सफ़र
आगे बढ़नेवाला हर पैर अपने ही दूसरे पैर को पीछे छोड़ता है। अगर पीछेवाला पैर स्वयं आगे आने की बजाय दूसरे पैर की निंदा में लग जाएगा तो सफ़र वहीं रुक जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
आगे बढ़नेवाला हर पैर अपने ही दूसरे पैर को पीछे छोड़ता है। अगर पीछेवाला पैर स्वयं आगे आने की बजाय दूसरे पैर की निंदा में लग जाएगा तो सफ़र वहीं रुक जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
किसलिए है गुमान पानी को
मारता है उफ़ान, पानी को
कुछ नमी हो तो घर हुआ जाए
ढूंढता है मकान पानी को
चैन से बैठती नहीं लहरें
हो रही है थकान पानी को
रेत में दफ़्न हो गया क़तरा
देने निकला था जान पानी को
सबके अंदर का सच बयां होगा
मिल गई गर ज़ुबान पानी को
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सपनों की नौका है, अपनों का पाल
जीवन की धारा पर, साँसों की चाल
बीत गया एक और साल
भोर की किरण आई, अर्घ्य बन गया पानी
दोपहर तपी, लेकिन शाम हो गई धानी
रात ने बिखेर दिया तारों का थाल
बीत गया एक और साल
देह हो गई गठरी, शीत की गलन झेली
पानी को छू-छूकर, ग्रीष्म की जलन झेली
बरखा ने ओढ़ लिया सिर पर तिरपाल
बीत गया एक और साल
आहट का डर देखा जंगलों के पेड़ों में
मौत का बसेरा था लहर के थपेड़ों में
घाट-घाट घटनाएँ, पग-पग भूचाल
बीत गया एक और साल
धारा के चेहरे पर नैय्या की छाया है
सोच कर समझ आया, कुछ नहीं पराया है
अपनी ही मछली है, अपना ही जाल
बीत गया एक और साल
एक-एक अनुभव को, भर रहे हैं झोले में
एक पल भँवर में हैं, एक पल हिंडोले में
साथ ले के उतरेंगे यादों की टाल
बीत गया एक और साल
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
राह कितनी भी कठिन हो, हौसला मत छोड़ देना
यह नियत है, हर डगर के अंत में मंज़िल मिलेगी
जो सफ़र पूरे हुए हैं, उन सभी का हाल पूछो
हर विजय की राह हर युग में बहुत बोझिल मिलेगी
राम होने के लिए वन-वन भटकना ही पड़ेगा
भाई की हत्या बिना सुग्रीव निष्कासित रहेगा
जो दशानन के सिंहासन पर सुशोभित हो गया है
वह विभीषण वंशहंता हो के अभिशापित रहेगा
वीर लक्ष्मण की कथाएँ जब खंगालेगा कोई तो
राजमहलों के सुखों में घुट रही उर्मिल मिलेगी
जंगलों को छाँट कर चाहे नगर निर्माण कर लें
रण बिना पूरा हुआ क्या, पांडवों की जीत का पथ
द्यूत, लाक्षागृह, कठिन वनवास और फिर दास जीवन
हर क़दम जर्जर हुआ है न्याय की उम्मीद का रथ
मौन रहकर भी समय को काटना चाहा कभी तो
कीचकों के रूप में निश्चित कोई मुश्किल मिलेगी
भोर की पहली किरण का मार्ग अंधियारा रहेगा
रात के अंतिम पहर को दीप की झिलमिल मिलेगी
प्रेम को सारे ज़माने की घृणा सहनी पड़ेगी
नफ़रतों को हर क़दम पर प्यार की महफ़िल मिलेगी
जिंदगानी के सफ़र में मौत का साया रहेगा
मौत को मंज़िल कहा तो, मौत भी तिल-तिल मिलेगी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सत्य, जिसकी हम अभागे खोज करते फिर रहे हैं
वो युगों से वैभवों का दास बनकर जी रहा है
न्याय, जिसकी चाह में जीवन समर्पित कर चुके हैं
वो किसी दरबार में उपहास बनकर जी रहा है
पीर की सिसकी सुनी तो आँख का पानी पिलाया
दर्द बेघर था, उसे अपने बड़े दिल में बसाया
आह बेसुध थी, उसे सम्बल दिया अपनी भुजा का
हिचकियाँ बेचैन फिरती थीं, गले उनको लगाया
कष्ट की आँखें सजल पाकर उसे अपना कहा था
रंगमंचों पर वही, उल्लास बनकर जी रहा है
आपसी विश्वास, छल की छूट का पर्याय भर है
हर शपथ, मन में बसे इक झूठ का पर्याय भर है
धैर्य कड़वा घूँट है, कायर जनों का ढोंग कोरा
दान क्या है, आत्मा की लूट का पर्याय भर है
भाग्य जब हमसे मिला तो, ठूठ-सा था रूप उसका
आजकल वह बाग़ में मधुमास बनकर जी रहा है
ज्ञान, अपनी धूर्तता को, नीति कहने की कला है
धर्म, नियमों को नियति की रीति कहने की कला है
अर्थ है वह उपकरण जो पाप को भी पुण्य कर दे
प्रेम, कोरी वासना को प्रीति कहने की कला है
जो कथानक वास्तविकता के धरातल पर नहीं था
आजकल वह विश्व का इतिहास बनकर जी रहा है
✍️ चिराग़ जैन