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डिब्रूगढ़ की पहली यात्रा

दिल्ली से उड़कर डिब्रूगढ़ एयरपोर्ट पर लैंड किया तो जहाज की खिड़कियों पर पानी की बून्दों ने चित्रकारी कर दी थी। बाहर झाँकने पर एहसास हुआ कि यहाँ दिल्ली जैसी गर्मी का नामो-निशान नहीं है, बल्कि बादलों की मेहरबानी से मौसम गुलाबी नमी से महक उठा है।
हवाई अड्डे से बाहर निकलने तक हमें अगले ही दिन की वापसी के निर्णय पर पछतावा हो रहा था। द्वार पर आयोजकगण स्वागत के लिए तैयार खड़े थे। हवाई अड्डे से शहर की ओर बढ़े तो चाय के बागानों की ख़ूबसूरती और ख़ुशगवार मौसम की हरितिमा आँखों के रास्ते मन में आक्सीजन भर रही थी।
डिब्रूगढ़ शहर की मुख्य सड़क के बीचोबीच ट्रेनलाइन बिछी हुई है। लाइन के एक ओर ट्रैफिक चलता है और दूसरी ओर छोटे-छोटे लेकिन ख़ूबसूरत घर हैं। आम और रुद्राक्ष के पेड़ों पर आया हुआ बौर माहौल के हरेपन को और आकर्षक बना रहा है। हवा की आर्द्रता के कारण प्रत्येक वृक्ष के तने और शाखाओं पर छोटी लताओं जैसे कुछ शैवाल उग आए हैं, जिनसे हर पेड़ की लकड़ी ने हरी चूनरी से अपना तन ढँक लिया है। इस श्यामला प्रकृति को गाड़ी की खिड़की से अपनी आँखों में भरता हुआ मन अघाता ही न था कि गाड़ी अचानक मुख्य सड़क छोड़कर एक गली में मुड़ गयी और पार्किंग में खड़ी हो गयी।
आयोजक हमें गाड़ी से उतारकर एक बांध की सीढ़ियां चढ़ने लगा। ज्यों ही हमने अंतिम सीढ़ी पार की तो हम एक ऐसे स्थान पर पहुँच गये जहाँ से हमारे और क्षितिज के मध्य जल ही जल दिखाई देता था। यह ब्रह्मपुत्र का वैभव था। अथाह जलराशि का मार्ग बना यह महानद अब से पूर्व केवल चित्रों में ही देखा था। एकाध बार गुवाहाटी में इसके दर्शन हुए लेकिन हर बार शाम के धुंधलके में ही इसके दर्शन हुए इसलिए इसकी भव्यता का सही अनुमान न हो सका था। आज अनेक देशों से गुज़रने वाले ब्रह्मपुत्र के साक्षात्कार का सौभाग्य मिल रहा था। नदी के विशाल पाट को लेकर जितनी कल्पनाएँ की जा सकती थीं, सब छोटी पड़ रही थीं।
कुछ देर इस दृश्य का भोग करके हम वापस गंतव्य की ओर बढ़ चले। साथ चल रही ट्रेन लाइन का डेड एन्ड आ गया। आयोजक ने बताया कि इसके आगे रेलमार्ग समाप्त हो जाता है। ठीक इस डेड एन्ड के सामने डिब्रूगढ़ जिमखाना क्लब था।
चेकइन करने का बाद भोजन आदि करके हमने एक घण्टा विश्राम किया। बारिश की हल्की फुहारें अनवरत जारी थीं। शाम को तिनसुखिया से कुछ मित्र मिलने आ गये और फिर कवि-सम्मेलन के लिए बुलावा आया गया। सवा आठ बजे से सवा दस बजे तक लगातार ठहाकों और तालियों का लास्य हुआ। तकनीक का सुफल यह था कि जिस शहर में मैं पहली बार गया था, वहाँ भी श्रोतादीर्घा से कविताओं की फरमाइश आ रही थी। आयोजकों ने हमें बताया कि इस क्लब में इतनी बड़ी संख्या में श्रोता पहली बार आए हैं और इतनी देर तक पहली बार कोई कार्यक्रम चला है। हमने भी हँसते हुए उन्हें बताया कि हमने भी बहुत दिन बाद इतना लम्बा-लम्बा काव्यपाठ किया है।
एक ओर अरुण जी सेल्फियों से घिरे हुए थे, दूसरी ओर मेरे साथ भी फ़ोटो खिंचवाने वाले पर्याप्त संख्या में जुटे हुए थे। थोड़ी-सी देर का यह सेलिब्रिटिज़्म जीने के बाद हम अपने कमरे में आकर सोने की तैयारी करने लगे।
सामने खिड़की के शेड से टपकती पानी की बून्दों और शेड पर पड़ती बारिश के संगीत से माहौल रूमानी हो चला था। बरसाती रात के गहरे अंधेरे में दूर किसी हैलोजन पिलर पर झिलमिलाती बरखा से रूसी उपन्यासों की फीलिंग आ रही थी।
इस बरसाती ख़ुशबू को आँखों से भोगते हुए न जाने कब आँख लग गयी। सुबह अलार्म ने बताया कि हवाई अड्डे का जहाज हमारे मूड की परवाह किये बिना उड़ सकता है। अरुण जी ने नाश्ता ऑर्डर किया और हम दोनों जल्दी-जल्दी तैयार होकर हवाईअड्डे पहुँचे।
अभी अड़तीस हज़ार फीट की ऊँचाई पर मेरे दाहिनी ओर हिमालय का वैराट्य बाँहें फैलाए खड़ा है। सूर्य की किरणों ने हिमशिखरों को चूमकर गुलाबी कर दिया है। बादलों की अनेक परतों को पार कर हिमगिरि के उत्तुंग शिखर ऊपर निकल आए हैं। ऐसा जान पड़ता है, मानो कोई लजीला किशोर उचक-उचक कर अपनी प्रियतमा रश्मियों को देखने की कोशिश कर रहा है। प्रकृति की इस असीम अनुभूति में मैं इंडिगो के जहाज की खिड़की वाली सीट पर बैठा मनुष्य के बौने सामर्थ्य को अनुभूत करते हुए विज्ञान की कोशिशों का धन्यवाद कर रहा हूँ।

✍️ चिराग़ जैन

एक सुबह पतझड़ की…

मौसम बदल रहा है। जो हरापन पेड़ की शाखा से नीचे नहीं उतरता था, वह सूखकर ज़मीन पर आ गिरा है। मुसाफ़िरों के पैरों तले कुचलकर चूरा हुए जाते इस युग को रोज़ सवेरे एक झाड़ू से सकेरकर ढेर घोषित कर दिया जाता है।
हवा का कोई झोंका इन्हें छेड़ देता है तो इनसे सरगम नहीं फूटती, बल्कि खड़खड़ाहट का चिड़चिड़ा शोर गूंजता है।
कोई सूखा पत्ता अपनी दुर्दशा से नज़र बचाकर डाल की ओर देख ले तो उसे वहाँ अपनी जगह कोई नया शोहदा बैठा दिखाई देता है। ऐसा जान पड़ता है जैसे कोई कल का छोकरा लाल कमीज़ पहनकर उसके तख़्त पर धरा गया है। उसके इस लाल जलवे से डाल झूम उठी है। बल्कि यूँ कहें कि डाल भी उसके रंग में रंगकर लाल हो उठी है। डाल ही क्यों, पूरा पेड़ लाल हो उठा है। सूखे पत्ते की आँखें भी लाल हो गयी हैं।
डाल पलटकर अपने अतीत की ओर देखने को भी तैयार नहीं है। वह नये पत्तों की ख़ुशबू से प्रसन्न है। संवेदना ने कान लगाकर सुना तो सूखे पत्तों की खड़खड़ाहट में आक्रोश और करुणा से भरी एक चीख़ सुनाई दी। मैंने इस चीख़ का लिप्यान्तरण करने की कोशिश की तो ‘खच… खच… खच…’ जैसा शब्द काग़ज़ पर उतर आया।
डाल के लाल सिंगार और धरती से टकराती इस करुण पुकार से साक्षात्कार करके लौटने लगा तो वर्मीकम्पोस्ट का एक प्लांट दिखाई दिया। जहाँ लाल रंग से त्रस्त इन सूखे पत्तों को लाल-लाल केंचुओं के हवाले कर दिया जाता था। एक होदी में तैयार खाद भरी हुई थी, मानो प्रकृति ने सूखे पत्तों की राख किसी कलश में भरकर रखी हो।
इस खाद को कल कोई माली उन्हीं पेड़ों की जड़ों में डाल देगा, जिनकी डाल पर कभी इनका शासन चलता था। और तब ये छोटे-छोटे कण, सूखे पत्तों को बताएंगे कि जब तुम लाल कमीज़ पहनकर डाल पर इतरा रहे थे तब हम ज़मीन पर घिसटते हुए तुम्हें अपलक निहार रहे थे। इसलिए जाओ, खाद बनो और अपने आपको इन जड़ों में समर्पित कर दो ताकि कल फिर किसी डाल पर लाल हरियाली बनकर इतरा सको!
विचार की इस यात्रा से मेरे मन में पनपा अवसाद धुल गया और मैं डाल पर थिरकते लाल-लाल पत्तों की चमक में ज़मींदोज़ पत्तों का भविष्य देखकर खिल उठा। मेरे पैरों के नीचे अब भी कुछ सूखे पत्ते दब रहे थे, लेकिन अब उनसे आवाज़ आ रही थी- ‘सच…सच…सच…!’

✍️ चिराग़ जैन

कविता की नयी पौध

मुझे प्यार करनेवालों का कहना है कि मैं बहुत अच्छा लिखता हूँ। सुनकर अच्छा लगता है। मेरे अपनों का मानना है कि मैं सबसे अच्छा लिखता हूँ। सुनकर आश्वस्ति होती है कि मेरे पास मुझे ‘अपना’ माननेवाले ख़ूब लोग हैं। मेरे पाठकों का कहना है कि मुझ जैसा कोई नहीं लिख सकता। सुनकर एक मीठा-सा अहंकार उपजता है।
इस अहंकार में जब मैं अन्य ‘अच्छा लिखनेवालों’ की वॉल पर जाता हूँ तो मेरे भीतर उपजता अहंकार का अंकुर क्षण भर में सूख जाता है। आयु में मुझसे दस-बारह वर्ष कम रहकर भी कुछ लोग इतना श्रेष्ठ लेखन करते हैं कि कई बार अपना समस्त लेखन निरर्थक जान पड़ता है।
पिछले दिनों फेसबुक पर संजू शब्दिता को पढ़ा। उनकी वॉल विचार के खोजियों के लिए ख़ज़ाना हाथ लगने जैसा अनुभव है। हर पोस्ट में दो मिसरे हैं और हर मिसरे में आपको सुखद आश्चर्यबोध से भर देने का सामर्थ्य है। चूँकि मैं सर्वज्ञ नहीं हूँ अतः यह तो नहीं लिख सकता कि वे इस दौर की सर्वश्रेष्ठ शायरा हैं, लेकिन इतना अवश्य लिख सकता हूँ कि किसी विचार को जिस नज़रिए से संजू ग़ज़ल तक लाती हैं, वैसा नज़रिया मेरे संज्ञान में अन्यत्र कहीं नहीं मिला। पीड़ा की ख़ुद्दारी और निर्वेद की स्थिति तक दार्शनिक होती हुई इनकी शायरी बड़े-बड़े सुख़नवरों के लिए सोच के नये रास्ते खोलती है। ईमानदारी से कहूँ तो संजू शब्दिता वे पहली लेखिका हैं, जिनके कुछ अशआर से मुझे ईर्ष्या हुई कि काश यह बात मैंने कही होती।
उधर एक रचित दीक्षित हैं। ये शख़्स इस दौर का औघड़ है। कबीर जैसा बेलाग। मन के भीतर जो बात, जिस शब्दावली में उतरती है; उसे जस का तस काग़ज़ पर उतार देता है। तेवर ऐसा कि उसकी छोटी सी कविता बिना म्यान के नश्तर की तरह सीधे अवधान के आर-पार हो जाती है। नैतिकता और सामाजिकता की रस्म निभाती मान्यताएँ यकायक मनुष्यता की एक सपाटबयानी के आगे बौनी सिद्ध हो जाती हैं। बहुत समय बाद रचित के रूप में एक ऐसा कवि पढ़ने को मिला है, जो जन-मान्यता के अनुरूप नहीं मन-मान्यता के अनुरूप शब्द गढ़ता है।
एक नन्हीं-सी बालिका है इति शिवहरे। भाषा के जिस मुहावरे से स्वयं भाषाविद पल्ला झाड़ चुके थे, उस प्रांजल शब्दावली को बहते पानी की रवानी बना देती है अपने गीत में। उसे पढ़ता हूँ तो अनुभूत कर पाता हूँ कि क्लिष्ट शब्दावली से रसास्वादन करनेवाला मेरे भीतर का पाठक इस समय में कहीं पूर्ण तृप्त हो सकता है तो वह इति की लेखनी है। फोन पर बात की तो पाया कि उसकी आवाज़ ने अभी बचपन की देहरी पार नहीं की है लेकिन उसकी शब्दावली प्रौढ़ता की भी दूसरी पीढ़ी के पार पहुँच गयी है। इति को पढ़कर हमेशा यही दुआ की है कि काश ईश्वर समाज के भाषा संस्कार को इस योग्य बनाए कि इस बच्ची को अपनी भाषा का सरलीकरण करके साहित्य रचने पर विवश न होना पड़े।
एक स्वधा रवीन्द्र जी हैं। उनकी लेखनी से साक्षात्कार किया तो एकाध गीत तक तो ऐसा लगा कि हाँ, हो गया होगा किसी पुण्य के फल से कोई एकाध गीत। लेकिन ज्यों-ज्यों स्क्रोल करता गया… मन किसी अदृश्य शिकंजे में जकड़ता चला गया। भाव की ऐसी तरलता कि गीत यकायक पढ़नेवाले के चेहरे की भंगिमा से अठखेलियाँ करने लगे। अलक, भृकुटि, ओष्ठ-अन्त, नथुने, कण्ठ, नयनकोर… एक-एक अंग-उपांग उनके गीत की भावभूमि के पर्यटन पर निकल जाए। वे अक्सर मुझे ‘बालक’ कहकर संबोधित करती हैं। लेकिन उन्हें पढ़कर लगता है कि उन पर सरस्वती की जितनी कृपा है उसके अनुरूप उनका यह संबोधन ही मुझे वाग्देवी से कुछ आशीष दिला देता होगा।
एक वाशु पाण्डेय। शायरी करता है। ग़ज़ल के व्याकरण और कथ्य दोनों को पूरी शिद्दत से साधता हुआ यह नौजवान ज़िन्दगी में सर्वाधिक मुहब्बत क़लम से ही करता है। उससे कभी बतियाने की कोशिश करेंगे तो उसकी हर बात में शायरी मिल जाएगी। जज़्बा ऐसा कि जैसे एक दिन पूरे ज़माने को अपने जैसा बनाकर ही दम लेगा। तबीयत ये कि जो बात हमारे दिल में आ गयी उसे ठीक वैसे ही न कहा तो काहे के शायर। वाशु के ढेर सारे अशआर कब मेरी बातचीत को प्रभावी बनाने के काम आने लगे… मुझे पता ही नहीं चला। उसकी शायरी को पढ़ते हुए ऐसा कई बार लगा है कि इस उम्र में ये हाल है तो दस-बीस साल बाद ये लड़का क्या करेगा!
आप भी कभी फ़ुर्सत निकालकर इन सबको पढ़ लें और फिर मुझे बताएँ कि इनमें से किसी के विषय में ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर तो नहीं लिख दिया। तब तक मैं अपने अहंकार को ध्वस्त करने के लिए क़लम के और सितारों की तलाश जारी रखूंगा।

✍️ चिराग़ जैन

डॉ कुमार विश्वास

अप्रैल 2002 में मैंने कवि-सम्मेलनों में कविता पढ़ना प्रारम्भ ही किया था कि रोहिणी (दिल्ली) के एक कवि-सम्मेलन में एक पतले-दुबले कवि के दर्शन हुए। देहयष्टि प्रभावी नहीं थी लेकिन उनके भीतर के कवित्व और आँखों के सम्मोहन से मैं अछूता न रह सका।
मुझे याद है कि उस दिन उस मंच का संचालन भी उन्होंने ही किया था। छोटे माइक पर अर्द्ध-पद्मासन लगाकर जब वे मसनद पर विराजित हुए तो ऐसा लगा कि विद्वत्ता साकार होकर मंच का मोर्चा संभाल रही है। मुखर हुए तो ऐसा लगा जैसे शब्दों का प्रक्षालन करके उन्हें साधकर प्रस्तुत करने का आदेश पालन हो रहा हो। कवि-सम्मेलन के बीच जहाँ कहीं हास्य का प्रसंग हुआ तो उनकी भाव-भंगिमा में शरारत घुल गयी।
उस दिन मैंने उन्हें बहुत देर तक देखा और व्यंजना से आच्छादित उनके व्यक्तित्व और प्रेम की विरह धारा से निर्मित उनके कृतित्व में एक संपूर्ण कवि को अनुभूत किया। उस दिन के बाद लम्बे समय तक उनकी संगत हुई।
उनका सान्निध्य मेरे भीतर करवट ले रहे ‘कवि’ को रोचक लगने लगा। यह दौर उनके संघर्ष का भी दौर था। संघर्षशील व्यक्ति से अधिक समृद्ध गुरुकुल कोई नहीं हो सकता। सो मैं उनकी ख़ूब संगत करता और विपरीत परिस्थितियों में उनके निर्णयों की सफलता और विफलता से जीवन का पाठ पढ़ता रहता।
किसी का आकलन करना मेरी प्रवृत्ति का अंश नहीं है, सो उनकी गतिविधियों और क्रियाकलापों को कभी सही और ग़लत के तराजू में तोलने की मैंने आवश्यकता महसूस नहीं की। मेरा मत है कि हर व्यक्ति एक ‘प्रवृत्ति’ होता है, और प्रवृत्ति कभी नहीं बदलती। इसी कारण उनके साथ बिताए लंबे-लंबे दिन और रात में मैं कभी परीक्षक बनकर नहीं, केवल शिक्षार्थी बनकर उपस्थित रहा।
अपनी भरपूर मेधा और शब्द-मंजुषा से उन्होंने मुझे ख़ूब निहाल किया। मैंने देखा कि संघर्ष से उपजने वाली खीझ से आँखें नम करने की बजाय दंतपंक्ति को आपस में रगड़ लेना अधिक कारगर सिद्ध होता है। मैंने देखा है कि जब परिस्थितियाँ चारों ओर से आघात कर रही हों तो थककर बैठ जाने की बजाय टूटे रथ का पहिया उठाकर जूझ जाने में सफल होने की गुंजाइश बची रहती है। मैंने देखा है कि उन्होंने रथ का पहिया उठाकर दर्जनों चक्रव्यूह भेदे हैं।
जो किसी का बुरा नहीं होता वह निष्क्रिय होता है। जो सक्रिय होगा उसे आलोचना मिलेगी ही मिलेगी। लेकिन अपनी आलोचना से बिलबिलाने की बजाय दोगुनी ऊर्जा से जुटे रहना किसी को कुमार विश्वास बना सकता है।
राजनैतिक जीवन हो अथवा साहित्य जगत्… डॉ कुमार विश्वास ने बुलेटिन भर-भर आलोचना झेली है। सोशल मीडिया के ट्रोलर्स की चोट सहना आसान नहीं होता। डॉ विश्वास ने वह चोट बार-बार भोगी है। जब किसी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व की निंदा की कोई उचित दर दुकान नहीं मिलती तो निंदक उसकी निजता के गोदाम में प्रवेश करके ‘नियरे’ आने का प्रयास करने लगते हैं। ऐसी परिस्थिति में भी उन्होंने न तो जनता की सिम्पैथी से उन्हें खदेड़ा न ही गोदाम पर ताला लगाया… बल्कि भरे गोदाम में उन्हें रीते हाथ बाहर लौट आने पर विवश कर दिया।
2002 से 2022 तक के इस लंबे सफ़र में मैंने उनका अपनत्व और परायापन… दोनों भोगे हैं, लेकिन इस परायेपन में भी मैंने उनसे यह सीखा है कि एक फोन कॉल से किसी भी पराएपन को अपनत्व में बदला जा सकता है।
मेरे एक शे’र को दुबई के मुशायरे में उद्धृत करके डॉ कुमार विश्वास ने मुझे यह सौभाग्य दिया है कि मुझे अज़ीम शायर जनाब अहमद फ़राज़ ने फोन करके आशीष दिया। इस बात के लिये मैं उनका कृतज्ञ हूँ। मेरी एक क्षणिका की घुमावदार पगडण्डी को उन्होंने न जाने कितने ही लोगों तक पहुँचाया इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ। उनसे नाराज़ भी बहुत कारणों से रहता हूँ, लेकिन वह हमारी निजता का विषय है…!

✍️ चिराग़ जैन

डॉ अशोक चक्रधर

हिन्दी की वाचिक परम्परा में अनेक विभूतियों का संसर्ग मिला है। मंच पर सक्रिय होने के कारण ऐसे अनेक सितारों को स्पर्श करने का अवसर मिला है जिन्हें हमेशा दूर से ही देख सका था।
ऐसे ही एक दीप्त नक्षत्र हैं- डॉ अशोक चक्रधर। कवि-सम्मेलनीय व्यस्तताओं के बीच अनवरत सृजन तथा शोध में संलग्न रहने का फ़ार्मूला क्या है -यह मैंने अशोक जी से सीखा। उनसे मिलने पर ज्ञात हुआ कि हमें जीवन का एक क्षण भी व्यर्थ करने के लिए नहीं मिला है। इसीलिए बहु-अवधान का कौशल विकसित किये बिना एक ही जीवन में ढेर सारे काम करना सम्भव नहीं है।
सामान्यतया कवि-सम्मेलनीय यात्राओं में हम लोग बातचीत और हँसी-ठट्ठा करके समय काटते हैं, लेकिन अशोक जी ज्यों ही यात्रा में निकलते हैं तो वे अपने तीन संस्करण बना लेते हैं। पहले क्लोन का काम होता है कि साथ के कवियों की बातचीत को सुनते हुए बीच-बीच में हुंकारा भरकर उसमें अपनी उपस्थिति बनाए रखे और आवश्यक होने पर उसमें पूरे मनोयोग से सम्मिलित भी हो। ठीक इसी समय में दूसरे क्लोन को प्रशंसकों की मुस्कान का प्रत्युत्तर देते हुए सेल्फ़ी और ऑटोग्राफ आदि में संलग्न रहना होता है। और इसी के समानांतर तीसरे अशोक जी अपने आईपैड या मोबाइल पर कोई लेख, स्क्रिप्ट, कविता या कांसेप्ट लिखने में जुटे रहते हैं।
इस प्रकार एक ही समय में अपने मस्तिष्क को तीन अलग-अलग दायित्वों में लगाकर वे हर पल तिगुना जीवन जी रहे होते हैं।
सृजनशील रहना या काम करना सामान्यतया लोगों की विवशता होती है। कुछ लोग इसे शौक़ बना लेते हैं और बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जिन्हें काम करने का रोग हो जाता है। अशोक जी, ये तीसरी तरह के लोगों में हैं। काम करने का रोग इतना भयावह है कि उसमें अपनी मानसिक पीड़ा तो दूर, दैहिक रोग भी दिखाई देना बंद हो जाता है।
अभी हाल ही में एक दुर्घटना के कारण उनके उत्तरदायी कंधों में कुछ टूट-फूट हो गयी। कंधे का अस्थिभंग जब टीसता है तो दुनिया के समस्त कार्य अनावश्यक लगने लगते हैं। इस बात को अनुभूत करके मैंने और अन्य कवियों ने उनका हालचाल जानने के लिए भी उन्हें कम-से-कम ही फोन मिलाया कि कहीं फोन उठाने में उन्हें कष्ट न सहना पड़े। लेकिन इस एकांत का लाभ उठाकर अशोक जी ने आईसीयू में लेटे-लेटे अपने आईपैड पर अपनी नातिन के जन्मदिन की शानदार किताब तैयार कर दी।
कविग्राम में उनका एक नियमित स्तम्भ प्रकाशित होता है। गत माह उन्हें तीसरी लहर के कोरोना ने जकड़ लिया और उनके ज्वर का पारा ऊर्ध्वगामी हो गया। 20 जनवरी को मैंने उन्हें कहा कि इस बार आपके स्तम्भ के बिना अंक निकाल लेंगे, और मैं सम्पादकीय टिप्पणी में स्तम्भ प्रकाशित न होने की कोई वजह लिख दूंगा। लेकिन अशोक जी को मेरी बात अच्छी न लगी। उन्होंने मुझे कहा कि महीने की आखि़री तारीख़ तक रुक जाओ, तब तक न लिख सका तो तुम निर्णय ले लेना। मैंने पत्रिका पूरी तरह तैयार करके रख ली और 31 जनवरी को यह सोचकर उसे फाइनल पैक कर दिया कि अब अशोक जी का लेख नहीं छप सकेगा। उन्हें फोन करने से इसलिये बच रहा था कि कहीं वे लिखने का दबाव न महसूस करें। लेकिन 31 जनवरी की सुबह 10 बजे उनका फोन आया कि उन्होंने स्तम्भ लिखकर भेज दिया है। फोन पर अपनी सद्य-सृजनोपरांत उपजने वाले उत्साह के साथ उन्होंने स्तम्भ के कुछ अंश पढ़कर भी सुनाए।
वे स्तम्भ सुना रहे थे और मैं उनके बुखार का ताप महसूस कर रहा था। उस दिन मैंने एक बार फिर सीखा कि सृजनशील व्यक्ति को स्वस्थ होने के लिए आराम की नहीं काम की ज़रूरत होती है।
आज पद्मश्री डॉक्टर अशोक चक्रधर का जन्मदिन है। अपने कंधे की पीड़ा को अंगरखे से ढाँप कर वे उसी कंधे पर अपनी गर्दन टिकाए जन्मदिन की बधाइयों का मुस्कुराते हुए उत्तर दे रहे होंगे।

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भाषा से खेलने का अधिकार केवल उसे प्राप्त है, जिसने भाषा की आत्मा को स्पर्श करके उसकी संवेदना के सबसे महीन तंतुओं को महसूस किया हो। शब्द का सिंगार करके उसकी अर्थ-व्यवस्था को बलवती बनानेवालों को भाषा की समृद्धि का श्रेय मिलता है।
आदरणीय डॉ अशोक चक्रधर, उन एकाध हिंदीभाषियों में से एक हैं, जो इस श्रेय के सम्यक अधिकारी हैं। किसी कवि की रचनाधर्मिता जब कविता गढ़ते-गढ़ते, शब्द भी गढ़ने लग जाए तो यह इस बात की सूचना है कि उसकी सर्जना अपनी भाषा के शब्दकोश की सीमा के पार निकल गई है। यह इस बात का प्रमाण है कि उसकी भावभूमि के लिए भाषा में उपलब्ध शब्दों का आकाश छोटा रह गया है।
इस बिंदु पर कवि कविता के साथ-साथ शब्द रचने लगता है। कभी ये शब्द आस-पड़ोस की भाषाओं से अपनी भाषा के संयोग का प्रतिफल होते हैं, तो कभी अपनी ही भाषा की पुरातन परम्परा से टटोलने पर हाथ लगते हैं, जिन्हें कवि नई साज-सज्जा के साथ पुनः लोकार्पित कर देता है। यही कारण है कि इन शब्दों का कोई विलग शब्दकोश न होने के बाद भी ये बिना समझाए समझ आ जाते हैं। ये शब्द इतने समर्थ होते हैं कि ये न केवल अपना अर्थ स्पष्ट करते हैं, बल्कि अपना सन्दर्भ तक आसानी से समझा देते हैं।
डॉ अशोक चक्रधर के सृजनलोक में ऐसे अनेक शब्द मौजूद हैं जिन्हें किसी विशेष सन्दर्भ के लिए उन्होंने बाक़ायदा रचा है। उनकी अनेक रचनाओं में निरर्थक शब्दों से अर्थ उत्पन्न होता दिखाई देता है। बच्चों की तोतली बोली में शब्द जब अपना रूप बदलकर अष्टवक्र हो जाता है, तब उसके दर्शन को पकड़कर उसे भी लिपिबद्ध करने का सामर्थ्य उनकी अनुभूति को लब्ध है।
वर्तमान में अशोक जी की रचनात्मक चेतना लोक-अभिरुचियों की चिंता से ऊपर उठकर शाश्वत साहित्य की साधना में संलग्न है। यह सृजन की तुरियावस्था है। यहाँ दैहिक पीड़ा, व्याधि, यश, लोभ और लौकिक सफलता की तमाम बेड़ियाँ छूट चुकी होती हैं। यहाँ मनुष्य लोक से मुक्ति पाकर बोध का आनंद भोगने लगता है। यहाँ कवि मुक्तिबोध होने लगता है।

लता मंगेशकर की विदाई

लता जी का जाना, किसी सरस्वती के साकार से निराकार हो जाने जैसा अनुभव है। बहुत लम्बी तपस्या के बाद वरदान देने को प्रकट हुई किसी देवी के अंतर्धान हो जाने पर तपस्वी को जो अनुभूति होती होगी, ठीक उसी अनुभूति से आज भारत का एक-एक बाशिंदा गुज़र रहा है।
भारतभूमि के सहस्रों पुण्य फलित हुए तब जाकर तिरानबे वर्ष पहले देवी ने इस धरा पर जन्म लिया और भारतीय संगीत उस देवी के सुरम्य वरदानों से निखर उठा। अलाप, मुरकी और गायन की ऐसी-ऐसी हरक़तें संगीत के आंगन में किलोल करने लगीं कि कान से लेकर मन तक निहाल हो गया। ‘मेरी आवाज़ ही पहचान है’ गाते हुए जब उन्होंने ‘आवाज़’ शब्द गाया तो ऐसा लगा जैसे उनके कण्ठ में विद्यमान माँ वाणी लास्य कर उठीं। ‘नैनों में बदरा छाए’ गीत ने जब उनके कण्ठ का तीर्थ किया तो ऐसा लगा जैसे धैर्य के उत्तुंग शिखर से मिलन कि प्यास का झरना फूट पड़ा हो। ‘लग जा गले’ के शब्दों को जब उस स्वर का संसर्ग मिला तो ऐसा लगा मानो दुर्भाग्य के द्वार पर खड़े सौभाग ने वक़्त के उस लम्हे को अपने बाहुपाश में समेट लिया हो। और ‘ऐ मेरे वतन के लोगो’ को जब लता जी ने अपनी आवाज़ दी तो ऐसा लगा कि हिमालय के वैराट्य में साकार होकर माँ भारती बिलखते हुए अपने वीर बेटों का शौर्य गा रही हो।
पिछली एक शताब्दी से हम भारतीयों को इस आवाज़ की आदत पड़ गयी है। पिछली एक शताब्दी में हम इस सौभाग्य को इतना उपलब्ध मान चुके हैं कि कभी यह विचार ही नहीं आया कि एक दिन ये देवी अंतर्धान हो जाएगी। हम यह कल्पना ही न कर सके कि सुरों के सागर से नित नये नग़मे उलीचने वाली यह मेरुशिला एक दिन अचानक विलीन हो जाएगी। उनके सहज जीवट ने कभी आभास ही नहीं होने दिया कि आयु का देवता इस काया की भी उम्र का हिसाब रख रहा होगा। हम सोच ही न सके कि भारत में एक दिन ऐसा भी सूरज उगेगा, जिसके भाग्य में लता मंगेशकर को साँस लेते देखने की लकीर नहीं होगी।
आज सोशल मीडिया देखा तो ऐसा लगा जैसे एक बार फिर एक कलाकार तमाम विषाद, तमाम विद्रूपताओं और तमाम नकारात्मकताओं के आगे अपने पूरे अस्तित्व के साथ अड़ गया है। आज जिधर देखो उधर लता ही लता है। कहीं उनके गीत, कहीं उनकी गुनगुनाहट, कहीं उनकी यादें, कहीं उनके चित्र और कहीं उनकी बातें…! आज कला ने फिर पूरे देश के शोर-शराबे को सुरों से ढँक लिया है।
आज बहुत दिन बाद, दुःख में ही सही; लेकिन पूरा देश एक ही सुर में कोरस कर रहा है। आज बहुत दिन बाद; दुःख में ही सही; लेकिन पूरे देश की आँखों में एक ही रंग के आँसू है। आज बहुत दिन बाद पूरा देश एक ही लय में मौन है।
लता जी के महाप्रयाण पर मैंने अपनी पलकों के नम किनारों पर खड़े होकर करोड़ों सुबकियों की आवाज़ सुनी है। बेशक़ लता जी इस देश के सवा सौ करोड़ लोगों से व्यक्तिगत रूप से नहीं मिली थीं लेकिन आज पहली बार ऐसा लग रहा है कि इस देश के सवा सौ करोड़ लोगों ने उन्हें किस हद्द तक अपना माना हुआ है।
वसन्त पंचमी के दिन श्वेतवर्णी लता मंगेशकर निराकार हुई हैं। देश उनसे रोज़ बतियाता हो ऐसा नहीं है लेकिन देश उनकी आवाज़ सुने बिना कोई दिन नहीं बिताता यह सत्य है।
तिरंगे से लेकर हर रंग आज उदास है। एक सम्पूर्ण कलाकार अपनी भरपूर कृपा लुटाकर ऐसे जा रहा है ज्यों अपने सातों रंग बिखेरकर कोई इंद्रधनुष अदृश्य हो गया हो।
जहाँ से गुज़र रहा हूँ, वहीं लता जी की आवाज़ सुनाई दे रही है। पूरा देश उन्हें बताना चाहता है कि दीदी! आप कितनी भी ज़िद्द कर लो, आप हमारे बीच से कहीं जा न सकोगी।

✍️ चिराग़ जैन

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