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घूमर की धुन पर बीहु

दो दिन प्रकृति की गोद में रहकर अब दिल्ली लौट रहा हूँ। ग्रीष्म ऋतु के जिस प्रकोप में दिल्ली से उड़ान भरी थी, उसके परिप्रेक्ष्य में डिब्रूगढ़ उतरते हुए स्वर्ग की अनुभूति हो रही थी।
पायलट ने लैंडिंग की घोषणा की और हमारा विमान घने बादलों के साम्राज्य में प्रविष्ट हो गया। खिड़की के बाहर बारिश की बूंदों ने अठखेलियाँ शुरू कर दी थी। वैभवशाली मेघों को पार कर ज्यों ही हमें धरती दिखाई दी तो ऐसा लगा ज्यों अचानक किसी ने आँखों में हरा रंग भर दिया हो। रिमझिम बरसात में पुलकता हुआ डिब्रूगढ़ शहर किसी सृजनशील चित्रकार की पेंटिंग जैसा जान पड़ता था।
जहाज के पहियों ने टच डाउन पॉइन्ट को स्पर्श किया तो गति से उत्पन्न उष्मा ने भीगी हुई धरती में समाकर पानी की फुहारों का एक धुआँ सा उत्पन्न कर दिया। ऐसा लगा ज्यों आसमान का कोई बादल जहाज के किसी पेंच में अटक गया हो, जो अचानक धरती पर गिरने के झटके से छुटकारा पा रहा हो।
हम भी भौतिक वायुयान से उतर कर मन को उड़न खाटोला बनाने के लिए हवाई अड्डे से बाहर आ गए। बाहर सुमित खेतान जी हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। एयरपोर्ट परिसर से बाहर निकलते ही चाय के बागान सड़क के दोनों ओर बिछने लगे। नहा-धोकर भीगी खड़ी चाय की हरियाली इतनी ख़ूबसूरत हो गयी थी कि बादल रह-रहकर बरखा का वेश बनाकर चाय की पत्तियों को चूमने का बहाना ढूंढता दिखा। प्रेम की इन पसीजी हुई शरारतों में सड़क शर्म से पानी-पानी हुई जाती थी। लहराती हुई सड़क पर हमारी गाड़ी किसी रोमांटिक स्पर्श की तरह दौड़ी चली जाती थी।
असमिया संस्कृति में साफ़-सफाई और सौंदर्यबोध को खासा स्थान प्राप्त है इसीलिए अनवरत हरे रंग के बीच जहाँ कहीं कोई घर दिखाई देता तो उसका रंग विधान बचपन के खिलौने जैसा आकर्षित करता था। रास्ते की इस ख़ूबसूरती को आँखों में भरते हुए हम तिनसुकिया पहुँच गए।
आयोजन मंडल के सदस्यों का व्यावहार कंचन में सुगंध का प्रतिमान बन रहा था। उत्तर भारत के शेष क्षेत्र की अपेक्षा इस क्षेत्र में सूर्य काफी पहले उग जाता है इसलिए सूरज की ड्यूटी के घण्टे भी शाम 4-5 बजे तक समाप्त होने लगते हैं। इस स्थिति के कारण कवि-सम्मेलन का समय भी जल्दी का ही था। शहर के एक शानदार हॉल में कवि-सम्मेलन हुआ। हम पाँच कवियों के लिए ढाई घण्टे का कार्यक्रम तय था लेकिन साढ़े तीन घण्टे बाद भी सायास कवि-सम्मेलन समाप्त करना पड़ा। श्रोताओं ने सेल्फियाँ खिंचवाते समय यह सुखद शिकायत की कि मन नहीं भरा!
सफल कार्यक्रम से ऊर्जा द्विगुणित करके भोजन आदि के बाद हम सो गए और अगली सुबह जब आँख खुली तो देखा कि कोई मेरे कमरे की खिड़की पर बूंदों से म्यूरल पैटर्न की चित्रकारी कर गया था। बादलों ने सूर्य की किरणों का रास्ता रोक रखा था लेकिन उजाला, शीशे पर बिखरी बूंदों को यह संदेश सुना रहा था कि दिन निकल आया है।
बिस्तर पर अलसाया हुआ मैं प्रकृति के इस संचार को भोग ही रहा था कि फोन की घंटी मुझे भौतिक जगत् में लौटा लाई।
मनोज मोदी जी का फोन था कि होटल से अशोक बाज़ारी
जी के घर नाश्ता करके, वहीं से घूमने निकलना है। मैं जल्दी से तैयार होकर लॉबी में आया तो दिनेश बावरा पहले से गाड़ी में बैठे थे। वे पर्यटन पर नहीं जा रहे थे ब्लकि नाश्ता करके सीधे एयरपोर्ट की ओर निकलने वाले थे। भुवन मोहिनी जी की फ्लाइट दोपहर में थी इसलिए वे भी थोड़ी देर घूम फिर कर प्रस्थान करने वाली थीं।
मैं पिछले दो महीने में तीसरी बार इस क्षेत्र में आया था और यहां के मौसम और सौंदर्य से आकृष्ट था इसलिए सोच-समझकर इस बार पर्यटन का प्लान बनाकर आया था।
अशोक जी के घर बेहतरीन मारवाड़ी नाश्ता करने के बाद मोदी जी मुझे, भुवन को और बाबू जी को अपने घर ले आए। मोदी जी का घर एक अच्छा ख़ासा बंगला है। बाहर गार्डन में सुपारी और आम जैसे वृक्षों के साथ एक मुकम्मल किचन गार्डन था। बरसात लगातार जारी थी सो मौसम और मौके का सम्मान करते हुए मोदी जी ने हमें अपने गार्डन के भुट्टे खिलाए। फिर हमने उनके ख़ूबसूरत बगीचे में खूब फोटोग्राफ़ी की।
यहाँ से हम एक चाय बागान की ओर चले। ढाई फुट के चाय के पौधों की सलीके से लगी हुई क्यारियों के बीच हमने ख़ूब मस्ती की। मैंने चाय की शायरी का प्रयोग करते हुए चाय के महत्व पर एक वीडियो बनाया। अनियोजित वीडियो में सद्य बोला गया वॉयस ओवर चाय पर एक बेहतरीन ललित निबंध जैसा बन गया।
घड़ी देखी तो भुवन मोहिनी जी को फ्लाइट का टाइम ध्यान आया। बेमन से उन्हें पर्यटन का सुख छोड़कर प्रस्थान करना पड़ा। उनके रवाना होने पर हम मनोज मोदी जी के साथ अरुणाचल प्रदेश के लिए निकल गए। तिनसुकिया से बाहर आते-आते हम एक ऐसी सड़क पकड़ चुके थे जिसके एक और रेल लाइन थी और दूसरी ओर जंगल। जहाँ कहीं बस्ती दिखाई देती वहां जंगल कुछ पीछे चला जाता था लेकिन रेल लाइन ने सड़क का साथ नहीं छोड़ा।
पचास किलोमीटर के करीब इस अलौकिक सौंदर्य को निहारते हुए हम अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर पहुंच गए। अरुणाचल में देश के अन्य भागों की तरह फ्री एंट्री नहीं है। इस राज्य में प्रवेश करने के लिए अनुमति की कुछ औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ती हैं। मोदी जी गाड़ी से उतरकर यह प्रक्रिया पूरी करके आए और हम सूर्योदय के प्रदेश में प्रविष्ट हो गए। नाप-तोल कर बनाई गई सड़क के दोनों ओर शालीनता से खड़े पेड़ जब ऊपर ही ऊपर एक दूसरे से गले मिलते थे तो सड़क के ऊपर किसी गुफा जैसा दृश्य बन जाता था।
इस वर्णनातीत दृश्य से गुज़रते हुए हम गोल्डन पैगोडा पहुँचे। मोदी जी पार्किंग में गाड़ी लगा रहे थे और मैं स्वर्णद्वार के सम्मुख खड़े बौद्ध भिक्षुओं को निहार रहा था। छोटे-छोटे बालकों से लेकर कैशोर्य और यौवन की देहरी को छू रहे ये लामा गहरे लाल और गहरे पीले रंग के चोगे में दिव्य लग रहे थे। संन्यास के तेज और तथागत के पथ की शांति से इनका सौंदर्य दिव्य हो गया था। बुद्ध पूर्णिमा के दिन इस स्थान पर आने का संयोग आनंद में वृद्धि कर रहा था।
हमने टिकट लेकर तीर्थ परिसर में प्रवेश किया। बहुत करीने से संजोए गए बड़े से बगीचे के बीच चारों ओर से एक जैसा दिखने वाला एक विशाल मंदिर था जिसमें बुद्ध का भव्य स्वर्णबिम्ब विद्यमान था। मंदिर के चारों प्रवेश द्वार चीनी शैली के सिंह बिम्ब से अलंकृत थे। बाहर एक बड़े से तालाब में बुद्ध विराजित थे। बारिश की बूँदें जब तालाब के पानी में गिरती थीं तो एक गोल दायरा बनता जो बुद्ध की मूर्ति तक जाकर विलीन हो जाता था। यह दृश्य ‘ध्यान’ विधि के साकार कर रहा था। विचारों की तरह अनवरत उपजते दायरे निमीलित नयन युक्त ध्यानस्थ योगी तक पहुँच कर विलीन हो रहे थे। मैं अपलक इस दृश्य से बंधने लगा। क्षण भर के लिए बारिश की बूंदों की अनुभूति विस्मृत हो गई थी। क्षण भर के लिए मन विचारशून्य होकर तथागत के बिम्ब का स्पर्श कर आया था। नयन खुले थे किंतु दृश्य गौण हो रहे थे। कान उपस्थित थे किंतु ध्वनि शून्य हो गई थी। देह जिवित थी किंतु स्पर्श विलीन हो गया था… क्षण भर में असीमित ऊर्जा बटोरकर मेरी तन्द्रा टूट गई।
अनुभव की जिस वीथि में मैं क्षण भर विचरने लगा था, वह लिखने का समय सम्भवतः इस जीवन में मैं न जुटा सकूँगा। बस इतना कह सकता हूँ कि ध्यान के इस स्वर्णिम सम्मोहन ने क्षण भर में मुझसे मेरा मन ठग लिया था।
स्वयं को संयत करने के उद्देश्य से मैंने वहाँ से एक फेसबुक लाइव किया और इस परिसर को डिजिटल तकनीक में सहेजकर वापिस गाड़ी में आकर बैठ गया। भौगोलिक स्थिति के कारण दोपहर ढल चुकी थी और रात हुई नहीं थी। इतनी लंबी शाम का यह मेरा पहला अनुभव था। पूरा रास्ता शाम में ही बीता। रास्ते में मोदी जी ने अपनी चाय फैक्ट्री दिखाई। चाय बनने की प्रक्रिया जानकर बहुत अच्छा लगा। हरी पत्तियों के काले दानों में बदल जाने की पूरी प्रक्रिया देखकर विकास की आवश्यकता तथा साधना का अर्थ समझ आया।
तिनसुकिया पहुँचकर हमने सुमित खेतान जी, अशोक बाज़ारी जी और मनोज मोदी जी के साथ स्वादिष्ट भोजन किया, अपनी-अपनी अटैची की क्षमता के अनुसार चायपत्ती के पैकेट बटोरे और सो गए।
सुबह-सुबह हवाई अड्डे के लिए निकल लिए हैं। असम की संस्कृति, अरुणाचल का सौंदर्य और राजस्थानी लोगों के मीठे अपनत्व की संगत… ऐसा लग रहा है जैसे मेरा मन कालबेलिया की धुन पर बीहु नृत्य करके लौटा हो।

✍️ चिराग़ जैन

डिब्रूगढ़ की पहली यात्रा

दिल्ली से उड़कर डिब्रूगढ़ एयरपोर्ट पर लैंड किया तो जहाज की खिड़कियों पर पानी की बून्दों ने चित्रकारी कर दी थी। बाहर झाँकने पर एहसास हुआ कि यहाँ दिल्ली जैसी गर्मी का नामो-निशान नहीं है, बल्कि बादलों की मेहरबानी से मौसम गुलाबी नमी से महक उठा है।
हवाई अड्डे से बाहर निकलने तक हमें अगले ही दिन की वापसी के निर्णय पर पछतावा हो रहा था। द्वार पर आयोजकगण स्वागत के लिए तैयार खड़े थे। हवाई अड्डे से शहर की ओर बढ़े तो चाय के बागानों की ख़ूबसूरती और ख़ुशगवार मौसम की हरितिमा आँखों के रास्ते मन में आक्सीजन भर रही थी।
डिब्रूगढ़ शहर की मुख्य सड़क के बीचोबीच ट्रेनलाइन बिछी हुई है। लाइन के एक ओर ट्रैफिक चलता है और दूसरी ओर छोटे-छोटे लेकिन ख़ूबसूरत घर हैं। आम और रुद्राक्ष के पेड़ों पर आया हुआ बौर माहौल के हरेपन को और आकर्षक बना रहा है। हवा की आर्द्रता के कारण प्रत्येक वृक्ष के तने और शाखाओं पर छोटी लताओं जैसे कुछ शैवाल उग आए हैं, जिनसे हर पेड़ की लकड़ी ने हरी चूनरी से अपना तन ढँक लिया है। इस श्यामला प्रकृति को गाड़ी की खिड़की से अपनी आँखों में भरता हुआ मन अघाता ही न था कि गाड़ी अचानक मुख्य सड़क छोड़कर एक गली में मुड़ गयी और पार्किंग में खड़ी हो गयी।
आयोजक हमें गाड़ी से उतारकर एक बांध की सीढ़ियां चढ़ने लगा। ज्यों ही हमने अंतिम सीढ़ी पार की तो हम एक ऐसे स्थान पर पहुँच गये जहाँ से हमारे और क्षितिज के मध्य जल ही जल दिखाई देता था। यह ब्रह्मपुत्र का वैभव था। अथाह जलराशि का मार्ग बना यह महानद अब से पूर्व केवल चित्रों में ही देखा था। एकाध बार गुवाहाटी में इसके दर्शन हुए लेकिन हर बार शाम के धुंधलके में ही इसके दर्शन हुए इसलिए इसकी भव्यता का सही अनुमान न हो सका था। आज अनेक देशों से गुज़रने वाले ब्रह्मपुत्र के साक्षात्कार का सौभाग्य मिल रहा था। नदी के विशाल पाट को लेकर जितनी कल्पनाएँ की जा सकती थीं, सब छोटी पड़ रही थीं।
कुछ देर इस दृश्य का भोग करके हम वापस गंतव्य की ओर बढ़ चले। साथ चल रही ट्रेन लाइन का डेड एन्ड आ गया। आयोजक ने बताया कि इसके आगे रेलमार्ग समाप्त हो जाता है। ठीक इस डेड एन्ड के सामने डिब्रूगढ़ जिमखाना क्लब था।
चेकइन करने का बाद भोजन आदि करके हमने एक घण्टा विश्राम किया। बारिश की हल्की फुहारें अनवरत जारी थीं। शाम को तिनसुखिया से कुछ मित्र मिलने आ गये और फिर कवि-सम्मेलन के लिए बुलावा आया गया। सवा आठ बजे से सवा दस बजे तक लगातार ठहाकों और तालियों का लास्य हुआ। तकनीक का सुफल यह था कि जिस शहर में मैं पहली बार गया था, वहाँ भी श्रोतादीर्घा से कविताओं की फरमाइश आ रही थी। आयोजकों ने हमें बताया कि इस क्लब में इतनी बड़ी संख्या में श्रोता पहली बार आए हैं और इतनी देर तक पहली बार कोई कार्यक्रम चला है। हमने भी हँसते हुए उन्हें बताया कि हमने भी बहुत दिन बाद इतना लम्बा-लम्बा काव्यपाठ किया है।
एक ओर अरुण जी सेल्फियों से घिरे हुए थे, दूसरी ओर मेरे साथ भी फ़ोटो खिंचवाने वाले पर्याप्त संख्या में जुटे हुए थे। थोड़ी-सी देर का यह सेलिब्रिटिज़्म जीने के बाद हम अपने कमरे में आकर सोने की तैयारी करने लगे।
सामने खिड़की के शेड से टपकती पानी की बून्दों और शेड पर पड़ती बारिश के संगीत से माहौल रूमानी हो चला था। बरसाती रात के गहरे अंधेरे में दूर किसी हैलोजन पिलर पर झिलमिलाती बरखा से रूसी उपन्यासों की फीलिंग आ रही थी।
इस बरसाती ख़ुशबू को आँखों से भोगते हुए न जाने कब आँख लग गयी। सुबह अलार्म ने बताया कि हवाई अड्डे का जहाज हमारे मूड की परवाह किये बिना उड़ सकता है। अरुण जी ने नाश्ता ऑर्डर किया और हम दोनों जल्दी-जल्दी तैयार होकर हवाईअड्डे पहुँचे।
अभी अड़तीस हज़ार फीट की ऊँचाई पर मेरे दाहिनी ओर हिमालय का वैराट्य बाँहें फैलाए खड़ा है। सूर्य की किरणों ने हिमशिखरों को चूमकर गुलाबी कर दिया है। बादलों की अनेक परतों को पार कर हिमगिरि के उत्तुंग शिखर ऊपर निकल आए हैं। ऐसा जान पड़ता है, मानो कोई लजीला किशोर उचक-उचक कर अपनी प्रियतमा रश्मियों को देखने की कोशिश कर रहा है। प्रकृति की इस असीम अनुभूति में मैं इंडिगो के जहाज की खिड़की वाली सीट पर बैठा मनुष्य के बौने सामर्थ्य को अनुभूत करते हुए विज्ञान की कोशिशों का धन्यवाद कर रहा हूँ।

✍️ चिराग़ जैन

एक सुबह पतझड़ की…

मौसम बदल रहा है। जो हरापन पेड़ की शाखा से नीचे नहीं उतरता था, वह सूखकर ज़मीन पर आ गिरा है। मुसाफ़िरों के पैरों तले कुचलकर चूरा हुए जाते इस युग को रोज़ सवेरे एक झाड़ू से सकेरकर ढेर घोषित कर दिया जाता है।
हवा का कोई झोंका इन्हें छेड़ देता है तो इनसे सरगम नहीं फूटती, बल्कि खड़खड़ाहट का चिड़चिड़ा शोर गूंजता है।
कोई सूखा पत्ता अपनी दुर्दशा से नज़र बचाकर डाल की ओर देख ले तो उसे वहाँ अपनी जगह कोई नया शोहदा बैठा दिखाई देता है। ऐसा जान पड़ता है जैसे कोई कल का छोकरा लाल कमीज़ पहनकर उसके तख़्त पर धरा गया है। उसके इस लाल जलवे से डाल झूम उठी है। बल्कि यूँ कहें कि डाल भी उसके रंग में रंगकर लाल हो उठी है। डाल ही क्यों, पूरा पेड़ लाल हो उठा है। सूखे पत्ते की आँखें भी लाल हो गयी हैं।
डाल पलटकर अपने अतीत की ओर देखने को भी तैयार नहीं है। वह नये पत्तों की ख़ुशबू से प्रसन्न है। संवेदना ने कान लगाकर सुना तो सूखे पत्तों की खड़खड़ाहट में आक्रोश और करुणा से भरी एक चीख़ सुनाई दी। मैंने इस चीख़ का लिप्यान्तरण करने की कोशिश की तो ‘खच… खच… खच…’ जैसा शब्द काग़ज़ पर उतर आया।
डाल के लाल सिंगार और धरती से टकराती इस करुण पुकार से साक्षात्कार करके लौटने लगा तो वर्मीकम्पोस्ट का एक प्लांट दिखाई दिया। जहाँ लाल रंग से त्रस्त इन सूखे पत्तों को लाल-लाल केंचुओं के हवाले कर दिया जाता था। एक होदी में तैयार खाद भरी हुई थी, मानो प्रकृति ने सूखे पत्तों की राख किसी कलश में भरकर रखी हो।
इस खाद को कल कोई माली उन्हीं पेड़ों की जड़ों में डाल देगा, जिनकी डाल पर कभी इनका शासन चलता था। और तब ये छोटे-छोटे कण, सूखे पत्तों को बताएंगे कि जब तुम लाल कमीज़ पहनकर डाल पर इतरा रहे थे तब हम ज़मीन पर घिसटते हुए तुम्हें अपलक निहार रहे थे। इसलिए जाओ, खाद बनो और अपने आपको इन जड़ों में समर्पित कर दो ताकि कल फिर किसी डाल पर लाल हरियाली बनकर इतरा सको!
विचार की इस यात्रा से मेरे मन में पनपा अवसाद धुल गया और मैं डाल पर थिरकते लाल-लाल पत्तों की चमक में ज़मींदोज़ पत्तों का भविष्य देखकर खिल उठा। मेरे पैरों के नीचे अब भी कुछ सूखे पत्ते दब रहे थे, लेकिन अब उनसे आवाज़ आ रही थी- ‘सच…सच…सच…!’

✍️ चिराग़ जैन

कविता की नयी पौध

मुझे प्यार करनेवालों का कहना है कि मैं बहुत अच्छा लिखता हूँ। सुनकर अच्छा लगता है। मेरे अपनों का मानना है कि मैं सबसे अच्छा लिखता हूँ। सुनकर आश्वस्ति होती है कि मेरे पास मुझे ‘अपना’ माननेवाले ख़ूब लोग हैं। मेरे पाठकों का कहना है कि मुझ जैसा कोई नहीं लिख सकता। सुनकर एक मीठा-सा अहंकार उपजता है।
इस अहंकार में जब मैं अन्य ‘अच्छा लिखनेवालों’ की वॉल पर जाता हूँ तो मेरे भीतर उपजता अहंकार का अंकुर क्षण भर में सूख जाता है। आयु में मुझसे दस-बारह वर्ष कम रहकर भी कुछ लोग इतना श्रेष्ठ लेखन करते हैं कि कई बार अपना समस्त लेखन निरर्थक जान पड़ता है।
पिछले दिनों फेसबुक पर संजू शब्दिता को पढ़ा। उनकी वॉल विचार के खोजियों के लिए ख़ज़ाना हाथ लगने जैसा अनुभव है। हर पोस्ट में दो मिसरे हैं और हर मिसरे में आपको सुखद आश्चर्यबोध से भर देने का सामर्थ्य है। चूँकि मैं सर्वज्ञ नहीं हूँ अतः यह तो नहीं लिख सकता कि वे इस दौर की सर्वश्रेष्ठ शायरा हैं, लेकिन इतना अवश्य लिख सकता हूँ कि किसी विचार को जिस नज़रिए से संजू ग़ज़ल तक लाती हैं, वैसा नज़रिया मेरे संज्ञान में अन्यत्र कहीं नहीं मिला। पीड़ा की ख़ुद्दारी और निर्वेद की स्थिति तक दार्शनिक होती हुई इनकी शायरी बड़े-बड़े सुख़नवरों के लिए सोच के नये रास्ते खोलती है। ईमानदारी से कहूँ तो संजू शब्दिता वे पहली लेखिका हैं, जिनके कुछ अशआर से मुझे ईर्ष्या हुई कि काश यह बात मैंने कही होती।
उधर एक रचित दीक्षित हैं। ये शख़्स इस दौर का औघड़ है। कबीर जैसा बेलाग। मन के भीतर जो बात, जिस शब्दावली में उतरती है; उसे जस का तस काग़ज़ पर उतार देता है। तेवर ऐसा कि उसकी छोटी सी कविता बिना म्यान के नश्तर की तरह सीधे अवधान के आर-पार हो जाती है। नैतिकता और सामाजिकता की रस्म निभाती मान्यताएँ यकायक मनुष्यता की एक सपाटबयानी के आगे बौनी सिद्ध हो जाती हैं। बहुत समय बाद रचित के रूप में एक ऐसा कवि पढ़ने को मिला है, जो जन-मान्यता के अनुरूप नहीं मन-मान्यता के अनुरूप शब्द गढ़ता है।
एक नन्हीं-सी बालिका है इति शिवहरे। भाषा के जिस मुहावरे से स्वयं भाषाविद पल्ला झाड़ चुके थे, उस प्रांजल शब्दावली को बहते पानी की रवानी बना देती है अपने गीत में। उसे पढ़ता हूँ तो अनुभूत कर पाता हूँ कि क्लिष्ट शब्दावली से रसास्वादन करनेवाला मेरे भीतर का पाठक इस समय में कहीं पूर्ण तृप्त हो सकता है तो वह इति की लेखनी है। फोन पर बात की तो पाया कि उसकी आवाज़ ने अभी बचपन की देहरी पार नहीं की है लेकिन उसकी शब्दावली प्रौढ़ता की भी दूसरी पीढ़ी के पार पहुँच गयी है। इति को पढ़कर हमेशा यही दुआ की है कि काश ईश्वर समाज के भाषा संस्कार को इस योग्य बनाए कि इस बच्ची को अपनी भाषा का सरलीकरण करके साहित्य रचने पर विवश न होना पड़े।
एक स्वधा रवीन्द्र जी हैं। उनकी लेखनी से साक्षात्कार किया तो एकाध गीत तक तो ऐसा लगा कि हाँ, हो गया होगा किसी पुण्य के फल से कोई एकाध गीत। लेकिन ज्यों-ज्यों स्क्रोल करता गया… मन किसी अदृश्य शिकंजे में जकड़ता चला गया। भाव की ऐसी तरलता कि गीत यकायक पढ़नेवाले के चेहरे की भंगिमा से अठखेलियाँ करने लगे। अलक, भृकुटि, ओष्ठ-अन्त, नथुने, कण्ठ, नयनकोर… एक-एक अंग-उपांग उनके गीत की भावभूमि के पर्यटन पर निकल जाए। वे अक्सर मुझे ‘बालक’ कहकर संबोधित करती हैं। लेकिन उन्हें पढ़कर लगता है कि उन पर सरस्वती की जितनी कृपा है उसके अनुरूप उनका यह संबोधन ही मुझे वाग्देवी से कुछ आशीष दिला देता होगा।
एक वाशु पाण्डेय। शायरी करता है। ग़ज़ल के व्याकरण और कथ्य दोनों को पूरी शिद्दत से साधता हुआ यह नौजवान ज़िन्दगी में सर्वाधिक मुहब्बत क़लम से ही करता है। उससे कभी बतियाने की कोशिश करेंगे तो उसकी हर बात में शायरी मिल जाएगी। जज़्बा ऐसा कि जैसे एक दिन पूरे ज़माने को अपने जैसा बनाकर ही दम लेगा। तबीयत ये कि जो बात हमारे दिल में आ गयी उसे ठीक वैसे ही न कहा तो काहे के शायर। वाशु के ढेर सारे अशआर कब मेरी बातचीत को प्रभावी बनाने के काम आने लगे… मुझे पता ही नहीं चला। उसकी शायरी को पढ़ते हुए ऐसा कई बार लगा है कि इस उम्र में ये हाल है तो दस-बीस साल बाद ये लड़का क्या करेगा!
आप भी कभी फ़ुर्सत निकालकर इन सबको पढ़ लें और फिर मुझे बताएँ कि इनमें से किसी के विषय में ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर तो नहीं लिख दिया। तब तक मैं अपने अहंकार को ध्वस्त करने के लिए क़लम के और सितारों की तलाश जारी रखूंगा।

✍️ चिराग़ जैन

डॉ कुमार विश्वास

अप्रैल 2002 में मैंने कवि-सम्मेलनों में कविता पढ़ना प्रारम्भ ही किया था कि रोहिणी (दिल्ली) के एक कवि-सम्मेलन में एक पतले-दुबले कवि के दर्शन हुए। देहयष्टि प्रभावी नहीं थी लेकिन उनके भीतर के कवित्व और आँखों के सम्मोहन से मैं अछूता न रह सका।
मुझे याद है कि उस दिन उस मंच का संचालन भी उन्होंने ही किया था। छोटे माइक पर अर्द्ध-पद्मासन लगाकर जब वे मसनद पर विराजित हुए तो ऐसा लगा कि विद्वत्ता साकार होकर मंच का मोर्चा संभाल रही है। मुखर हुए तो ऐसा लगा जैसे शब्दों का प्रक्षालन करके उन्हें साधकर प्रस्तुत करने का आदेश पालन हो रहा हो। कवि-सम्मेलन के बीच जहाँ कहीं हास्य का प्रसंग हुआ तो उनकी भाव-भंगिमा में शरारत घुल गयी।
उस दिन मैंने उन्हें बहुत देर तक देखा और व्यंजना से आच्छादित उनके व्यक्तित्व और प्रेम की विरह धारा से निर्मित उनके कृतित्व में एक संपूर्ण कवि को अनुभूत किया। उस दिन के बाद लम्बे समय तक उनकी संगत हुई।
उनका सान्निध्य मेरे भीतर करवट ले रहे ‘कवि’ को रोचक लगने लगा। यह दौर उनके संघर्ष का भी दौर था। संघर्षशील व्यक्ति से अधिक समृद्ध गुरुकुल कोई नहीं हो सकता। सो मैं उनकी ख़ूब संगत करता और विपरीत परिस्थितियों में उनके निर्णयों की सफलता और विफलता से जीवन का पाठ पढ़ता रहता।
किसी का आकलन करना मेरी प्रवृत्ति का अंश नहीं है, सो उनकी गतिविधियों और क्रियाकलापों को कभी सही और ग़लत के तराजू में तोलने की मैंने आवश्यकता महसूस नहीं की। मेरा मत है कि हर व्यक्ति एक ‘प्रवृत्ति’ होता है, और प्रवृत्ति कभी नहीं बदलती। इसी कारण उनके साथ बिताए लंबे-लंबे दिन और रात में मैं कभी परीक्षक बनकर नहीं, केवल शिक्षार्थी बनकर उपस्थित रहा।
अपनी भरपूर मेधा और शब्द-मंजुषा से उन्होंने मुझे ख़ूब निहाल किया। मैंने देखा कि संघर्ष से उपजने वाली खीझ से आँखें नम करने की बजाय दंतपंक्ति को आपस में रगड़ लेना अधिक कारगर सिद्ध होता है। मैंने देखा है कि जब परिस्थितियाँ चारों ओर से आघात कर रही हों तो थककर बैठ जाने की बजाय टूटे रथ का पहिया उठाकर जूझ जाने में सफल होने की गुंजाइश बची रहती है। मैंने देखा है कि उन्होंने रथ का पहिया उठाकर दर्जनों चक्रव्यूह भेदे हैं।
जो किसी का बुरा नहीं होता वह निष्क्रिय होता है। जो सक्रिय होगा उसे आलोचना मिलेगी ही मिलेगी। लेकिन अपनी आलोचना से बिलबिलाने की बजाय दोगुनी ऊर्जा से जुटे रहना किसी को कुमार विश्वास बना सकता है।
राजनैतिक जीवन हो अथवा साहित्य जगत्… डॉ कुमार विश्वास ने बुलेटिन भर-भर आलोचना झेली है। सोशल मीडिया के ट्रोलर्स की चोट सहना आसान नहीं होता। डॉ विश्वास ने वह चोट बार-बार भोगी है। जब किसी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व की निंदा की कोई उचित दर दुकान नहीं मिलती तो निंदक उसकी निजता के गोदाम में प्रवेश करके ‘नियरे’ आने का प्रयास करने लगते हैं। ऐसी परिस्थिति में भी उन्होंने न तो जनता की सिम्पैथी से उन्हें खदेड़ा न ही गोदाम पर ताला लगाया… बल्कि भरे गोदाम में उन्हें रीते हाथ बाहर लौट आने पर विवश कर दिया।
2002 से 2022 तक के इस लंबे सफ़र में मैंने उनका अपनत्व और परायापन… दोनों भोगे हैं, लेकिन इस परायेपन में भी मैंने उनसे यह सीखा है कि एक फोन कॉल से किसी भी पराएपन को अपनत्व में बदला जा सकता है।
मेरे एक शे’र को दुबई के मुशायरे में उद्धृत करके डॉ कुमार विश्वास ने मुझे यह सौभाग्य दिया है कि मुझे अज़ीम शायर जनाब अहमद फ़राज़ ने फोन करके आशीष दिया। इस बात के लिये मैं उनका कृतज्ञ हूँ। मेरी एक क्षणिका की घुमावदार पगडण्डी को उन्होंने न जाने कितने ही लोगों तक पहुँचाया इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ। उनसे नाराज़ भी बहुत कारणों से रहता हूँ, लेकिन वह हमारी निजता का विषय है…!

✍️ चिराग़ जैन

डॉ अशोक चक्रधर

हिन्दी की वाचिक परम्परा में अनेक विभूतियों का संसर्ग मिला है। मंच पर सक्रिय होने के कारण ऐसे अनेक सितारों को स्पर्श करने का अवसर मिला है जिन्हें हमेशा दूर से ही देख सका था।
ऐसे ही एक दीप्त नक्षत्र हैं- डॉ अशोक चक्रधर। कवि-सम्मेलनीय व्यस्तताओं के बीच अनवरत सृजन तथा शोध में संलग्न रहने का फ़ार्मूला क्या है -यह मैंने अशोक जी से सीखा। उनसे मिलने पर ज्ञात हुआ कि हमें जीवन का एक क्षण भी व्यर्थ करने के लिए नहीं मिला है। इसीलिए बहु-अवधान का कौशल विकसित किये बिना एक ही जीवन में ढेर सारे काम करना सम्भव नहीं है।
सामान्यतया कवि-सम्मेलनीय यात्राओं में हम लोग बातचीत और हँसी-ठट्ठा करके समय काटते हैं, लेकिन अशोक जी ज्यों ही यात्रा में निकलते हैं तो वे अपने तीन संस्करण बना लेते हैं। पहले क्लोन का काम होता है कि साथ के कवियों की बातचीत को सुनते हुए बीच-बीच में हुंकारा भरकर उसमें अपनी उपस्थिति बनाए रखे और आवश्यक होने पर उसमें पूरे मनोयोग से सम्मिलित भी हो। ठीक इसी समय में दूसरे क्लोन को प्रशंसकों की मुस्कान का प्रत्युत्तर देते हुए सेल्फ़ी और ऑटोग्राफ आदि में संलग्न रहना होता है। और इसी के समानांतर तीसरे अशोक जी अपने आईपैड या मोबाइल पर कोई लेख, स्क्रिप्ट, कविता या कांसेप्ट लिखने में जुटे रहते हैं।
इस प्रकार एक ही समय में अपने मस्तिष्क को तीन अलग-अलग दायित्वों में लगाकर वे हर पल तिगुना जीवन जी रहे होते हैं।
सृजनशील रहना या काम करना सामान्यतया लोगों की विवशता होती है। कुछ लोग इसे शौक़ बना लेते हैं और बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जिन्हें काम करने का रोग हो जाता है। अशोक जी, ये तीसरी तरह के लोगों में हैं। काम करने का रोग इतना भयावह है कि उसमें अपनी मानसिक पीड़ा तो दूर, दैहिक रोग भी दिखाई देना बंद हो जाता है।
अभी हाल ही में एक दुर्घटना के कारण उनके उत्तरदायी कंधों में कुछ टूट-फूट हो गयी। कंधे का अस्थिभंग जब टीसता है तो दुनिया के समस्त कार्य अनावश्यक लगने लगते हैं। इस बात को अनुभूत करके मैंने और अन्य कवियों ने उनका हालचाल जानने के लिए भी उन्हें कम-से-कम ही फोन मिलाया कि कहीं फोन उठाने में उन्हें कष्ट न सहना पड़े। लेकिन इस एकांत का लाभ उठाकर अशोक जी ने आईसीयू में लेटे-लेटे अपने आईपैड पर अपनी नातिन के जन्मदिन की शानदार किताब तैयार कर दी।
कविग्राम में उनका एक नियमित स्तम्भ प्रकाशित होता है। गत माह उन्हें तीसरी लहर के कोरोना ने जकड़ लिया और उनके ज्वर का पारा ऊर्ध्वगामी हो गया। 20 जनवरी को मैंने उन्हें कहा कि इस बार आपके स्तम्भ के बिना अंक निकाल लेंगे, और मैं सम्पादकीय टिप्पणी में स्तम्भ प्रकाशित न होने की कोई वजह लिख दूंगा। लेकिन अशोक जी को मेरी बात अच्छी न लगी। उन्होंने मुझे कहा कि महीने की आखि़री तारीख़ तक रुक जाओ, तब तक न लिख सका तो तुम निर्णय ले लेना। मैंने पत्रिका पूरी तरह तैयार करके रख ली और 31 जनवरी को यह सोचकर उसे फाइनल पैक कर दिया कि अब अशोक जी का लेख नहीं छप सकेगा। उन्हें फोन करने से इसलिये बच रहा था कि कहीं वे लिखने का दबाव न महसूस करें। लेकिन 31 जनवरी की सुबह 10 बजे उनका फोन आया कि उन्होंने स्तम्भ लिखकर भेज दिया है। फोन पर अपनी सद्य-सृजनोपरांत उपजने वाले उत्साह के साथ उन्होंने स्तम्भ के कुछ अंश पढ़कर भी सुनाए।
वे स्तम्भ सुना रहे थे और मैं उनके बुखार का ताप महसूस कर रहा था। उस दिन मैंने एक बार फिर सीखा कि सृजनशील व्यक्ति को स्वस्थ होने के लिए आराम की नहीं काम की ज़रूरत होती है।
आज पद्मश्री डॉक्टर अशोक चक्रधर का जन्मदिन है। अपने कंधे की पीड़ा को अंगरखे से ढाँप कर वे उसी कंधे पर अपनी गर्दन टिकाए जन्मदिन की बधाइयों का मुस्कुराते हुए उत्तर दे रहे होंगे।

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भाषा से खेलने का अधिकार केवल उसे प्राप्त है, जिसने भाषा की आत्मा को स्पर्श करके उसकी संवेदना के सबसे महीन तंतुओं को महसूस किया हो। शब्द का सिंगार करके उसकी अर्थ-व्यवस्था को बलवती बनानेवालों को भाषा की समृद्धि का श्रेय मिलता है।
आदरणीय डॉ अशोक चक्रधर, उन एकाध हिंदीभाषियों में से एक हैं, जो इस श्रेय के सम्यक अधिकारी हैं। किसी कवि की रचनाधर्मिता जब कविता गढ़ते-गढ़ते, शब्द भी गढ़ने लग जाए तो यह इस बात की सूचना है कि उसकी सर्जना अपनी भाषा के शब्दकोश की सीमा के पार निकल गई है। यह इस बात का प्रमाण है कि उसकी भावभूमि के लिए भाषा में उपलब्ध शब्दों का आकाश छोटा रह गया है।
इस बिंदु पर कवि कविता के साथ-साथ शब्द रचने लगता है। कभी ये शब्द आस-पड़ोस की भाषाओं से अपनी भाषा के संयोग का प्रतिफल होते हैं, तो कभी अपनी ही भाषा की पुरातन परम्परा से टटोलने पर हाथ लगते हैं, जिन्हें कवि नई साज-सज्जा के साथ पुनः लोकार्पित कर देता है। यही कारण है कि इन शब्दों का कोई विलग शब्दकोश न होने के बाद भी ये बिना समझाए समझ आ जाते हैं। ये शब्द इतने समर्थ होते हैं कि ये न केवल अपना अर्थ स्पष्ट करते हैं, बल्कि अपना सन्दर्भ तक आसानी से समझा देते हैं।
डॉ अशोक चक्रधर के सृजनलोक में ऐसे अनेक शब्द मौजूद हैं जिन्हें किसी विशेष सन्दर्भ के लिए उन्होंने बाक़ायदा रचा है। उनकी अनेक रचनाओं में निरर्थक शब्दों से अर्थ उत्पन्न होता दिखाई देता है। बच्चों की तोतली बोली में शब्द जब अपना रूप बदलकर अष्टवक्र हो जाता है, तब उसके दर्शन को पकड़कर उसे भी लिपिबद्ध करने का सामर्थ्य उनकी अनुभूति को लब्ध है।
वर्तमान में अशोक जी की रचनात्मक चेतना लोक-अभिरुचियों की चिंता से ऊपर उठकर शाश्वत साहित्य की साधना में संलग्न है। यह सृजन की तुरियावस्था है। यहाँ दैहिक पीड़ा, व्याधि, यश, लोभ और लौकिक सफलता की तमाम बेड़ियाँ छूट चुकी होती हैं। यहाँ मनुष्य लोक से मुक्ति पाकर बोध का आनंद भोगने लगता है। यहाँ कवि मुक्तिबोध होने लगता है।

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