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मौन

भले ही कभी बाँहों में भरकर दुलारा न हो मुझे आपके नेह ने! …लेकिन फिर भी न जाने क्यों काटने को दौड़ता है आपका मौन! ✍️ चिराग़...

उम्मीद

उम्मीद टूट जाये तो पीड़ा …संत्रास! और बंधी रहे तो टूट जाने की आशंका। ✍️ चिराग़...

कोई यूँ ही नहीं चुभता

कोई चीखा है तो उसने बड़ी तड़पन सही होगी कोई यूँ ही नहीं चुभता कहीं टूटन रही होगी किसी को सिर्फ़ पत्थर-दिल समझ कर छोड़ने वालो टटोलो तो सही उस दिल में इक धड़कन रही होगी ✍️ चिराग़...

नमक

यूँ चखा हमने बहुत दुनिया के स्वादों का नमक है ज़माने से अलग माँ की मुरादों का नमक तू परिन्दा है तिरी परवाज़ ना दम तोड़ दे लग गया ग़र शाहज़ादों के लबादों का नमक आँसुओं की शक़्ल ले लेंगी तड़प और सिसकियाँ दिल के छालों पर जो गिर जाएगा यादों का नमक दावतें धोखे की हरगिज़ हो न...

अपना-अपना शऊर था

सरे-बज़्म मैं रुसवा हुआ, यही दौर का दस्तूर था मैं ये बाज़ियाँ न समझ सका, मिरी सादगी का क़ुसूर था तूने ग़म में ख़ुशियाँ तबाह कीं, मैंने हँस के दर्द भुला दिये ये तो अपना-अपना रिवाज़ था, ये तो अपना-अपना शऊर था तुझे जिस्म से ही गरज़ रही, मिरा जिस्म तेरी हदों में था मिरी रूह...
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