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जिस दिन साँस पराई होगी

देह बचेगी स्पर्श न होगा
आँखें होंगीं दर्श न होगा
सब अपनों के आने का भी
मुझको किंचित हर्ष न होगा
उस दिन अधरों पर भी कोई याद नहीं मुस्काई होगी
जिस दिन साँस पराई होगी

जिन होंठों की मुस्कानों से मुझको प्राण मिला करते हैं
जिन चेहरों के खिल जाने पर मन के तार हिला करते हैं
उन चेहरों पर पीर दिखेगी
पीड़ा की तस्वीर दिखेगी
मेरी यादों में गुमसुम-सी
ख़ुशियों की जागीर दिखेगी
शायद उस दिन मेरे कारण वे आँखें भर आई होंगी
जिस दिन साँस पराई होगी

जिस देहरी पर मेरे होने से सुख सारा हो जाता है
जिस आंगन में मेरी आहट से उजियारा हो जाता है
उस आंगन में क्रंदन होगा
कण-कण में निस्पंदन होगा
मेरी माटी की काया के
चरणों का अभिनन्दन होगा
शायद उस दिन इस आंगन की फुलवारी मुरझाई होगी
जिस दिन साँस पराई होगी

मन में रखने वाले मुझको, कंधों पर लेकर जाएंगे
मेरे संगी-साथी मुझको, सन्नाटे में धर आएंगे
पानी से रिश्ते धोऊंगा
उस दिन कड़वा सच ढोऊंगा
उस दिन मेरा मौन रहेगा
उस दिन मैं माटी होऊंगा
उस दिन मेरे पास समूचे जीवन की तन्हाई होगी
जिस दिन साँस पराई होगी
✍️ चिराग़ जैन

मधुबन पर बस उसका हक़ है

फूलों का सौंदर्य निरखने
बगिया में दुनिया आती है
रंग लुभाते हैं आँखों को
गंध भ्रमर को ललचाती है
लेकिन हर ललचाने वाला
सुख की घड़ियों का ग्राहक है
जड़ में जिसका लगा पसीना
इस उपवन पर उसका हक़ है

शोभा बढ़ती है उपवन की
रूप निरखने वालों से भी
फूलों का मकरंद निखरता
उसको चखने वालों से भी
लेकिन मधुबन उसका होगा
जो ये फूल उगाने आया
तुम सब खिल जाने पर आए
पर वो इन्हें खिलाने आया
तुम उत्सव के अभिनेता हो
वो संघर्षों का नायक है
जिसने सींचे हैं सब पौधे
बस मधुबन पर उसका हक़ है

मंदिर-मंदिर द्वारे-द्वारे
तुमने केवल हाथ पसारे
ईश्वर के व्यापारी बोलें-
ईश्वर हैं क्या सिर्फ़ तुम्हारे?
पूजक बनकर तुमने केवल
इच्छाओं का भार दिया है
छैनी ने आकार दिया है
शब्दों ने विस्तार दिया है
देवालय में मूरत रखकर
शीश झुकाने वाले सुन लें
जिसने रूप गढ़ा मूरत का
बस भगवन पर उसका हक़ है

धरती उनकी है, जो आए
तिनका-तिनका नीड़ बनाने
उनका क्या जो निकल पड़े हैं
ध्वंस मचाती भीड़ बनाने
जो लालच से अभिप्रेरित है
उसका कुछ अधिकार नहीं है
विक्रेता, सर्जक से ऊँचा!
जीवन है, बाज़ार नहीं है
कंस, कालिया सबने केवल
गोकुल का दोहन करना था
जिसने वंशी के स्वर घोले
वृंदावन पर उसका हक़ है

✍️ चिराग़ जैन

सीधी सी बात

जो बड़ा होता है, उसे बताना नहीं पड़ता
जिसे बताना पड़ता है, वो बड़ा नहीं होता

जो अपना होता है, उसे सफ़ाई नहीं देनी पड़ती
जिसे सफाई देनी पड़े, वो अपना नहीं होता

✍️ चिराग़ जैन

मन की सुनने से बचो

हमारे यहाँ युगों-युगों से सब कहते रहे हैं कि अपने मन की सुनो। यह वाक्य इतनी बार कहा गया है कि इसमें प्राण ही न रहे। यह वाक्य नीरस हो गया, निष्प्रभावी हो गया। शब्द-शब्द पड़े रह गए और अर्थ के प्राण पखेरू उड़ गए।
यह सामान्य बात है। यह अक्सर होता है। किसी बात को बार-बार बोलो तो वह निष्प्राण हो जाती है। हमने सुना है कि बार-बार बोलने से मंत्र सिद्ध हो जाते हैं… होते होंगे। मैं मंत्र के विषय में नहीं जानता। मैं तो शब्दों को जानता हूँ, मैं तो वाक्यों को पहचानता हूँ। क्योंकि उन्हीं से मेरा काम पड़ता है।
जिससे हमारा काम न पड़े, उसे पहचानने से क्या लाभ! उसे हम पहचान ही न पाएंगे। किसी को पहचानने के लिए उसको प्रयोग करना आवश्यक होता है। व्यक्ति से लेकर शब्द तक यह बात अक्षरशः सत्य है। जिस शक्ल को आप अपनी स्मृति में किसी अच्छी या बुरी याद के साथ प्रयोग न कर सको, उसे याद रखना बहुत कठिन काम है। बाज़ार में हज़ारों शक्लें हमारे सामने से निकलती हैं, लेकिन वे हमें याद नहीं रहतीं। लेकिन उनमें से कोई हमें गाली बक दे तो उसे हम भूल न पाएंगे। कोई थप्पड़ मार दे, तो उसे मरते दम तक याद रखेंगे। और कोई प्रपोज़ कर दे, फिर तो नींद को भूल जाएंगे, पर उसे न भुला सकेंगे।
सो, मैं शब्दों को जानता हूँ। शब्द मुझे हर समय घेरे रहते हैं। और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जिन बातों को बार-बार बोला जाए, वे निष्प्राण हो जाती हैं। आप इसका प्रयोग करके देख लीजिए। आप किसी से मिलकर उसका हालचाल पूछ लें- ‘और सुनाओ, कैसे हो?’ यह वाक्य इतनी बार बोला जा चुका है कि चुक गया है। हमने हाल ही में घर बदला। जहाँ घर लिया है वह स्थान हवाई अड्डे के पास है। हर दो मिनिट बाद एक जहाज गुज़रता है। पहले कुछ दिन तो बड़ा संकट हो गया। नींद ही न आए। लेकिन धीरे-धीरे वह शोर निष्प्राण हो गया। उसने प्रभावित करना बंद कर दिया। अब जैगुआर भी उड़ता है तो हमें संज्ञान ही नहीं होता। ठीक इसी प्रकार, ‘और सुनाओ, कैसे हो’ भी बोला जाता है… सामने वाला भी यंत्र की तरह ‘बढ़िया हूँ’ बोल देता है। लेकिन इन दोनों ही बातों का कोई प्रभाव नहीं होता।
हम ऐसा अपराध अनेक ज़रूरी वाक्यों के साथ कर चुके हैं। ‘आई लव यू’; ‘आई एम सॉरी’ और ‘हैलो’ से लेकर गालियों तक यही दुर्घटना घटी है। मनुष्य जाति का इतिहास गालियों के इतिहास के बराबर का ही होगा। कभी-कभी तो लगता है कि गालियाँ, मानव जाति से नौ-दस महीने बड़ी ही होंगी। शायद गालियों के अतिरिक्त किसी अन्य तत्व को मनुष्य ने अपने साथ इतनी लंबी यात्रा करने ही न दी होगी। गालियाँ सम्भवतः प्रारम्भ में ही बहुतायत प्रयोग से निष्प्राण हो गई हों। सो, उनको साथ रखने में हमें कोई आपत्ति न हुई। जिसका प्रभाव नहीं, उससे आपत्ति कैसी? आपत्तिजनक होने के लिए प्रभावशाली होना पहली शर्त है।
इसीलिए भीड़ से कभी किसी को कोई आपत्ति न हुई। नेतृत्व ज़रूर आपत्ति को जन्म दे सकता है। यदि आपसे किसी को कोई आपत्ति न हो, तो यह कोई प्रसन्नता का विषय नहीं है। यह ख़तरनाक़ बात है। यह जड़ता का सूचक है। यदि किसी को आपसे कष्ट है, किसी को आपसे ईर्ष्या है, किसी को आपसे आपत्ति है तो उसके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करना। वह अवश्य आपसे प्रभावित हुआ है। उसने आपके जीवन को अर्थ प्रदान किये हैं। अन्यथा आपका जीवन किसी गाली से अधिक अस्तित्व न रख पाता।
आपने लोगों के घर पर पुरखों की तस्वीरें देखी होंगीं। आपको आश्चर्य होगा, जब तक वे सब पुरखे जीते थे, तब तक जी का जंजाल बने हुए थे। उनके कारण पूरे घर का जीना हराम था। इसलिए उन्हें अपने घर में रखने को कोई भाई तैयार न हुआ होगा। लेकिन मरने के बाद उनसे कोई कष्ट नहीं हो सकता। अब वे कोई प्रभाव नहीं डाल सकते। इसलिए हर भाई ने अपने घर में उनकी तस्वीरें जड़वा ली हैं। तस्वीरों से किसी को कोई आपत्ति हो ही कैसे सकती है?
हमने निष्प्रभावी वस्तुओं को, निष्प्रभावी वाक्यों को ढोने में दक्षता प्राप्त की है। क्योंकि उनसे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसा ही एक वाक्य है ‘अपने मन की सुनो।’ इस वाक्य में भी प्राण नहीं हैं। इसलिए कोई मन की नहीं सुनता।
और यह बहुत अच्छी बात है कि कोई मन की नहीं सुनता। यदि ग़लती से किसी दिन आपने अपने मन की सुन ली, तो बड़ी गड़बड़ हो जाएगी। फिर हर किसी को देखकर मुस्कुराना सम्भव न होगा। मन बोलने लगा तो आपका सामाजिक जीवन नरक हो जाएगा। फिर आप सभ्य न रह सकेंगे। मन का कैनवास तो बहुत वैविध्यपूर्ण है। एक क्षण में, आपको किसी पर प्रेम आने लगेगा। और प्रेम भी ऐसा-वैसा नहीं। पूरा प्रेम। ऐसा कि सोचकर स्वयं आपका ही चेहरा लाल हो जाएगा। और अगले ही क्षण आप उसे पीटने लगोगे। आपने स्वयं न सुनी हों, ऐसी ऐसी गालियाँ बकने लगोगे। इसलिए मन की सुनने में बड़े संकट हैं। मन कभी भी पिटवा सकता है। मन का विधान, किसी भी युग के संविधान को सूट नहीं कर सकता।
इसीलिए जिसने यह भूल कर दी, जिसने अपने मन की सुन ली उसे हमने असभ्य मान लिया, उसे हमने असामाजिक घोषित कर दिया। पापी, अभद्र, चरित्रहीन, उच्छृंखल, अनैतिक, दुराचारी जैसे शब्द मन की सुनने वालों के ही अलंकार रहे हैं। मीरा ने मन की सुनी, उसे ज़हर दे दिया। सुकरात ने मन की सुनी, उसे भी ज़हर दे दिया। हीर-रांझा, सोहनी-मिर्ज़ा, लैला-मजनू ये सब मन की सुननेवाले लोग रहे। हमने इनके साथ क्या किया!
मन की सुनना ख़तरे से ख़ाली नहीं। यदि मन खोलकर रखना हो तो तैयार रहना, कि इसके बाद तत्कालीन नियम तुम्हारे दुश्मन हो जाएंगे। धर्म, समाज, नीति, विधान सब हाथ धोकर पीछे पड़ जाएंगे। फिर बाद में सबको क़िस्से सुनाए जाएंगे।
ये लैला-मजनू के क़िस्से प्यार के क़िस्से नहीं हैं। ये तो दहशत की कहानियाँ हैं; कि देखो, वो आए थे मन की सुनने, हमने उनका कैसा सत्यानाश किया है। पीढ़ियों को ये कहानियाँ इसलिए सुनाई जाती हैं, ताकि वे इन कहानियों से यह शिक्षा ले सकें कि कोई कितनी ही बार कहे, पर भूलकर भी मन की मत सुन लेना।

✍️ चिराग़ जैन

सृष्टि गीत

एक जीवन में हमें संसार जितना दिख रहा है
वह गगन के एक कण बादल से ज़्यादा कुछ नहीं है
चांद, मंगल तक सफर की ख्वाहिशें और कोशिशें सब
बालपन के मूढ़ कौतूहल से ज़्यादा कुछ नहीं है

जो तुम्हारी दृष्टि को बस टिमटिमाते दिख रहे हैं
वे सभी तारे तुम्हारी सोच से बेहद बड़े हैं
क्षेत्रफल, ऊँचाइयाँ जो नापकर रटते रहे हो
वे महज इंसान के कुछ मनलुभावन आँकड़े हैं
लहलहाता दिख रहा है जो तुम्हें सागर, धरा पर
फर्श पर इक बून्द की हलचल से ज़्यादा कुछ नहीं है

बाँह के विस्तार से ही विश्व की गणना करो मत
पाँव से मत इस ज़मीं को नापने की डींग मारो
सिर्फ़ अपनी देह के आकार से तुलना करो मत
हो सके तो दृष्टि को ऊँचाई पर लाकर निहारो
तुम जिसे आकाशचुम्बी कह रहे गर्दन उठाकर
वह शिखर भी खुरदुरे भूतल से ज़्यादा कुछ नहीं है

उम्र केवल एक ज़र्रा है समय की अंजुमन का
इस जगत् की एक सिहरन मात्र ये जीवन समर है
जिस धरा के एक टुकड़े पर बसी दुनिया तुम्हारी
ये धरा ही इस महाब्रह्मांड में बस बून्द भर है
तुम जिसे दुनिया समझकर जीत लेना चाहते हो
यूँ समझ लो, एक टिड्डीदल से ज़्यादा कुछ नहीं है

✍️ चिराग़ जैन

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