जब सब पंछी मौन हो गए कलरव के स्वर गौण हो गए जीवन की रफ़्तार सो गई दिन पर रात सवार हो गई ऐसा एकाकी पल पाकर मन हमको झकझोर उठा जब बाहर सन्नाटा पसरा, तब अन्तर में शोर उठा कितनी इच्छाएँ प्यासी थीं, कितने काम अधूरे निकले डुगडुगियों पर नाच रहे थे, हम तो एक जमूरे निकले कर को...
आंधी के आघात सहे हैं ये शाखों के साथ बहे हैं सूखे हुए पड़े जो भू पर इनके कोमल गात रहे हैं हर मौसम से जूझे हैं ये, जूझे हैं, फिर टूट गए हैं ये उपवन के वो साथी हैं, जो शाखों से छूट गए हैं तूफानों का वेग सहा है, अब झोंकों से डरते हैं ये अपनी पूरी देह कँपाकर, उपवन में स्वर...