जा रहा था, तो दूसरी एम्बुलेंस शाजापुर की नम आँखों की दर्शनेच्छा को लिए सड़क पर दौड़ रही थी। उधर ओम भाई अस्पताल में मल्टीपल सर्जरी करवाते हुए अर्द्धमृत्यु में जा चुके थे।
दिल्ली में जब आदित्य जी का शव आया तो मालवीय नगर श्मशान घाट के द्वार पर मैंने अल्हड़ जी को देखा। उनकी देह में पीड़ा, आँखों में आँसू और होंठों पर बहुत गहरा मौन था। मुझे याद है कि किसी छले गये व्यक्ति की भाँति वे श्मशान के बाहर ही एक चबूतरे पर बैठ गये थे। उनकी गर्दन नीचे झुक गयी थी और मन ही मन किसी बात पर अस्वीकृति देते हुए नकारात्मक मुद्रा में हिल रही थी।
उधर मुखाग्नि से पूर्व कुछ कवियों ने आदित्य जी के अंतिम दर्शन की इच्छा प्रकट की तो बड़े लोगों ने मना कर दिया। दुर्घटना के कारण चेहरा देखने लायक नहीं बचा था। ठहाकों के ऋषि को चिता पर लिटाकर जब श्मशान से बाहर निकले तो हर आँख नम थी।
उधर बैतूल और शाजापुर ने पूरे शहर में पुष्पवृष्टि करके अपने रचनाकारों को विदा किया। उधर अल्हड़ जी अस्पताल में भरती हो गये थे और ओम व्यास ओम जी जीवन-मृत्यु के बीच झूल रहे थे। आदित्य जी का शोक पूर्ण होने से पूर्व ही अल्हड़ जी चले गये। पीड़ा पर एक परत और चढ़ गयी। श्रद्धांजलियों, अंत्येष्टियों और शोक सभाओं के इस दौर से उबर पाते कि तब तक ओम भाई भी विदा हो गये।
…आज एक युग बीत गया उस अशुभ काल का। लेकिन अभी तक उस दौर को याद करके मन सिहर उठता है। मुझे आज भी लगता है कि साँची से भोपाल आनेवाली उस सड़क पर अभी कोई गाड़ी दौड़ती हुई आएगी लेकिन आगे खड़े ट्रॉले को देखकर उसके ब्रेक लग जाएंगे…!

✍️ चिराग़ जैन

कितनी मुहब्बतें

नोएडा से एक फोन आया। फोन करनेवाला व्यक्ति स्वयं पॉजिटिव होकर अपने डेढ़ साल के बच्चे के साथ घर पर क़ैद था और उसकी पत्नी अस्पताल में कोविड से लड़ रही थी। बीमारी, चिंता, नन्हें बच्चे का लालन-पालन, अर्द्धांगिनी का रोग, अर्थ, अभाव…!
उस दिन मन बहुत उदास था। मदद की गुहार बढ़ती जा रही थीं और समाधान के स्रोत निचुड़ते जा रहे थे। अंधाधुंध फॉरवर्ड की समस्या के कारण अधिकतर नम्बर बन्द हो गए थे। न जाने कौन से डर के कारण प्लाज़्मा डोनर्स घर से निकलने को तैयार नहीं हो रहे थे। ऑक्सीजन भरनेवाले जो नम्बर्स हमारे पास थे वहाँ धीरे-धीरे निराशा छाने लगी थी। इस बीच कुछ नयी समस्याएँ भी सामने आने लगी थीं। कहीं किसी गाँव में कोई कोरोना पीड़ित परिवार ऑक्सिमीटर नहीं जुटा पा रहा था, तो कहीं किसी शहर में कोई ऑक्सीजन कन्सन्ट्रेटर होते हुए भी उसे ऑपरेट नहीं कर पा रहा था।
समस्याओं का वेग बढ़ने लगे और समाधान का द्वार खुल न पा रहा हो तो हिम्मत का बांध डगमगाने लगता है। ऐसी ही मनोदशा में मैंने एक आखि़री कोशिश के रूप में अपनी फेसबुक पर यह अपील की कि जो भी व्यक्ति, जिस भी क्षेत्र में, जो भी सहायता करने में सक्षम हो; वह मुझे इनबॉक्स में सम्पर्क करे। अपील पोस्ट करने के शुरुआती कुछ घण्टों में केवल इक्का-दुक्का मेसेज ही आए, लेकिन ये एकाध मेसेज मेरे टूटे मन को मज़बूती देने के लिये पर्याप्त थे। छत्तीसगढ़ से एक सज्जन ने बताया कि वे कोविड से गुज़रकर स्वस्थ हो चुके हैं लेकिन चाहते हैं कि उनका ऑक्सिमीटर किसी के काम आ जाए। एकाएक यह संदेश सामान्य लग सकता है, लेकिन इसे पढ़कर मुझे एहसास हुआ कि इस संक्रमण की त्रासदी से निकला परिवार यदि इतना आत्मविश्वास जुटा पाया है कि अब उसे ऑक्सिमीटर की ज़रूरत नहीं पड़ेगी; यदि वह स्वयं समस्या से निकलकर दूसरे परिवारों की इस मूलभूत समस्या का विचार कर सकता है तो इस देश में सद्भाव और आत्मविश्वास की फसल लहलहाने में अधिक समय शेष नहीं है।
वायरस के आतंक के बावजूद अगर कोई इतनी हिम्मत कर पा रहा है कि वह अपने शहर में किसी की भूख मिटाने जाना चाहता है, तो इस बात के लिए आश्वस्त हुआ जा सकता है कि स्वार्थ की परत के नीचे पनप रहा करुणा का अंकुर फूट आया है।
अपने घर में हुई मौत को भूलकर भी अगर कोई किसी की साँसों के लिए ‘कुछ सहायता’ करने के लिए हमसे जुड़ने की पेशकश करता है तो इस बात की आश्वस्ति होती है कि किसी भी परिस्थिति में नैराश्य का वायरस इस मुल्क को संक्रमित नहीं कर सकेगा।
बस ये सब संदेश मेरा मानसिक उपचार कर गए। मेरी निराशा हवा हो गयी। भीतर कोई क्रांति घटित हुई, जिसने एक तरफ़ अपील की प्रतिक्रिया में प्राप्त हो रहे संदेशों को व्यवस्थित करना शुरू किया, दूसरी तरफ़ ज़रूरतमंद लोगों के संदेशों की सूची बनाई। और एक बार फिर मददगारों तथा ज़रूरतमंदों के बीच समन्वय में जुट गया।
आज किसी ने मेरे फेसबुक पर टिप्पणी की कि ये दौर समाप्त होने के बाद वह एक पीपल का पेड़ लगाएगा, उसकी देखभाल करेगा और उसका नाम रखेगा ‘चिराग़’।
मुझे अहमद फ़राज़ साहब का एक शेर याद आ गया-

और ‘फ़राज़’ चाहियें कितनी मुहब्बतें तुझे
माओं ने तेरे नाम पर बच्चों के नाम रख दिये

✍️ चिराग़ जैन

मददगारों के नाम पाती

सद्भावना युक्त मित्रो!
कोरोना की इस महामारी में आपके प्रयास स्तुत्य हैं। आपकी नीयत पर भी कोई संदेह नहीं है, लेकिन किसी को भी मदद भेजने से पहले कृपया निम्न बातों का ध्यान रखें-
1) संकट में फँसे व्यक्ति को केवल वही जानकारी भेजें, जिसकी आपकी टीम ने पिछले 24 घण्टे के भीतर स्वयं पड़ताल की है।
2) सोशल मीडिया पर चल रहे किसी भी फॉरवर्ड सन्देश को अग्रेषित करने से बचें, क्योंकि इन्हीं संदेशों की वायरल क्षमता का लाभ उठाकर ठग और मुनाफाखोर अपना काम कर रहे हैं।
3) यदि हर व्यक्ति स्वयं वेरिफाई करेगा तो वह नम्बर रेस्पॉन्स करना बंद कर देगा इसलिए इसके लिए अपनी टीम में एक व्यक्ति नियुक्त करें।
4) मरीज़ के साथ जीवन के लिए जूझ रहे लोग घबराए हुए हो सकते हैं, ऐसे में अपने विवेक को बचाए रखना आपकी ज़िम्मेदारी है। उनके रुदन से द्रवित होकर उतावलेपन में उन्हें अपुष्ट जानकारी भेजने की ग़लती न करें। उन्हें कहें कि आप अपने प्रयास जारी रखें, कोई कन्फर्म लीड मिलते ही आप उन्हें कॉल करेंगे।
5) अगर किसी अस्पताल की वैकेंसी के बारे में आपको जानकारी नहीं है तो भी किसी को उस अस्पताल का विकल्प बताते समय यह अवश्य बताएँ कि वहाँ क्या-क्या सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
6) चिकित्सा करना आपके अधिकार क्षेत्र में नहीं है, इसलिए किसी के लाख बार कहने पर भी किसी को कोई चिकित्सकीय सलाह न दें। बल्कि उसके लिए फोन पर कोई डॉक्टर उपलब्ध कराने का प्रयास करें।
7) सोशल मीडिया पर कोई लीड पोस्ट न करें। जिसे आवश्यकता हो उसे वेरिफाइड लीड इनबॉक्स में ही दें।
8) अपेक्षित सहायता पहुँचने के बाद अपने सोशल मीडिया हैंडल से उसकी अपील डिलीट करना न भूलें। यह बेहद आवश्यक है।
9) यदि आप किसी को कोई मदद करने की स्थिति में नहीं हैं तो उसको मना करना सीखें।
10) जो व्यक्ति आपको अपुष्ट फारवर्ड भेज रहा है उसे ऐसा करने के लिए मना करें।

बिना देखे, सौ मील का सफ़र तय करने से बेहतर है कि देखकर दस क़दम चला जाए।
✍️ चिराग़ जैन

मदद की गुहार

मनुष्यो!
हमारे साथ लगभग डेढ़-दो सौ युवा अनवरत गिलहरी की भूमिका में इस विपत्ति से लड़ रहे लोगों की सहायता का प्रयास कर रहे हैं। इन्हें न बदले में कोई धन्यवाद चाहिए न तमगा!
इनके प्रयासों ने विवशता के रेगिस्तान में खड़े कई प्यासे लोगों का गला तर भी किया है और कुछ तक बस एकाध बून्द ही पहुँचा सके हैं। कहीं-कहीं एक बून्द भी पहुँचाने में सफलता नहीं मिली है। लेकिन जिस भी दिशा से किसी मदद की गुहार आई, ये मरहम लेकर उस दिशा में दौड़े ज़रूर हैं।
मदद हो जाने के बाद हम उसके लिए पोस्ट की गई अपील भी अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से डिलीट कर देते हैं ताकि अंधाधुंध फॉरवर्ड करनेवालों की टोकरी में वह संदेश न चला जाए।
यह जटायु का रावण से संग्राम है। यह जुगनू की अंधेरे से जंग है। इस युद्ध में जुटे योद्धाओं की ताक़त देश के सामान्य परिवारों में बसनेवाले वो सद्भाव हैं जो किसी न किसी तरह से किसी की मदद करना चाहते हैं लेकिन वास्तविक ज़रूरतमंद तक पहुँचने का ज़रिया उनके पास नहीं है।
पिछले 12-15 दिन के दौरान इन नन्हीं गिलहरियों ने काफी हद्द तक आँसू और ग्लीसरिन में अंतर करना सीख लिया है। आप यदि कोई मदद करने के इच्छुक हैं तो हमसे सम्पर्क कीजिये।
ज़रूरी नहीं कि आपको स्वयं ही कोई मदद करनी होगी। आप अपने आस-पड़ोस में उपलब्ध कोविड सम्बन्धी किसी सेवा की ‘बिल्कुल सटीक’ जानकारी भी भेज देंगे तो भी उससे अनेक लोगों का लाभ होगा।
कृपया व्हाट्सएप और फेसबुक पर चल रहे किसी भी संदेश को बिना वेरिफाई किये न भेजें। आप केवल उसी सेवा की सूचना भेजें जो स्वयं आपके द्वारा उपलब्ध कराई जा रही हो अथवा जिसके विषय में आपने पूरी आश्वस्ति कर ली हो।
आपकी सेवा किस शहर के लिए है, यह अवश्य लिखें।
किसी भी मददगार का नम्बर सार्वजनिक नहीं किया जाएगा और आपके पास सीधे मरीज़ के परिजन का ही फोन आएगा।
सोशल मीडिया पर सेवा का कई क्विंटल कचरा घूम रहा है। इस कचरे के ढेर में से असली सूत्र ढूंढने में हमारी मदद करें।
और हाँ, हमें आर्थिक मदद के लिए तभी सम्पर्क करें जब हम इसके लिए कोई अपील पोस्ट करें।
एक लास्ट रिक्वेस्ट, व्हाट्सएप पर केवल आवश्यक सूचना ही भेजें। प्रशंसा के सन्देश पढ़ने में जो समय नष्ट होता है उसका सदुपयोग कर हम कोई लीड ढूंढ़ लेंगे।
✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!