+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

प्रेम : पावनता का द्वार

एक पहर ठहरी सखी, कान्हा जी के ठौर।
पहुँची कोई और थी, लौटी कोई और।।
योगेश छिब्बर जी का यह दोहा भारत में प्रेम के उत्कर्ष को समझने के लिये पर्याप्त हैं। भारत में प्रेम का चरम यह है कि मीरा ने जो प्रेमगीत रचे, वे भक्ति की मानक कविताएँ बनकर जग में प्रसिद्ध हुए। यह भारतीय संस्कृति ही है कि यहाँ प्रेम और भक्ति के बीच की योजक रेखा पर सर्वश्रेष्ठ साहित्य रचा जाता है।
यहाँ साकार और निराकार के भेद को समझने के लिये अकेले राधा का प्रेम समझना पर्याप्त हो सकता है। यहाँ सुभद्रा और अर्जुन के प्रेम का सम्मान करने के लिये स्वयं कृष्ण अपने वंश की परंपरा को तोड़ने का बीड़ा उठाते हैं। यहाँ शबरी का प्रेम, प्रतीक्षा की गहरी नदी में खड़े-खड़े इतना निश्छल हो जाता है कि स्वयं श्रीराम उसके कौतूहल का सम्मान करते हुए अतिथि सत्कार की टूटती हुई परंपरा को अनदेखा कर देते हैं।
यहाँ भक्ति कब प्रेम बन जाए और प्रेम कब भक्ति बन जाए, इसका अनुमान लगाना कठिन है।
हमारे यहाँ वसन्त का मौसम प्रेम का मौसम माना गया है, साथ ही वसन्त पंचमी का दिन ज्ञान की देवी सरस्वती को भी समर्पित है। मदनोत्सव के साथ सरस्वती के पूजन का यह संयोग भारतीय संस्कृति के संतुलन प्रमुख होने का सबसे बड़ा प्रमाण है।
प्रेम, मनुष्य होने की पहली अर्हता है, अतएव प्रेम के अभाव में मनुष्यता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। प्रेम और पवित्रता का अनुप्रास हमारे देश की अधिकतम प्रेम कथाओं में सहज ही घटित हो जाता है।
राधा और कृष्ण को प्रतीक मानकर रचा गया श्रृंगार हमारे प्रेम को सगुण और निर्गुण के मध्य ऐसे नखत की तरह जड़ देता है कि एक भी पंक्ति अपनी मर्यादा की धुरि से रंचमात्र भी इधर-उधर नहीं हो पाती।
प्रेम से आपूरित हृदय स्वयं तो सुन्दर होता ही है, साथ ही वह अपने आसपास के वातावरण को भी सुन्दर बनाता चलता है। वह पारिजात के उस वृक्ष के समान होता है जो अंधियारी रात जैसे जीवन में भी इस विश्वास के साथ भरपूर खिलता है कि यदि अंधियारे के कारण उसके सौंदर्य को कोई न भी भोग सका, तो भी उसकी सुवास से कुछ पहर तो रात का वीराना सँवर ही जाएगा। यही निस्पृहता हमारे प्रेम को विशेष बना देती है।
एक बात और, प्रेम कभी घटता-बढ़ता नहीं है। वह तो जब अपने पूरे सौष्ठव के साथ किसी सम्बन्ध में रम जाता है तो फिर धरती में गड़े किसी बीज के समान उस पर अपनत्व, अधिकार, विश्वास और दायित्व-बोध के फूल खिलते हैं। यह लौकिक प्रेम की सहज नियति है। जो लोग इस नियति को स्वीकार न करके इन फूलों को अनदेखा करके, उसी बीज की तलाश में सम्बन्ध की जड़ खोदने लगते हैं, वे सब कुछ खो बैठते हैं।
प्रेम, जीवन में घटित होनेवाली सबसे स्वाभाविक, सहज और सुन्दर घटना है। इसकी शाखाओं का विस्तार इसके बीज के अस्तित्व का साक्षी है, इसका पल्लवन इसके बीज के समर्पण का गवाक्ष है। इसे केवल समय और स्थान की आवश्यकता होती है, अपने हिस्से का धूप-पानी यह प्रकृति से स्वतः जुटा लेता है।
देह से विदेह तक विस्तृत प्रेम को अभिव्यक्त करता एक कबीराना दोहा और उद्धरित करना चाहूंगा-
जब मैं था, तब हरि नहीं, अब हरि हैं, मैं नाय।
प्रेम गली अति साँकरी, जा में दो न समाय।।

✍️ चिराग़ जैन

प्यार समझना मुश्किल क्यों है

इस दुनिया में प्यार रहे तो
भावों का सत्कार रहे तो
कितना प्यारा होगा ये संसार समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है

किस्सा सुनकर मन सबका कहता है इसमें भूल हुई है
बिन मतलब की दुनियादारी पाँखुरियों में शूल हुई है
जो रांझे के साथ हुई थी हम वो भूल सुधारेंगे कब
अपने मन से बिन मतलब की दुनियादारी मारेंगे कब
इनको सुख से जीने दें इस बार; समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है

नज़रें टकराने पर जो आवाज़ हुई, वो शोर नहीं है
मन ही मन सब कह लेता है, पर फिर भी मुँहजोर नहीं है
अपनी इच्छाएं बिसरा कर उसकी मुस्कानें बोते हैं
इक-दूजे की ख़्वाहिश पूरी करके दुगने ख़ुश होते हैं
शुद्ध मुनाफे का ऐसा व्यापार समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है

दुनिया को मन में फूले सब फूल दिखाई दे जाते हैं
आँखों-आँखों चलने वाले शब्द सुनाई दे जाते हैं
चेहरे का कब, क्यों, कैसा था रंग समझ में आ जाता है
पलकों के झुकने का हर इक ढंग समझ में आ जाता है
तो फिर इस दुनिया की ख़ातिर प्यार समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है

✍️ चिराग़ जैन

हम तुम पार उतर जाएंगे

सुख होगा, उल्लास रहेगा
कभी-कभी कुछ त्रास रहेगा
जब सम्बन्ध निभेगा तो फिर
उसमें हर एहसास रहेगा
अच्छे-बुरे समय से हम-तुम, मिलकर साथ गुज़र जाएंगे
अपनेपन की नौका लेकर, इक दिन पार उतर जाएंगे

हम दोनों ने इस क़िस्से को मिलकर साथ सँवारा भी है
इक किरदार तुम्हारा भी है, इक किरदार हमारा भी है
अपना-अपना पात्र निभाकर, दोनों अपने घर जाएंगे

चाहे मुझसे रूठ भी जाना, कटु शब्दों के बान चलाना
लेकिन जब मैं तुम्हें मनाऊँ, तब तुम झटपट मान भी जाना
आँसू आए तो आँखों से फूल सरीख़े झर जाएंगे

उत्सव जैसा जीवन होगा, उत्सव का अवसान भी होगा
कभी-कभी सन्नाटा होगा, कभी-कभी तूफ़ान भी होगा
जो भी हो, हम साथ रहे तो सब व्यवधान बिखर जाएंगे

कुछ उम्मीदें भी टूटें तो, उसमें अपना साथ न टूटे
कैसी भी खींचातानी हो, इक-दूजे का हाथ न छूटे
बस इतना भर हो पाया तो, दिन ख़ुशियों से भर जाएंगे

✍️ चिराग़ जैन

बदलाव

जिसके चेहरे की पीड़ा को पढ़कर तुम बेचैन हुए थे
उसकी आँखों के आँसू से तुमने कैसे आँख चुरा ली
जिसकी हर इच्छा का बिरवा, तुमने साँसों से पोसा था
उसकी चाहत के झूले से कैसे तुमने शाख़ चुरा ली

सिसकी भरने से पहले ही, तुम दुलराने आ जाते थे
दुनिया से मन ऊब न जाए, प्यार जताने आ जाते थे
एकाकीपन की सर्दी से जब अंतर्मन काँप रहा था
तुमने भी उस ही मौसम में रिश्तों की पोशाक चुरा ली

उम्मीदों का साथ न हो तो, साँसें कुम्हलाने लगती हैं
मन में कोई आस न हो तो, आँखें पथराने लगती हैं
तुमसे ही उम्मीद बची है, उसको मत मर जाने देना
दुनिया ने बाक़ी उम्मीदें, सीना करके चाक चुरा लीं

✍️ चिराग़ जैन

बिरहन की होली

आँखन में कजरा धर राधा ने श्याम के रूप को नैन बसायो
श्याम ने बाँसुरी होंठ लगाय के राधा के होंठों पे साज सजायो
राधा ने श्याम को श्याम ने राधा को होरी की भोरी ही रंग लगायो
देह से देह रही बिरहा पर नेह से नेह नहीं बिसरायो

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!