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मर्यादा

न हों हदों में तो छाले रिसाव देते हैं किनारे धार को बाढब बहाव देते हैं हदों में हैं तो ख़ैर-ख्वाह हैं उंगलियों के हदों को लांघ के नाखून घाव देते हैं ✍️ चिराग़...

आदमी यकसा मिला

हर कोई ख़ुद को यहाँ कुछ ख़ास बतलाता मिला हर किसी में ढूंढने पर आदमी यकसा मिला आज के इस दौर में आदाब की क़ीमत कहाँ वो क़लंदर हो गया जो सबको ठुकराता मिला हर दफ़ा इक बेक़रारी उनसे मिलने की रही हर दफ़ा ऐसा लगा, इस बार भी बेज़ा मिला जिसने उम्मीदें रखीं और क़ोशिशें हरगिज़ न कीं उसको...

लफ्ज़ों के शोर में

हालात ने जब-जब भी माजरा बढ़ा दिया जीने की हसरतों ने हौसला बढ़ा दिया लफ्ज़ों के शोर में ये समन्दर ख़मोश थे चुप्पी ने शाइरी का दायरा बढ़ा दिया यूँ ख़त्म हो चुका था रात को ही मसअला सुब्ह की सुर्ख़ियों ने मामला बढ़ा दिया कुछ पहले ही लज़ीज़ थीं चूल्हे की रोटियाँ फिर माँ की उंगलियों...

जीत की चाहत

चंद सस्ती ख्वाहिशों पर सब लुटाकर मर गईं नेकियाँ ख़ुदगर्ज़ियों के पास आकर मर गईं जिनके दम पर ज़िन्दगी जीते रहे हम उम्र भर अंत में वो ख्वाहिशें भी डबडबाकर मर गईं बदनसीबी, साज़िशें, दुश्वारियाँ, मातो-शिक़स्त जीत की चाहत के आगे कसमसाकर मर गईं मीरो-ग़ालिब रो रहे थे रात उनकी लाश...

तू भी सब-सा निकला

जो जितना भी सच्चा निकला वो उतना ही तनहा निकला सुख के छोटे-से क़तरे में ग़म का पूरा दरिया निकला कुछ के वरक़ ज़रा महंगे थे माल सभी का हल्का निकला मैंने तुझको ख़ुद-सा समझा लेकिन तू भी सब-सा निकला कौन यहाँ कह पाया सब कुछ कम ही निकला जितना निकला ✍️ चिराग़...
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