Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
तो क्या हुआ, अगर जीवन में थोड़ा-सा संत्रास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है
जिस काया में गर्भ विराजे उसकी रंगत खो जाती है
अन्न उपजना होता है तो धरती छलनी हो जाती है
जो डाली फलती है उसको बोझा भी ढोना पड़ता है
भोर अगर नम होती है, तो रातों को रोना पड़ता है
पत्ता-पत्ता झरना सीखा, तब जाकर मधुमास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है
फूल लदी डालों से जो तूफान भिड़े, वो महक उठे हैं
साजिंदे की उंगली से जो साज छिड़े, वो चहक उठे हैं
जिस राघव ने घर छोड़ा था, उसने पूरा युग जीता है
जिस रानी ने सुख मांगा था, उसका अंतर्मन रीता है
कैकेयी ने तो ख़ुद अपने ही जीवन में वनवास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है
खोने को तो पांचाली के पाँच सुतों ने जीवन खोया
लेकिन जो रण में जूझा था युग उसके ही शव पर रोया
काया वज्र बनानी है तो तय मानो, लोहा पीना है
उत्सव के हर इक कारण को एकाकी जीवन जीना है
शबरी ने जीवन भर आँसू भोगे, तब उल्लास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
जीवन के तमाम प्रश्नचिन्हों के मध्य भी अपने भीतर के कबीर और तुलसी को बचाए रखनेवाले रचनाकार, वर्तमान के ऐसे विस्मयादिबोधक हैं, जिन्हें युग का सम्बोधनकारक बनने के लिए केवल युग के प्रारम्भ की घोषणा करनी है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
जिनका कोई अर्थ नहीं है, उन पर क़लम चलाना छोड़ें
जो चर्चा को दूषित कर दें, उन सबको समझाना छोड़ें
हमें ओस के कण चुन-चुनकर, अपने सपने सच करने हैं
अपनी ओस बचाना सीखें, उनके पेड़ हिलाना छोड़ें
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
कबिरा खड़ा बजार में, मांगे सबकी ख़ैर… अहा! इस पंक्ति को समझने का प्रयास व्यक्ति को कबीर होने का अर्थ बताता है। कबीर इस दोहे में बाज़ार में ही क्यों खड़े हैं? वे मंदिर-मस्जिद; घाट, चौपाल कहीं भी खड़े होकर सबकी ख़ैर मांग सकते थे। बल्कि मंदिर-मस्जिद में मांगना ज़्यादा सम्मानजनक प्रतीत होता। अक्सर बड़े-बड़े सम्मानितों को मंदिर-मस्जिद में मांगते देखा गया है। इसलिए कबीर को भी कुछ मांगना था, तो मंदिर-मस्जिद अधिक उपयुक्त स्थान रहता।
मंदिर-मस्जिद में मांगने का एक लाभ यह भी है कि वहाँ जिससे मांगने जाते हैं; वह किसी को यह नहीं बताने जाता कि अमुक मुझसे फलां चीज़ मांगने आया था। बाक़ी कहीं भी कुछ मांग के देख लेना। तुम्हें वह चीज़ मिले या न मिले, लेकिन तुम्हारी मंगताई का प्रचार ज़रूर हो जाएगा। ईश्वर-अल्लाह के पास इतनी फ़ुरसत ही नहीं है कि वे प्रचार में संलग्न हो सकें। वे तो भाँति-भाँति के मंगतों की दरख़्वास्त और शिक़ायतें निपटाने में ऐसे घिरे हैं कि शायद युगों-युगों से नज़रें उठाकर देख भी न सके हों, कि हमने उनकी दुनिया की सूरत क्या बना दी है।
लेकिन कबीर ने कुछ मांगने के लिए बाज़ार चुना। बाज़ार में मांगने का प्रावधान ही नहीं है। वहाँ तो छीना जा सकता है, ठगा जा सकता है, हड़पा जा सकता है… मांगने की परम्परा बाज़ार की पर्सनेलिटी को सूट नहीं करती। लेकिन कबीर ने उसी बाज़ार को मांगने के लिए चुना। और मांगा भी तो क्या… ‘सबकी ख़ैर!’ यह भी कोई मांगने की चीज़ है भला? लेकिन कबीर मांगते हैं। सर-ए-आम मांगते हैं।
यही कबीर होने का पहला सोपान है। यही कबीर होने की पहली शर्त है। कुछ ऐसा कर गुज़रना, जो परिपाटी ही नहीं है; कुछ ऐसा कर गुज़रना जिसका चलन ही नहीं है। परंपराओं को धता बताकर चलने का जीवट ही कबीर को कबीर बनाता है।
इसीलिए कबीर पहले ही कह देते हैं कि कबिरा खड़ा बजार में…! अब ‘कबीर’ महत्त्वपूर्ण हैं। कबीर बाज़ार को चेतावनी दे रहे हैं कि जो बाज़ार में खड़ा है वह ‘कबीर’ है। यदि इस पंक्ति में ‘बाज़ार’ को प्रमुख समझ लिया जावे तो कबीर को गौण होना पड़ेगा। इसलिए कबीर स्पष्ट कहते हैं कि अब बाज़ार में ‘कबीर’ खड़ा है। इसलिए बाज़ार को गौण होना होगा। अब बाज़ार में ‘सबकी’ ख़ैर मांगी जाएगी।
‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ -इस व्यक्तित्व के साथ ही कोई कबीर हो सकता है। और अपने भीतर के इसी कबीर को जीवित रखने में सफल होना किसी मनुष्य के मनुष्यत्व का द्विगुणित हो जाना सुनिश्चित कर देता है।
बाज़ार में प्रविष्ट होते ही ‘अर्थ’ मुखर हो जाता है। वहाँ पहुँचकर बड़े से बड़े फ़क़ीर भी व्यापारी होते देखे गए हैं। इसीलिए कबीर के पहले और कबीर के बाद किसी साधु-महात्मा-फ़क़ीर ने यह घोषणा नहीं की कि वह बाज़ार में खड़ा है। यह जोख़िम कबीर ही उठा सके। और कबीर भी यह जोख़िम इसीलिए उठा सके कि उन्होंने कभी स्वयं के फ़क़ीर होने की भी कोई घोषणा नहीं की।
यदि कबीर ने अपने आईकार्ड में ओक्यूपेशन ‘फ़क़ीर’ या ‘संत’ लिखवा लिया होता… तो वे भी अपने बाज़ार में खड़े होने का ऐसा ढिंढोरा न पीट पाते।
लेकिन कबीर तो कबीर थे। वे वैरागी होकर बाज़ार में खड़े नहीं हुए, बल्कि बाज़ार में खड़े होकर वैरागी हो गये। …ना काहू से दोस्ती। कितने अनुभवी थे कबीर। बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में बताया कि उनकी किसी से दोस्ती भी नहीं है और वैर भी नहीं है। यदि वे आधी पंक्ति लिखकर छोड़ देते तो उसका इंटरप्रिटेशन ‘यूँ’ किया जा सकता था कि किसी से दोस्ती न होने का अर्थ है कि सबसे दुश्मनी है। जैसे हमसे कोई कहे कि वह झूठ नहीं बोलता… तो हम यह स्वयं अर्थ निकाल लेंगे कि वह सच बोलता है। लेकिन कबीर स्पष्ट करते हैं कि झूठ न बोलने का अर्थ सच बोलना नहीं है। किसी से दोस्ती न होने का अर्थ यह नहीं है कि किसी से वैर है या सबसे वैर है। दो विलोमार्थी शब्दों के मध्य भी एक भाव होता है। श्वास और उच्छ्वास के मध्य भी एक निर्वात होता है।
इस निर्वात पर खड़े होकर आप चाहे बाज़ार में जाएँ, मंदिर में जाएँ, मस्जिद में जाएँ, मसान में जाएँ, चाहे वेश्यालय में ही क्यों न जाएँ… यहाँ खड़े व्यक्ति से उसका व्यक्तित्व कोई नहीं छीन सकता। यहाँ खड़ा व्यक्ति अपने वातावरण को प्रभावित कर तो सकता है, किन्तु अपने वातावरण से प्रभावित हो नहीं सकता। यहीं खड़ा व्यक्ति सबकी ख़ैर मांग सकता है, बिना यह ध्यान किये कि उसके इस साहस से बाज़ार की परंपरा ध्वस्त हो रही है और बाज़ार पर शासन करने वाला ‘अर्थ’ कबिरा के शब्दों का ‘अर्थ’ बूझते हुए मुँह बाये खड़ा रह जाता है।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
धर्म आत्मबल में वृद्धि करने का साधन है। साधना संहनन को सुदृढ़ करने का अभ्यास है। विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को संयत रखने का उपाय ही व्रत है।
जैन आगम का प्रथमानुयोग, जीव के इसी नैतिक विकास का आधार तैयार करता है। प्रथमानुयोग हमें संकट के समय संयत रहने के अवलम्बन प्रदान करता है। जब हम विपत्ति से घिरे हों तब उस विपत्ति का कोई एक उदाहरण मस्तिष्क में कौंध जाए तो विपत्ति छोटी लगने लगती है। यही प्रेरणा मनुष्य के जीवन में कथाओं को उपयोगी बनाती है। यह प्रेरणा न हो तो तमाम कथाएँ राजा-रानी की कहानी की तरह बालक का मन बहलाने का उपकरण मात्र सिद्ध होंगी।
यदि थोड़ा सा विवेक जागृत कर लिया जावे तो शास्त्रों में पढ़ी गईं अनेक कहानियां हमें हमारे परिवेश में साकार होती दिखाई देंगी। जैन आगम की इन कथाओं को जब कभी अपने या अपनों के जीवन में घटित होते देखता हूँ तब-तब मुझे लगता है कि महावीर की प्रासंगिकता सिद्ध हो गयी।
ऐसा अनेक बार होता है कि जब हमारा कोई अपना लोभवश हमसे छल करके हमारा आर्थिक अहित कर रहा होता है। ऐसी स्थिति को जानने के बाद यदि हम उस सम्पत्ति से निर्मोह होकर चल देते हैं तो उस क्षण हम भरत को राज्य सौंप कर वन को जाते हुए बाहुबली सदृश हो जाते हैं।
ऐसा अनेक बार हुआ है कि यदि हमें ज्ञात हो जावे कि हमारी उपस्थिति से किसी महफ़िल का माहौल असहज हो जाएगा तो हम उस अवांछित परिस्थिति को टालने के लिए स्वयं को उस उत्सव से विलग कर लेते हैं। जब हम ऐसा करते हैं तब हम अपने अवचेतन में विद्यमान नेमिनाथ से प्रेरणा प्राप्त कर रहे होते हैं जिन्होंने स्वयं को हिंसा का कारण बनते देख उस उत्सव का ही परित्याग कर दिया जो उनके लिए संयोजित किया गया था।
कोई हमें परेशान किये जा रहा है और हम उसके उपद्रव पर ध्यान न देकर अपने कार्य में एकाग्रचित्त रह पाएं तो उस समय हमारा व्यक्तित्व कमठ का उपसर्ग झेलते पार्श्वनाथ से प्रेरणा पा रहा होता है। हमें मिली ख़राब चीज़ को भी यदि हम सँवार कर उपयोगी बना लेने का हौसला रखते हैं तो हम मैनासुन्दरी के किरदार को जीवंत कर देते हैं।
सेठ सुदर्शन, मुनि मानतुंग, मुनि सुखमाल, अंजनबाला, राजुल, अकलंक, निकलंक, सुकौशल मुनि, सनतकुमार मुनि, अकम्पनाचार्य और श्रीपाल जैसे दर्जनों चरित्र हमारे अवचेतन में विद्यमान हैं। जिन परिस्थितियों में ये सब उल्लेखनीय बन गए, उन्हीं परिस्थितियों में ये सब सामान्य भी सिद्ध हो सकते थे। ये सब कथाएँ हमें यह प्रेरणा प्रदान करती हैं कि अनुकूल परिस्थितियों में धर्म पालन करने से कोई विशेष नहीं होता। आपका उल्लेख तब किया जाता है जब आप प्रतिकूल परिस्थितियों में धर्म का पालन कर सकें।
हाल ही में मुझे शल्य चिकित्सा की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा। जब मुझे ऑपरेशन थियेटर में ले जाया जा रहा था उस समय मुझे यह विचार आया कि घर पर हर रोज़ समाधि मरण और बारह भावना की ऑडियो सीडी बजती है। यदि इस क्षण मैंने इन दोनों काव्यकृतियों में वर्णित उदाहरणों का चिंतन नहीं किया, यदि इस क्षण में मैं विकल हो गया तो बरसों से सुनी जा रही इन महनीय रचनाओं की महत्ता खण्डित होगी। फिर इनका श्रवण मधुर संगीत से अधिक उपयोगी सिद्ध न हो सकेगा। …जब तक एनेस्थीसिया ने मुझे पूर्णतया अवचेत न कर दिया तब तक मैं अनेक उदाहरण देते हुए लगातार स्वयं से यह प्रश्न पूछ रहा था कि – “तुमरे जिये कौन दुःख है?”
इस एक प्रश्न ने मेरे मन को उस भय से बचाए रखा, जो ऑपरेशन से पूर्व किसी को हो सकता है। यूँ भी देह और विदेह के पृथकत्व के लिए वह क्षण सर्वाधिक उपयुक्त है, जब आप स्वयं उस बिंदु पर खड़े हों। अन्यथा धर्म चर्चा परानुभूति के प्रवचन से अधिक कुछ नहीं है।
मैं पग-पग पर इन चरित्रों से प्रेरणा प्राप्त करता हूँ। सर्दी लगी तो दिगम्बरत्व का ध्यान कर लिया। गर्मी लगी तो सिर पर जलती सिगड़ी को भूलकर साधनारत रहे मुनि का स्मरण हो आया। परिवेश के व्यवधान किसी कार्य में विघ्न बनने लगे तो ध्यानमग्न बाहुबली के हाथ-पैरों पर लिपटी लताएँ ध्यान आ गयीं। अपने भाग्य पर क्रोध आया तो बेड़ियों में बंधी चंदनबाला ने हौसला दिया।
कुल मिलाकर जीवन की स्लेट पर अनुभव ने जो इबारत लिखी है उसमें उन सब कथाओं का उजाला है, जो बचपन से लेकर अब तक आगम के प्रथम सोपान पर पढ़ी-सुनी हैं। कुल मिलाकर हम सबके जीवन में धर्म बार-बार अवसर लेकर आता है कि हमें उल्लेखनीय बनाया जा सके। कुल मिलाकर आत्मबल और विवेक के अभाव में हम उल्लेखनीय हो जाने के प्रत्येक अवसर पर सामान्य हो जाना सरल समझते हैं। कुल मिलाकर परिस्थितियों से जूझने में आगम को स्मरण रखने वाले लोग, आगम को नियमित रूपेण पूजने वाले लोगों से अधिक सम्यकदृष्टि हैं।
✍️ चिराग़ जैन